कल ब्रिटेन के प्रिंस फिलिप का 99 साल की उम्र में निधन हो गया. प्रिंस फिलिप ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ के पति थे. एलिजाबेथ के पिता जॉर्ज 6 ब्रिटेन के राजा थे. उनके निधन के बाद उनके परिवार में कोई भी पुरूष वारिस नहीं था. एलिजाबेथ दोनों बहनों में बड़ी थीं, इसलिए उन्हें महारानी के लिए चुना गया. प्रिंस फिलिप शायद शाही परिवार के सबसे कम चर्चा में रहने वाले शख्स थे. बचपन में जब मैं अखबारों में उनके बारे में पढ़ता तो ख्याल आता की महारानी का पति आखिर प्रिंस कैसे हो सकता है, उन्हें तो महाराजा होना चाहिए. खास बात यह है कि फिलिप को खुद भी इस सवाल का सामना करना पड़ा था और वह बस मुस्करा कर रह गए थे.

प्रिंस फिलिप का जन्म 10 जून 1921 को ग्रीस के कोर्फू द्वीप में हुआ. फिलिप ग्रीस के राजकुमार एंड्रयू के बेटे थे, लेकिन उनके जन्म के एक साल के भीतर ही ग्रीस में तख्तापलट हो गया और ब्रिटेन के राजा किंग जॉर्ज पंचम ने उन्हें ब्रिटेन में शरण दी. हम भारतीय लॉर्ड माउंटबेटन के बारे में बखूबी जानते हैं. वह आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल थे. प्रिंस फिलिप इन्हीं माउंटबेटन के भांजे थे. बीबीसी लिखता है कि, जब प्रिंस फिलिप और एलिजाबेथ की शादी हुई तो तत्कालीन ब्रिटिश पीएम विंस्टन चर्चिल ने इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बदरंग हुए ब्रिटेन पर रंगों की एक बौछार बताया था. हालांकि, ब्रिटिश सीरीज द क्राउन के मुताबिक चर्चिल इस शादी से खुश नहीं थे. दरअसल चर्चिल, लॉर्ड माउंटबेटन को भारत की आजादी के लिए जिम्मेदार मानते थे. उनका मानना था कि भारत को आजाद नहीं होना चाहिए था. चूंकि फिलिप इन्हीं माउंटबेटन के भांजे थे और पारिवारिक नाम के तौर पर माउंटबेटन का नाम इस्तेमाल करते थे, इसलिए चर्चिल इस शादी से खुश नहीं थे.

प्रिंस फिलिप, ब्रिटिश नौसेना में काम करते थे और इसी दौरान उन्हें राजकुमारी एलिजाबेथ के स्वागत का मौका मिला. दोनों के बीच यहीं से प्रेम संबंध की शुरुआत हुई. फिलिप भले ही राजघराने में पैदा हुए हों लेकिन वह तमाम शाही औपचारिकताओं से दूर रहे थे. इसलिए वह आजादी और मौज मस्ती भरा जीवन जीते थे. ब्रिटेन के शाही नौकरशाहों को उनका मिजाज पसंद नहीं था, हालांकि एलिजाबेथ की इच्छा के आगे, उनके पिता को झुकना पड़ा. एलिजाबेथ के पिता ने, शादी से पहले फिलिप से कहा, तुम्हारा एक ही काम होगा, एलिजाबेथ का ध्यान रखना. एलिजाबेथ का पति होना, फिलिप की ताकत भी थी तो शायद उनकी सबसे बड़ी परेशानी भी यही थी. फिलिप को आजीवन महारानी के पति के दौर पर जीना पड़ा. राजघराने में उनकी हैसियत नंबर दो की थी लेकिन उन्हें अपने तमाम काम अपनी पत्नी से कहकर करवाने पड़ते थे. दरअसल महारानी एलिजाबेथ के समय तक ब्रिटेन में राजशाही की भूमिका बदल चुकी थी. वहां की व्यवस्था में लोकतांत्रिक सरकार अहम भूमिका में आ गई थी और राजतंत्र महज सामाज्य का एक प्रतीक बनकर रह गया था. राजघराने के लोगों को अहम फैसले लेने के अधिकार नहीं थे, वे बस मुहर लगाने की भूमिका में आ चुके थे. ऐसे में राजघराने के लोगों को औपचारिकताएं भारी लगने लगी थीं.

एलिजाबेथ के पिता का निधन होने के बाद, फिलिप के पिता की इच्छा थी कि आगे का राजवंश उनके उपनाम यानि माउंटबेटन के नाम पर चले. इसके अलावा, फिलिप अपने और एलिजाबेथ के लिए एक शानदार घर बनवा रहे थे. फिलिप की इच्छा थी कि एलिजाबेथ और वह, पूरा जीवन वहीं बिताएं. एलिजाबेथ भी इस बात को जानती थीं कि फिलिप बेहद असहज रहते हैं, इसलिए उन्होंने दोनों मुद्दों पर हामी भर दी. ब्रिटेन में राजशाही के लिए इस तरह के फैसले भी ब्रिटिश कैबिनेट लेती थी और विंस्टन चर्चिल की अगुआई वाली कैबिनेट ने फिलिप की दोनों मांगे ठुकरा दीं. उन्हें बर्घिंघम पैलेस में ही रहने को बोला गया. न चाहते हुए भी फिलिप और एलिजाबेथ को ये फैसले मानने पड़े. सरकार का हस्तक्षेप यहां तक था कि चर्चिल ने फिलिप के प्लेन उड़ाने पर रोक लगाने का प्रस्ताव भी कैबिनेट से पास कराने की कोशिश की. चर्चिल का कहना था कि फिलिप ऐसे जोखिम भरे काम नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें और महारानी को ब्रिटेन की गद्दी के लिए अगला वारिस देना है. हालांकि, लॉर्ड माउंटबेटन को इसकी भनक लग गई और उन्होंने महारानी को इसकी सूचना दे दी ने और महारानी ने जैसे तैसे विंस्टन चर्चिल को मनाया.

राजघराने की इन्हीं तमाम बंदिशों की वजह से फिलिप, एलिजाबेथ से दूर होते चले गए. वह क्लबों में जाने लगे, उनके बारे में तमाम अफवाहें फैलने लगीं. ऐसे में एलिजाबेथ की मां ने उन्हें ब्रिटेन से दूर एक शाही दौरे पर भेजने को कहा, ताकि वह आजाद महसूस कर सकें. 1956 में 4 महीनों के इस दौरे ने एलिजाबेथ और फिलिप के बीच दूरियां और बढ़ा दीं. शाही दौरे पर फिलिप के साथ जाने वाले उनके एक दोस्त की पत्नी ने बेवफाई का आरोप लगाकर तलाक ले लिया और प्रिंस फिलिप पर भी अय्याशी के आरोप लगे. अफवाहें इस कदर बढ़ीं कि लगा शाही जोड़े का तलाक हो जाएगा. हालांकि इसके बाद फिलिप और एलिजाबेथ की मुलाकात हुई. फिलिप ने इस मुलाकात में उन तमाम परेशानियों का जिक्र किया जो शाही नियमों की वजह से उन्हें होती थीं.

फिलिप की इसमें से एक परेशानी बड़ी मजेदार थी. उन्हें दिक्कत थी कि राजघराने के बड़ी मूछें रखने वाला स्टॉफ, उन्हें छोटी छोटी बातों के लिए टोकता है. इसके बाद, महारानी ने अपने चीफ ऑफ स्टॉफ माइकल को मूंछें घोंटने का आदेश दिया. इसके बाद कुछ समय तक दोनों के वैवाहिक जीवन में शांति रही. हालांकि 1961 में एक भूचाल फिर से आया जब ब्रिटेन में परफ्यूमो स्कैंडल का खुलासा हुआ. ब्रिटेन के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फार वार जॉन परफ्यूमो का नाम एक सेक्स स्कैंडल में सामने आया और पहले परफ्यूमों और बाद में तत्कालीन पीएम हेरॉल्ड मैकमिलन ने इस्तीफा दे दिया. इसी स्कैंडल के दौरान अखबार में एक फोटो छपी, फोटो में पीठ दिखाकर खड़े हुए शख्स पर भी स्कैंडल में शामिल होने का आरोप था. हालांकि, उस शख्स की पहचान सामने नहीं आई थी. अखबारों ने इसे 'मिस्ट्री मैन' का नाम दिया. माना जाता है कि यह मिस्ट्री मैन प्रिंस फिलिप थे. महारानी को उनके अधिकारियों ने इसकी सूचना भी दी और उन्होंने फिलिप से अपने गुस्से का इजहार भी किया. फिलिप ने माफी मांगी और इसके बाद दोनों के जीवन में ठहराव आ गया.

ऐसा नहीं है कि महारानी और फिलिप के जीवन में बस यही तनाव था. एलिजाबेथ के पिता के निधन से लेकर, उनके तमाम विदेशी दौरों में उनके साथ रहे. रानी के फैसलों, उनके भाषणों के बारे में उन्हें समझाते रहे, उनकी मदद करते रहे. शाही परिवार के खर्च को लेकर प्रिंस फिलिप ही मुखर हुए और यह दिखाने की कोशिश की कि शाही परिवार फिजूलखर्ची नहीं करता है. फिलिप के जीवन को देखकर ऐसा लगता है कि उन्होंने भले ही गलतियां की लेकिन उन्होंने महारानी को धोखा देने के मकसद से ऐसा नहीं किया. ऐसा नहीं था कि फिलिप को एलिजाबेथ के रानी बनने से दिक्कत थी, दरअसल उन्हें दिक्कत तमाम शाही नियमों और कानूनों को लेकर थी और आखिरकार उन्होंने खुद को उन औपचारिकताओं में ढाल भी लिया था. शायद फिलिप और एलिजाबेथ, वह आखिरी जोड़ा था जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था की लोकप्रियता के बीच राजतंत्र की जगह को बनाकर रखने की एक सफल कोशिश की. उनके बाद की पीढ़ी में प्रिंस चार्ल्स और डायना का प्रकरण और अब प्रिंस हैरी और मेगन मार्केल का प्रकरण, दिखाता है फिलिप और एलिजाबेथ कितने सफल रहे. एलिजाबेथ को तो बचपन से पता था कि उन्हें रानी बनना है, लेकिन फिलिप ने जिस तरह से उस व्यवस्था में खुद को ढाला, महारानी के हमेशा पीछे खड़े रहे, उसे देखकर यह बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि 'फिलिप होना आसान नहीं है'.