हमारा पड़ोसी देश अफगानिस्तान एक बार फिर अपने अतीत की ओर वापस जा रहा है. खास बात ये है कि इस बार दुनिया एक मूकदर्शक की तरह अफगानिस्तान की इस अतीत यात्रा को देख रही है. अमेरिका इस पूरी यात्रा का प्रमुख कर्ताधर्ता है तो 'आतंकवाद' के खिलाफ लड़ाई में उसका पुराना सहयोगी रहा पाकिस्तान अफगानिस्तान की इस अतीत यात्रा में अपने लिए अवसर ही अवसर देख रहा है. पड़ोस में अगर गलत लोग आकर बस जाएं तो परेशानी बढ़ती ही है. भारत पहले भी अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे का नतीजा भुगत चुका है और आगे भी तालिबान के कब्जे का सबसे ज्यादा अगर कोई पीड़ित होगा तो वो अफगानिस्तान के लोगों के बाद भारत ही होगा. ऐसे में भारत की चिंता अफगानिस्तान को लेकर बहुत ज्यादा है. लेकिन, ऐसी हालत में भारत कर क्या सकता है? फिलहाल, तो खबरों के मुताबिक तालिबान से बातचीत कर रहा है. आगे का मालिक भगवान है. 20 साल की जंग के बाद अमेरिका और दुनिया को अफगानिस्तान से आखिर क्या हासिल हुआ है? अफगानिस्तान पर हमले के वक्त जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने जो सोचा होगा, क्या अफगानिस्तान आज वैसा ही है? आज हम अफगानिस्तान के बारे में ही बात करेंगे.

11 सितंबर 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर भयानक हमला हुआ. आतंकी संगठन अलकायदा ने 4 विमानों को अगवा किया और वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दो टावरों से विमानों को टकरा दिया. हमले में करीब 3000 हजार लोग मारे गए और 6000 से ज्यादा लोग घायल हुए. पूरी दुनिया ने टीवी पर अमेरिका को दहलते हुए देखा. अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन ने हमलों की जिम्मेदारी ली. उस वक्त अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था और मुल्ला उमर को सर्वोच्च नेता घोषित किया गया था. अमेरिका का मानना था कि ओसामा अफगानिस्तान में है और वहीं से इस 9/11 के हमले को अंजाम दिया गया है. उसने तालिबान सरकार से ओसाम को सौंपने के लिए कहा, लेकिन तालिबान इसके लिए तैयार नहीं हुए. ऐसे में अमेरिका ने दिसंबर 2001 में अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. अमेरिका ने पहले हवाई हमले किए और इसके बाद जमीन पर सैनिकों को उतार दिया. तालिबान और अलकायदा आतंकी या तो मारे गए या पाकिस्तान भाग गए. तालिबान के शीर्ष नेता मुल्ला उमर और ओसामा बिन लादेन सभी पाकिस्तान भाग गए. ओसामा को 2011 में मार गिराया गया वहीं मुल्ला उमर गुमनामी में अपने-आप ही बीमार होकर मरा. खैर ये बाद की बात है लेकिन अभी बात अफगानिस्तान में लड़ाई की करते हैं. अमेरिका के समर्थन से 2004 में अफगानिस्तान में सरकार बनी. हामिद करजई अफगानिस्तान के राष्ट्रपति बने.

कहने को तो अमेरिका ने तालिबान को उखाड़ फेंका था लेकिन दरअसल तालिबान अफगानिस्तान की जमीन पर अब भी मौजूद थे. जिंदा रहने के लिए उन्हें ऑक्सीजन पाकिस्तान से मिल रही थी. हामिद करजई पूरी दुनिया के सामने लगातार ये कहते रहे कि पाकिस्तान, उनके देश में फैले आतंक के लिए जिम्मेदार है लेकिन अमेरिका ने जानबूझकर इसे नजरअंदाज किया. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के नाम पर अमेरिका ने लगातार पाकिस्तान को मदद दी जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान ने आतंकवाद को मजबूत करने के लिए ही किया. तालिबान लगातार अफगानी सुरक्षा बलों और लोगों पर हमला करते रहे और उनकी जानें लेते रहे. पाकिस्तान की मदद का यह सिलसिला तब बंद हुआ जब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने. मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन, उपराष्ट्रपति रहते हुए पाकिस्तान की मदद के बड़े हिमायती रहे और अब वो अफगानिस्तान से अपनी सेनाएं तब वापस बुला रहे हैं जब उनकी ज़रूरत वहां सबसे ज्यादा है.

एक आम नागरिक के तौर पर युद्ध की बातें करना आसान होता है लेकिन सैनिक और उनके परिवार ही युद्ध के असली विनाश को जानते हैं. जो अफगानिस्तान दुनिया की राजनीति का एक मोहरा मात्र है वहां जाकर अमेरिकी सैनिकों ने न केवल अपनी जान गंवाई बल्कि वो वहां से हमेशा के लिए तनाव लेकर भी लौटे. अफगानिस्तान के युद्ध पर बनी अमेरिका की ही कई फिल्मों में दिखाया गया है कि किस तरह अफगानिस्तान जाने वाले अमेरिकी सैनिक डिप्रेशन के शिकार हुए,आत्महत्या की या उनकी पत्नियों ने उनसे तलाक ले लिया,

तीन दिन पहले की खबर के मुताबिक, तालिबान अफगानिस्तान के 85 फीसदी हिस्से पर कब्जा कर चुका है. कब्जा करने वाली जगहों पर शरिया कानून लागू कर दिया गया है. बगैर पुरुषों को साथ लिए, महिलाओं के घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और पुरूषों के दाढ़ी कटवाने पर. अफगान सुरक्षाबल, हथियार डाल कर तालिबान के सामने सरेंडर कर रहे हैं और अमेरिकी सेनाएं रात के अंधेरे में अफगानिस्तान को छोड़ रही हैं और तालिबान "अल्लाह हू अकबर" के नारे के साथ सैन्य ठिकानों पर कब्जा करते जा रहे हैं. कुल मिलाकर अफगानिस्तान तालिबान के अंधकार में ढकता जा रहा है. आने वाले दिनों में वहां की सरकार का भविष्य भी तय नहीं है. 1996 में जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तो राष्ट्रपति नजीबुल्लाह की हत्या करके उनके शव को बीच चौराहे पर लटका दिया था. उम्मीद है कि इस बार कम से कम ये तो न ही होने दिया जाए.

सवाल यह है कि अमेरिका की अफगानिस्तान में 20 साल की मौजूदगी से क्या हासिल हुआ? जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने जिस मकसद से अफगानिस्तान पर हमला किया था, वो मकसद आखिर कितना पूरा हुआ? अगर अफगानिस्तान को तालिबान के हाथों में ही छोड़ना था तो 20 सालों तक अपने ही सैनिकों को अमेरिका ने क्यों पीड़ित किया? अफगानिस्तान के उन लोगों का अब क्या होगा जो तालिबान के आतंक के चलते देश छोड़कर भागने को मजूबर होंगे और दुनिया में शरणार्थी के तौर पर जाने जाएंगे? भारत जैसे पड़ोसी देश को जो आतंकवाद का सामना करना पड़ेगा उसका क्या?

इन तमाम सवालों के जवाब अमेरिका को देने चाहिए, लेकिन वो नहीं देगा. उसकी वजह साफ है कि अमेरिका, अफगानिस्तान में तालिबान को खत्म करने में नाकाम रहा है. वियतनाम की तरह अमेरिका एक और लड़ाई हार चुका है और अब उसे क्षमता नहीं है कि वो अफगानिस्तान में और दिन लड़ सके. अफगानिस्तान की सरकार और वहां के लोग अब भगवान के भरोसे हैं और भारत जैसे पड़ोसी देशों को अपने दम पर आने वाले इस संकट की तैयारी करनी होगी क्योंकि दुनिया का कथित सबसे शक्तिशाली देश 'अफगानिस्तान' में हारकर मुंह छिपाकर भाग रहा है.