अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन बीती 20 जनवरी को बतौर राष्ट्रपति अपना एक साल पूरा कर चुके हैं. डोनल्ड ट्रंप के बाद जब जो बिडेन राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे तो दुनिया को उनसे काफी उम्मीदें थीं. डोनल्ड ट्रंप को एक तबके ने हमेशा अतिवादी की तरह माना जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति पद की गरिमा को कम किया. हालांकि, इससे इतर एक सच यह भी है कि ट्रंप के कार्यकाल में कोई नया युद्ध शुरू नहीं हुआ. इस बात का जिक्र अभी खुद ट्रंप ने भी किया था. वैसे तो दूसरे किसी देश के राष्ट्रपति के काम काज की समीक्षा करना, हमारा काम नहीं होना चाहिए लेकिन बात अमेरिका की हो तो ऐसा किया जा सकता है. क्योंकि अमेरिका लंबे समय से दुनिया की राजनीति को प्रभावित करता रहता है और उसकी अपनी एक भूमिका है. ऐसे में पिछले एक साल में राष्ट्रपति बिडेन, दुनिया भर के लोगों की उम्मीदों पर कितना खरा उतरे हैं इसकी समीक्षा होनी चाहिए.

अफगानिस्तान संकट: अफगानिस्तान इस समय तालिबान के हाथों में जा चुका है जो दुनिया भर से अपनी सरकार को मान्यता देने की अपील कर रहा है. अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी और तालिबान से समझौते की शुरूआत, डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति रहते ही हुई थी. दरअसल राष्ट्रपति बनने से पहले चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने वादा किया था कि सत्ता में आने पर वो ईराक और अफगानिस्तान से अमेरिका की सेनाओं को वापस बुला लेंगे. ट्रंप ने अपने इस वादे के मुताबिक ही काम भी किया, लेकिन मुख्य प्रक्रिया शुरू होने से पहले ट्रंप सत्ता से बाहर हो गए. ऐसे में यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि ट्रंप होते तो क्या होता? लेकिन अभी का वर्तमान कहता है कि जो बिडेन ने अफगानिस्तान को आतंकवादियों के हाथ सौंप दिया और कायरों की तरह भाग निकले. उन्होंने अपने ही उन तमाम सैनिकों की कुर्बानी को जाया कर दिया जिन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान और अलकायदा से लड़ते हुए अपनी जान गंवाई थी. कायदा यह था कि अफगानिस्तान के सुरक्षाबलों को इतना तैयार किया जाता, उन्हें हथियार दिए जाते और सत्ता को इतना मजबूत किया जाता कि वे तालिबान से लड़ पाते, लेकिन इन्होंने बगैर किसी तैयारी के यूं ही भागने का फैसला कर लिया. नतीजा आज यह है कि आतंकवादी एक देश की सत्ता पर कब्जा करके बैठे हैं. यह भारत के लिए बड़ा खतरा है और बाकी दुनिया के लिए भी. ऐसा क्यों है यह बताने की ज़रूरत नहीं है. जब ऐसा हो रहा था तो जो बिडेन ने कहा कि अमेरिका ने पूरी दुनिया की जिम्मेदारी नहीं ले रखी है. कुल मिलाकर अपनी जिम्मेदारी से भागने के बाद बिडेन ने अड़ियल रुख भी दिखाया और उनकी कमजोरी भी दिखी. अफगानिस्तान में जो आज संकट है वह बिडेन और उनके प्रशासन की पहली बड़ी असफलता थी.

यूक्रेन संकट और विदेश नीति में दूरदर्शिता का अभाव: अफगानिस्तान में जो कुछ भी हुआ उसके बाद अमेरिका की कमजोरी सामने आ गई थी. यह साफ था कि यह अब वो अमेरिका नहीं रह गया जो पहले था. खासतौर पर तब जब रूस और चीन लगातार तालिबान की मदद कर रहे थे और अमेरिका पीछे हटता जा रहा था. इस घटनाक्रम ने रूस की हिम्मत बढ़ा दी और 2014 के बाद अब 2022 में रूस ने एक बार फिर यूक्रेन पर हमला किया है. यहां भी हालत वही हुई कि पहले अमेरिका ने यूक्रेन को नाटो में शामिल होने के लिए कहा. यूक्रेन तैयार भी था, जब रूस ने इसका विरोध किया तो इसे नज़रअंदाज किया गया. अगर अमेरिका को इतनी ही हिम्मत दिखानी थी तो अपनी सेना को यूक्रेन का साथ देने के लिए भेजना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ. आज लड़ाई छिड़ी हुई है लोग मारे जा रहे हैं और यूक्रेन तबाह हो रहा है. ऐसे में जो बिडेन आर्थिक प्रतिबंधों की बात करते हैं और कड़ी निंदा करते हैं.

बिडेन की इस आर्थिक प्रतिबंध नीति को गलत बताते हुए वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ ब्रम्हा चेलानी कहते हैं, "यह नीति गलत है. इन प्रतिबंधों के बाद रूस की चीन पर निर्भरता बढ़ेगी और इससे चीन और भी ज्यादा मजबूत होगा." ब्रह्मा चेलानी के मुताबिक, आज के दौर में अमेरिका की नीति में बड़ी चुनौती के तौर पर चीन को होना चाहिए न कि रूस को.

कुल मिलाकर बिडेन और उनका प्रशासन विदेश नीति में शुरूआत से ही एक ऐसी चूक कर रहा है जिसके बाद उसकी स्थिति कमजोर होती जा रही है. यूक्रेन संकट में अमेरिका की भूमिका के बाद अब यह साफ है कि चीन की हिम्मत और बढ़ेगी और इसका नतीजा, ताइवान पर हमले के रूप में आ सकता है. बिडेन प्रशासन ने अपनी गलतियों की एक श्रंखला तैयार की है जो अमेरिका और दुनिया के लिए ठीक नहीं है.

उत्तर कोरिया के साथ संबंध फिर से खराब होना: डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अगर कुछ सबसे सकारात्मक था तो वो था उत्तर कोरिया के साथ बातचीत करना. ट्रंप के शुरूआती कार्यकाल में किम जोंग और ट्रंप दोनों ने एक दूसरे को निजी तौर पर भला-बुरा कहा, लेकिन उसके बाद ट्रंप ने जो प्रयास किए और मुलाकातें की वो बराक ओबामा भी नहीं कर सके थे. हालांकि उन मुलाकातों में कोई ठोस समझौते नहीं हुए लेकिन फिर भी एक आस जगी थी. बिडेन के आने के बाद लगभग स्थिति पुरानी वाली हो गई है. अमेरिका की तरफ से कोई खास प्रयास भी नहीं किए जा रहे हैं. ऐसे में आने वाले समय में दोनों देशों के संबंधों की दिशा खराब ही होने वाली है यह तय है. इस तरह बिडेन प्रशासन ने एक और ठीक-ठाक काम पर पानी डालने का काम किया है.

बिडेन प्रशासन की ये तीन मुख्य गलतियां हैं जिनके जरिए आसानी से पता चल सकता है कि उदारवादियों के प्रिय बिडेन किस तरह विदेश नीति में बीते एक साल में असफल रहे हैं. बड़ा सवाल यह है कि आने वाले समय में इसकी भरपाई कर पाएंगे? ब्रह्मा चेलानी अपने लेख में लिखते हैं कि ऐसे समय में अमेरिका को भारत की ज़रूरत सबसे ज्यादा है लेकिन क्या अमेरिकी प्रशासन का रुख ऐसा है? फिलहाल तो नहीं दिखता.