यूं तो भारत में रहने वाले लोगों के लिए यह सवाल बेकार होना चाहिए. जो देश, अपने तमाम जवानों को पाकिस्तान के सामने सीमा पर गंवाता हो, वहां यह प्रश्न खड़ा होना भी एक राष्ट्र के तौर पर हमारी विफलता को प्रदर्शित करता है. लेकिन चूंकि यह चीजें लगातार हो रही हैं और इसमें सिर्फ़ कोई एक समुदाय ही शामिल नहीं है और इसे बहुत सामान्य बनाने की कोशिश की जा रही है, इसलिए ज़रूरी है कि इन लोगों को कम से कम एक अहसास दिलाने की कोशिश की जाए कि वो आखिर गलत क्या कर रहे हैं.

आम तौर पर हम सभी दुनिया में अपने परिवार को सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं. अपवाद हर जगह हैं और मतभेद भी हर जगह होते हैं लेकिन आम तौर पर सभी अपने परिवार को बहुत ज्यादा प्यार करते हैं. अब सोचिए कि आपका कोई पड़ोसी, जिसके साथ आप अपनी तरफ से कोई उकसावा भी न करते हों. सिर्फ़ अपनी एक सनक की वजह से आपके भाई की जान ले ले. आप क्या करेंगे? इसकी प्रतिक्रिया आपकी सहज बुद्धि के आधार पर होगी. हो सकता है कि कोई गुस्से में उस पड़ोसी या उसके किसी परिजन की जान ले ले. इंसान ठंडे दिमाग का होगा तो कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेकर सजा दिलवाएगा. लेकिन मुझे नहीं लगता कि कोई भी अपने उस पड़ोसी की किसी भी तरह की जीत का जश्न मनाने लगेगा. अपने घर में पटाखे फोड़ेगा.

आप सोचिए कि पाकिस्तान की वजह से, हमारे देश के कितने जवान सीमा पर असमय मारे जाते हैं. शून्य डिग्री पर अपनी हड्डियां गलाते हैं और हम यहां देश के अंदर सुरक्षित बैठकर खेल भावना-खेल भावना का नाम लेकर 'वेल डन पाकिस्तान' कहते हैं. ऐसे लोगों को शर्म आनी चाहिए. आप यहां बैठकर बाबर और रिजवान की शान में कसीदे पढ़ते हैं वही बाबर और रिजवान कल को आगे निकलकर आफरीदी की तरह कश्मीर पर राग छेड़ेंगे. आप किसी शोएब अख्तर को भाई-भाई करते रहेंगे और वह आपके नेशनल टीवी पर आकर बोल देगा "हम तो टू नेशन थ्योरी में विश्वास करते हैं. हमारी एक 'विचारधारा' है". जब शोएब अख्तर विचारधारा का नाम लेते हैं न, तो ये वही विचारधारा होती है जो सीमा पर हमारे जवानों की जान लेती है. कश्मीर के तमाम युवाओं को आतंकवाद की राह पर धकेलती है और खैर मनाइए कि अब देश के बाकी हिस्से सुरक्षित हैं वर्ना कभी मुंबई तो कभी दिल्ली में यही विचारधारा 'दिवाली' भी मनवा देती थी.

पाकिस्तान के विरोध में कोई सियासत नहीं है. ये बीजेपी और कांग्रेस का मुद्दा नहीं है. ये देश का मसला है. इस पर कोई समझौता और कन्फ्यूजन होना ही नहीं चाहिए. पाकिस्तान सिर्फ भारत के लिए ही अभिशाप नहीं है. यह देश पूरी दुनिया में गड़बड़ करता है. आज अफगानिस्तान में जो हो रहा है. उसमें भी इन्हीं का हाथ है. अफगानिस्तान में लोग आज अपने बच्चे बेच रहे हैं अपना घर चलाने के लिए. जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया तो न जाने कितने मां-बाप ने अपने बच्चों को अफगानिस्तान से बाहर निकालने के लिए अमेरिकी सैनिकों को सौंप दिया. यह करते वक्त वो जानते होंगे कि वो अपने बच्चों को शायद ही कभी देख पाएं.

पिछले दिनों एक तस्वीर अफगानिस्तान से आई थी. एक मां अपने बच्चे के स्कूल के बाहर तब तक बैठी रहती है जब तक वह पढ़कर बाहर नहीं निकल आता है क्योंकि उसे डर लगता है कि कहीं वह अपने बच्चे को छोड़कर जाए और उसे कुछ हो न जाए. अफगानिस्तान आज ऐसी तमाम दर्दनाक कहानियों से भरा पड़ा है और आंखें बंद न हों तो दर्द हमारे आस-पास भी कम नहीं है.

तो भारत के ऐसे सभी लोग जो पाकिस्तान की जीत पर खुश होते हैं या उसकी जीत पर जश्न को गलत नहीं मानते हैं वह कम से कम एक बार अपने आस-पास देख लें कि वो खेल-भावना के बहाने के साथ जिनका समर्थन कर रहे हैं वह आखिर हैं कौन. अगर वे लोग अफगानिस्तान में बच्चों को बेचने पर मजबूर करने वाले और अपने देश के जवानों का खून बहाने वालों का समर्थन करना चाहते हैं, तो खूब करें. ऐसे लोगों को कोई संविधान या कानून सजा नहीं दे सकता. ऐसे लोगों का हिसाब ईश्वर खुद करेगा.