देश में कोरोना के चलते हालात बदतर हैं. पूरा देश कोरोना से पीड़ित है. अस्पतालों में बेड नहीं हैं, ऑक्सिजन नहीं हैं. लोग सड़कों पर मर रहे हैं. किसी के मां बाप के सामने बेटा-बेटी खत्म हो जा रहे हैं, तो किसी के छोटे बच्चों के सामने मां बाप दम तोड़ रहे हैं. हालत यह है कि लोग अपनों का अंतिम संस्कार तक नहीं कर पा रहे या करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे. ऐसे समय में देश में तमाम लो हैं जो अपने अपने स्तर पर मदद करने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ लोग हैं जो जीवन रक्षक दवाईयों और ऑक्सिजन की कालाबाजारी कर रहे हैं, तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो हिंदू मुसलमान की राजनीति कर रहे हैं. राजनेता एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं और राजनीति कर रहे हैं. कुल मिलाकर ऐसे आपातकालीन दौर में भी देश में सब कुछ हो रहा है.

बीते साल जब कोरोना के चलते देश भर में लॉकडाउन लगाया गया तो द पीपुल पोस्ट ने लॉकडाउन की मुख्य वजह के बारे में बात की. लॉकडाउन की मुख्य वजह हमारे हेल्थ सिस्टम का खुद ही बीमार होना था. उस समय ऐसा लग रहा था कि शायद कोरोना का संकट निपटे तो देश के हेल्थ सिस्टम में कुछ सुधार हो. कोरोना बिल्कुल तो नहीं गया था लेकिन हां हालात में बहुत सुधार था. देखिए हमने एक साल पहले बीमार हेल्थ सिस्टम के बारे में क्या लिखा था-

कोरोना के संकट से सबसे ज्यादा सवाल हेल्थ सिस्टम पर खड़े हुए हैं. सरकार की कोशिश है कि कोरोना को फैलने से रोका जा सके क्योंकि वो जानती है कि हमारा हेल्थ सिस्टम किसी महामारी के लिए तैयार नहीं है. ऐसे दौर में हम कोरोना की पूरी टेस्टिंग तक नहीं कर पा रहे हैं. ऐसे दौर में हर शहर और कस्बों- गांवों में कम से कम टेस्टिंग की व्यवस्था होनी चाहिए लेकिन ऐसा नहीं है. सरकार जानती है कि कोरोना गांव तक फैला तो तबाही बड़ी होगी क्योंकि गांवों में अस्पतालों के नाम खानापूर्ति है. जिला अस्पतालों तक की हालत खराब है. सरकारी मेडिकल कॉलेज भी संसाधनों के अभाव से जूझते हैं. ना केवल संसाधनों की कमी है बल्कि हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी चिकित्सा कर्मी पेशेवर रवैया नहीं रखते हैं. अक्सर अखबारों में सुर्खियों में आता है कि किसी महिला ने अस्पताल के गेट पर बच्चे को जन्म दे दिया. गांवों में तो छोड़िए किसी कस्बे के सीएचसी में जाइए, बेड की कमी होती है इसलिए कई बार कोई मरीज हल्का सा भी ठीक हुआ तो उसे जमीन पर लिटा दिया जाता है. वेंटिलेटर तो छोड़िए एक स्ट्रेचर भी मिल जाए तो बड़ी बात है. पान मसाले और गुटखे के तमाम पीकों के बीच लोगों का इलाज होता है. अस्पताल ऐसे कि कोई इलाज कराने जाए तो और ज्यादा बीमार होकर लौटे. सरकारी तंत्र के अभाव में अमीर तो प्राइवेट अस्पताल चला जाता है और गरीब कई बार झोलाछापों के हत्थे चढ़ जाता है. गांवों में ऐसे डॉक्टर हैं जो एक दाने से लेकर कैंसर तक के इलाज का दावा कर दें. लोग इनके पास वक्त और पैसा बर्बाद करते हैं और अपनी जान गंवा देते हैं.

अमीर अपनी गाड़ियों में बैठकर इलाज के लिए चले जाते हैं. मिडिल क्लास भी जैसे तैसे कुछ इंतजाम कर ही लेता है और गरीब कभी ठीलिया तो कभी रिक्शे पर अपने घर के बीमारों को लादकर अस्पताल ले जाता है. यूपी में अखिलेश यादव की सरकार के वक्त 108 एंबुलेंस सेवा की शुरुआत हुई. कुछ दिन इसने सही से काम भी किया और काफी तारीफ भी हुई लेकिन वक्त के साथ ये सेवा भी हल्की होती चली गई. इस दौर में ये लिखना थोड़ा कड़वा है लेकिन कस्बों और जिला अस्पतालों के कर्मचारी बगैर घूस के काम नहीं करते. संसाधनों का अभाव और समर्पण की कमी से भारत का हेल्थ सिस्टम खुद ही कोरोना से पीड़ित है. एक्सीडेंट या गंभीर रूप से बीमारों के लिए कस्बों और जिला अस्पताल महज रेफर करने की जगह बने रहते हैं. मरीज आया, डॉक्टर ने देखा और आगे के लिए रेफर कर दिया गया. उसकी किस्मत में जिंदगी है तो बचेगा वर्ना मरना तय है. छोटी जगहों में सही व्यवस्था ना होने की वजह से ही आज राज्यों में मेडिकल कॉलेज और एम्स मरीजों की भीड़ से दबे रहते हैं. लोगों को 6 महीने के बाद यहां दिखाने की डेट मिल पाती है. अस्पताल के अंदर से ज्यादा बाहर लोग खुले आसमान के नीचे रातें बिता देते हैं.

ये वो कारण हैं कि जिनकी वजह से सरकार चाहती है कि कोरोना को फैलने से रोका जाए. हमारे बीमार हेल्थ सिस्टम की जो हालत है, उसमें सबसे बढ़िया योजना भी यही है लेकिन क्या हम इससे कुछ सीखेंगे ? क्या हम भविष्य के लिए तैयार होंगे या संकट के बीत जाने के बाद चादर ओढ़कर सोने काम करेंगे.

1.क्या हम एक दूरगामी योजना बनाएंगे जिस पर काम करके हम अपने हेल्थ सिस्टम को सुधारेंगे.

2.सीएचसी और पीएचसी मरीजों को रेफर करने वाले किसी सेंटर से आगे बढ़कर लोगों की जान बचाने वाले अस्पताल बन पाएंगे.

3.इनमें तैनात चिकित्सा कर्मियों को ऐसी ट्रेनिंग और वो रवैया सिखाया जाएगा कि वो लोगों की बीमारी को गंभीरता से लें.

ऐसे तमाम सवाल हैं जो कोरोना संकट के बाद खड़े किए जाने चाहिए. सरकारों को सोचना चाहिए. हेल्थ सिस्टम का बजट बढ़ाया जाना चाहिए और सुनिश्चित करना चाहिए कि बजट का सही इस्तेमाल भी हो. हम डॉक्टरों की कमी से लेकर मास्क की कमी तक से जूझ रहे हैं. सीधे शब्दों में कहें तो हममें से कोई भी भविष्य देखकर नहीं आया, क्या पता आज कोरोना है कल कोई और महामारी आएगी. हम कब तक इस डर से जूझते रहेंगे कि ये बीमारी गांवो तक पहुंची तो क्या होगा. 1994 में भारत में प्लेग फैला था और गांवों में हालात बुरे हो गए थे. बहुत से लोग मारे गए. आज 2020 में हम चांद पर जाने से लेकर, एंटी सैटेलाइट मिसाइल बना चुके हैं लेकिन हमारे पास एक ऐसा हेल्थ सिस्टम नहीं है जो किसी महामारी के लिए तैयार हो. हमें चांद छोड़कर धरती के बारे में सोचने की गंभीरता से जरूरत हो".

एक साल पहले लिखे गए इस आर्टिकल में से कितने काम पिछले एक साल में हुए ? पूरी व्यापक व्यवस्था में सुधार तो छोड़िए, कोरोना के लिए विशेष तैयारियां ही नहीं की गईं. न तो ऑक्सीजन प्लांट बनाए गए. न ही सप्लाई की व्यवस्था की गई. कोरोना का टेस्ट तक नहीं हो पा रहा है. विशेष कोरोना अस्पताल बनने चाहिए थे. वो भी नहीं बनें. केंद्र सरकार से लेकर सभी बस चुनाव में लगे रहे. ऐसा लगा कि जैसे अब कोरोना की कोई लहर आएगी ही नहीं. आज देश के हर राज्य की हालत खराब है. सभी सरकारें और पूरी व्यवस्था की पोल खुल चुकी है. हमने ऊपर लिखा है कि गरीब कभी ठीलिया तो कभी रिक्शे पर लदकर अस्पताल जाता है. हमारे प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में एक ऐसी ही तस्वीर सामने आई, जब रिक्शे पर एक मां के सामने बेटे ने दम तोड़ दिया. उस बेटे को अस्पताल में एक बेड तक नसीब नहीं हुआ.

इस पूरी सरकारी लापरवाही की वजह से ही आज देश में प्रचंड हालात हैं. श्मशानों पर लाइनें लगी हुई हैं. यह पूरी तरह हमारी सरकारों की बनाई हुई आपदा है जिससे बचा जा सकता था. स्वास्थ्य और शिक्षा दो सबसे मौलिक और आधारभूत जरूरते हैं जिन पर देश के हर नागरिक का बराबरी का अधिकार है और सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ये बिना किसी भेदभाव के सभी को मिलें, लेकिन ऐसा कहीं नहीं हो पा रहा.

ऐसा लगता है कि शासकों ने यह मान लिया है कि स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारना उनकी जिम्मेदारी है. ऐसे समय में जरूरत है कि किसी एक सरकार को नहीं, बल्कि सभी सरकारों को इस आपदा का जिम्मेदार मानते हुए कार्रवाई की जाए. जनता भी साफ शब्दों में कहें वोट उसी को मिलेगा जो अस्पतालों में बेहतर सुविधा देगा. एक व्यापक जन आंदोलन की जरूरत है जहां जनता चुनाव के बहिष्कार की बात करे और एक पूरी पारदर्शी व्यवस्था के तहत हेल्थ सिस्टमें सुधार की मांग की जाए. हालांकि, यह सब तो तब की बात है जब सब कुछ सुधरे. फिलहाल तो घर पर रहिए और खुद को कोरोना से बचाइए, क्योंकि देश पूरी तरह रामभरोसे है और आप अपनी जान के खुद जिम्मेदार हैं.