राजस्थान में कन्हैयालाल, महाराष्ट्र में उमेश कोल्हे, बिहार में धर्म साहू, मध्य प्रदेश में निशांक, और कर्नाटक में प्रवीन नेट्टारू. ये उन लोगों के नाम हैं जो बीते 1 से डेढ़ महीने के बीच धार्मिक कट्टरता के शिकार हुए हैं. इनमें से निशांक की मौत की जांच अभी जारी है लेकिन अभी तक मिले सभी सबूत, धार्मिक कट्टरता की वजह से ही हत्या की ओर इशारा कर रहे हैं. ये सभी हत्याएं उन लोगों की हैं जिन्होंने नुपुर शर्मा के बयान का समर्थन किया था. कुल मिलाकर बीते डेढ़ महीने के अंदर देश की 'गंगा-जमुनी तहजीब' की एक साफ़ तस्वीर सामने आ चुकी है. नुपुर शर्मा को खुद भी जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं.

धर्म एक बेहद ही संवेदनशील विषय है. हम आप अपने आराध्यों की पूजा करते हैं. उन्हें मानते हैं. दूसरे धर्मों के अपने आराध्य हैं. वे उन्हें मानते हैं. इस धर्मनिरपेक्ष देश में किसी को भी दूसरे धर्म के आराध्यों की पूजा करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, तो सीधा सा फॉर्मूला है कि अपने-अपने भगवानों की पूजा करें और दूसरे धर्मों का सम्मान करें. किसी को भी दूसरे धर्म के भगवानों के बारे में ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए जिससे लोगों की भावनाएं आहत हों. नुपुर शर्मा को भी ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी. फिर भी बात यहां टिप्पणी पर प्रतिक्रियाओं की आती है.

निजी तौर पर मेरा मानना है कि हमारे भगवानों पर गलत टिप्पणी करने वाला चाहे हमारे धर्म का हो या दूसरे, उसे बिल्कुल नजरअंदाज कर देना चाहिए. अपने भगवानों की पूजा करने के हमारे पास कुछ कारण होते हैं, ठोस वजह होती हैं और किसी दूसरे के उस बारे में गलत बोल देने से कोई फर्क नहीं पड़ता और इसके बाद भी अगर हमें बुरा लगा है तो हमारे पास कानूनी विकल्प हैं. हमें उनका इस्तेमाल करना चाहिए. एक सभ्य समाज और परिपक्व लोकतंत्र के लोगों का व्यवहार ऐसा ही होना चाहिए.

नुपुर शर्मा के मामले को सिर्फ उनकी टिप्पणी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. यह अधूरी तस्वीर होगी. इस मामले की शुरुआत ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग मिलने के बाद हुई थी. वामपंथियों और दूसरे धर्म के तमाम लोगों ने उस समय शिवलिंग को लेकर तमाम तरह के अभद्र मजाक उड़ाए. कुछ पर केस हुए. जेल भी गए और जमानत भी पाई लेकिन ऐसा कहीं कुछ सुनने को नहीं मिला कि किसी की गर्दन काट दी गई या हत्या कर दी गई, लेकिन नुपुर शर्मा के बयान के बाद कुछ और ही हो रहा है.

नुपुर शर्मा अगर सत्ताधारी दल की सदस्य न रही होंती तो कल्पना करना मुश्किल है कि उनका क्या हाल होता. उनका समर्थन करने वाले लोग एक के बाद मारे जा रहे हैं. सीमापार से लोग नुपुर शर्मा को मारने के लिए भारत आ रहे हैं. ये देखना ही बड़ा दुखद है जिन लोगों के लिए महात्मा गांधी ने अपनी जान दी वे लोग आज पाकिस्तान के 'ईशनिंदा कानून' को भारत में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं. अजमेर शरीफ की जिस दरगाह पर हजारों हिंदू जाते हैं वहां के चिश्ती सांप्रदायिक टिप्पणियां कर रहे हैं.

भारत आजादी के समय से ही सांप्रदायिक तनाव का शिकार रहा है. खास बात यह है कि अधिकतर मामलों में शुरुआत एक तरफ से होती है और एक सीमा के बाद उसकी भयानक प्रतिक्रिया दूसरे पक्ष से देखने को मिलती है. नतीजा हजारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं. शिवलिंग को लेकर तमाम गलत बातों और 5 लोगों की हत्याओं के बावजूद अभी भी दूसरा पक्ष शांत है लेकिन यह कब तक रहेगा यह कहना मुश्किल है. कहीं न कहीं कर्नाटक से इसकी शुरूआत भी हुई है जहां प्रवीन नेट्टारू की हत्या के बाद, बीजेपी कार्यकर्ता ही अपने गृहमंत्री का इस्तीफा मांग रहे हैं. कर्नाटक में सीएम बसवराज बोम्मई की सरकार का एक साल पूरा होने पर एक बड़ी रैली आयोजित होने वाली थी. कार्यकर्ताओं के गुस्से के बाद इस रैली को कैसिंल कर दिया गया. फिलहाल, यह गुस्सा राज्य के बीजेपी नेताओं और मंत्रियों को लेकर है लेकिन यह कहां खत्म होगा ये कहा नहीं जा सकता.

समय की मांग है कि जो लोग कथित तौर पर भगवा आतंकवाद के बारे में बोलकर और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एक पक्ष का समर्थन करते हैं, इस समय में अपनी थोड़ी जिम्मेदारी समझें. मुस्लिम समाज को समझाएं कि थोड़ा संयम रखें. भारत में अपनी तरफ से ईशनिंदा कानून लागू करने के बजाय यहां के संविधान का पालन करें और कुछ करना ही है तो कानूनी विकल्पों को देखें. धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाले राजनीतिक दल भी प्रयास करें कि धार्मिक कट्टरता की वजह से होने वाली ये हत्याएं रुकें. इन लोगों की जिम्मेदारी इस समय इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इन्होंने भारत सरकार को पूरी तरह से, मुस्लिम समाज के दुश्मन के तौर पर पेश किया हुआ है. ऐसे में सरकार की कितनी ये लोग सुनेंगे यह कहना मुश्किल है लेकिन एक बात यह साफ है कि अगर ये हत्याएं न रूकीं तो हो सकता है कि बुरे परिणाम देखने को मिलें और देश-दुनिया के सामने फिर यह संदेश जाए कि आज के समय में भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सांप्रदायिक हिंसा हो रही है.