बीजेपी बंगाल का चुनाव हार चुकी है. जितनी हवा थी उस हिसाब से बीजेपी की हार को बड़ा ही माना जाएगा. हालांकि, सीटों की गिनती के हिसाब से बीजेपी को बंगाल में बड़ा फायदा हुआ है. पिछले चुनाव में 3 सीटें जीतने वाली पार्टी आज 80 के ऊपर सीटें ला रही है. इन सीटों के लिए, बीजेपी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह से लेकर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ तक बंगाल के चुनाव में लगे रहे. इस बीच देश के हालात खराब होते रहे. यूपी के हालात खराब होते रहे और सीएम साहब खुद कोरोना पॉजिटिव होकर आइसोलेट हो गए.

ऊपर हमने लिखा है कि बीजेपी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. हम इस बात की यहां पूरी तरह से व्याख्या करना चाहते हैं. इसकी शुरुआत पीएम मोदी जी के दो ट्वीट से करते हैं. 17 अप्रैल की सुबह मोदी जी एक ट्वीट करके, कोरोना के मद्देनजर साधु संतों से अपील करते हैं कि वे कुंभ समाप्त कर दें और इसे प्रतीकात्मक बना रहने दें. कुछ देर बाद वही मोदी जी बंगाल में एक चुनावी रैली को संबोधित करने जाते हैं. रैली में मोदी जी जो बोलते हैं. उसको ट्वीट किया भी जाता है. बकौल मोदी जी, "आज मेरी सभा में इतनी भीड़ दिखाई दे रही है, जहां तक मेरी नजर जा रही है चारों तरफ लोग ही नजर आ रहे हैं." कुंभ की भीड़ में कोरोना का संकट देख रहे पीएम को बंगाल की भीड़ में आनंद आ रहा था. देश का प्रधानमंत्री जो लगातार दो बार पूर्ण बहुमत से जीतकर आया है वह ऐसी मूर्खतापूर्ण हरकतें कैसे कर सकता है? यह हालत तब थी जब कोरोना के केस बढ़ना शुरू हो चुके थे. उस वक्त जरूरत थी कि पूरी तरह से उच्चस्तरीय बैठकें होतीं. ऑक्सीजन की सप्लाई को लेकर बातचीत होती, लेकिन हमारे पीएम पूरी तरह चुनाव में व्यस्त रहे. यहां केस बढ़ने लगे, लोग मरने लगे लेकिन मोदी जी रैली करते रहे.

इसी बीच मोदी जी ने राष्ट्र के नाम संबोधन का मंत्र फूंका. शायद उन्हें अब तक सब कुछ कंट्रोल में नजर आ रहा था. मोदी जी के राष्ट्र के नाम संबोधन में कुछ नहीं था. बेहद ही आम बातें थीं. ऑक्सीजन की कमी से मरते लोगों के सामने वह भाषण जले पर नमक छिड़कने जैसा था. आम तौर पर मोदी जी के संबोधन के बाद ट्विटर पर उनकी लहालोट हो जाने वाला तबका भी इस बार शांत था. उनके भाषण की आलोचना हो रही थी. मेरी समझ के मुताबिक जब फीडबैक खराब मिला तब जाकर मोदी जी की आंखें खुलीं. द प्रिंट के मुताबिक उस दिन पीएम ने अपने शीर्ष अधिकारियों को लताड़ लगाई. अगले ही दिन मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की और उसके बाद बंगाल में रैली के लिए जाने का फैसला रद्द कर दिया. सीएम के साथ मीटिंग में ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक ने ऑक्सीजन सप्लाई को लेकर पूरा सहयोग देने की बात कही, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अगर यही बैठक एक हफ्ते पहले हुई होती तो ऑक्सीजन की इतनी कमी बाकी जगह नहीं होती. सवाल यह है कि बैठक करता कौन? हमारे पीएम साहब तो रैली में व्यस्त थे.

जिस बनारस से पीएम मोदी सासंद हैं, वहां की भी हालत खराब हो गई. एक ऐसी तस्वीर वायरल हुई जिसमें ई-रिक्शे की जमीन पर मृत बेटे का शव पड़ा है और उसकी बूढ़ी मां मोबाइल में कुछ कर रही है. शायद वह मदद के लिए किसी को बुलाना चाह रही होंगी. उनके बेटे को इलाज के लिए एक बेड नहीं मिला और उसकी मौत हो गई. कहीं कोई महिला अपने मुंह से पति को ऑक्सीजन देते दिख रही थी, तो पिता की मौत पर चीत्कार करती किसी बेटी का वीडियो वायरल हो रहा था. यूपी के गाजियाबाद का एक वीडियो दिखा. एक गली में एक बुजुर्ग का शव पड़ा है. शव के आस-पास दो बच्चे उदास से बैठे हैं. खबर के मुताबिक दवाई लेने जा रहे थे, रास्ते में ही मौत हो गई. मासूम से बच्चे उनके शव के पास बैठे थे और शायद समझ नहीं आ रहा होगा कि क्या करें. इन तमाम तस्वीरों से इतर, मदद मांगने के लिए ऐसे तमाम मैसेज दिखे. किसी के घर में मां-बाप की मौत हो गई सिर्फ बच्चे ही बचे. किसी के घर में सिर्फ कोई बूढ़ी महिला बची जो अपने पोतों के साथ थी. उनके बेटे की कोरोना से मौत हो गई थी. सदमें मे वह अपने पोतों को खाना तक नहीं खिला पा रही थीं. लखनऊ के एक पत्रकार अपना ऑक्सीजन लेवल ट्वीट करते करते ही खत्म हो गए. उन तक मदद नहीं पहुंची. श्मशान घाटों पर लाइनें लगी हैं. 24-24 घंटे की वेटिंग है.

पिछले एक महीने में भारत में जितना दुख रहा है उतना शायद अंग्रेजी हुकूमत के समय ही रहा होगा. ऐसी दर्दनाक तस्वीरें इस दौरान दिखी हैं कि एक स्वस्थ्य व्यक्ति भी मानसिक तौर पर तनाव में आ जाए. हमारी सरकारों के पास एक साल का वक्त था लेकिन कुछ नहीं किया गया. यह सही है कि गलती सबकी है लेकिन देश को भरोसा किस पर था. लोगों ने मोदी जी को वोट इसलिए किया था क्योंकि उन्हें लगा कि यह तो कोई हमारे बीच का शख्स है. किसी चायवाले का बेटा है. लोगों को उम्मीद थी कि उनका दर्द मोदी जी समझेंगे, लेकिन इस कोरोना की इस दूसरी लहर ने सब कुछ खत्म कर दिया. एक शख्स जिस पर इतने लोगों का भरोसा हो भला वह इतना स्वार्थी और लापरवाह कैसे हो सकता है? सोशल मीडिया पर मोदी जी के लिए दूसरों से लड़ने वाले, उन्हें गाली देने वाले तक कोरोना का शिकार हो गए. सरकार ने अपने इन ऑनलाइन योद्धाओं तक को उनके हाल पर छोड़ दिया. आज हालत यह है कि तमाम बैठकों, दिल्ली हाईकोर्ट की लताड़ के बावजूद ऑक्सीजन की कमी है. बीते शनिवार को ही, दिल्ली के बत्रा अस्पताल में 8 लोग ऑक्सीजन की कमी से मारे गए. यह तो देश की राजधानी की हालत है, गावों में जहां कोरोना के टेस्ट तक नहीं हो रहे. वहां की हालत तो भूल ही जाइए.

अब ऐलान होते हैं कि इतने ऑक्सीजन प्लांट लगेंगे. ये सब पहले क्यों नहीं हुआ. 1 मई से वैक्सीन देने का ऐलान कर दिया गया लेकिन वैक्सीन हैं ही नहीं. राज्य हाथ खड़े कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि देश ऑटो पायलट मोड में है, कोई नेता नहीं है. एक तरह से अराजकता की स्थिति है. ये दिन देखने के लिए तो देश ने आपको नहीं चुना था मोदी थी. उम्मीद है कि इतने बुरे प्रदर्शन की उम्मीद तो शायद आपको भी खुद से नहीं होगी.

मोदी जी अब आप वह बंगाल हार चुके हैं जिसके लिए न जाने कितने लोगों की जानें गईं. मारे गए लोगों को तो आप वापस नहीं ला सकते, लेकिन एक काम कर सकते हैं. नैतिकता भी कुछ होती है और नैतिक जिम्मेदारी भी कुछ होती है. एक काम करिए, अभी जो संकट है उसमें अब जो कर सकते हैं वह करिए और इसके बीत जाने के बाद नैतिकता के नाम पर इस्तीफा दे दीजिए. कम से कम कुछ सम्मान आपको वापस मिल जाएगा. वर्ना इतिहास में आप एक क्रूर और सत्तालोलुप प्रधानमंत्री के तौर पर जाने जाएंगे. बस...