बीते दिनों जिंदल ग्रुप की प्रमुख, सावित्री जिंदल एशिया की सबसे धनी महिला बन गईं. सभी अखबारों, वेबसाइटों पर इस खबर को प्रमुखता से दिखाया गया. एक भारतीय महिला की इस उपलब्धि को बड़े ही सकारात्मक तरीके से पेश किया गया. ऐसा करना भी चाहिए. हालांकि, कुछ दिनों पहले जब उद्योगपति गौतम अडानी दुनिया के चौथे सबसे अमीर शख्स बने तो तमाम लोगों ने तंज के तौर पर इसे पेश किया. राहुल गांधी समेत पूरी कांग्रेस पार्टी और तमाम पत्रकार लगातार अंबानी-अडानी के ज़रिए मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करती रहती है. गौतम अडानी की संपत्ति, मोदी सरकार आने के बाद तेजी से बढ़ी है और उनका व्यापार दुनिया के कई देशों में फैला है. सिर्फ़ पीएम मोदी ही नहीं, दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के साथ उनकी तस्वीरें अक्सर सोशल मीडिया पर नजर आती रहती हैं.

आज हम सावित्री जिंदल और अंबानी-अडानी के ज़रिए ही भारतीय कारोबारियों के राजनीतिकरण के बारे में बात करेंगे. सावित्री जिंदल ने 2005 में अपने पति के निधन के बाद, जिंदल ग्रुप की कमान संभाली. उनकी कंपनी सीमेंट, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में काम करती है. उनके चार बेटे हैं. पृथ्वीराज, रतन, नवीन और सज्जन जिंदल. चारों बेटे, जिंदल ग्रुप के अलग-अलग व्यापार का नेतृत्व करते हैं. पिछले कई सालों में इस बिजनेस ग्रुप की संपत्ति में बड़े उतार-चढ़ाव हुए. कोरोना काल के दौरान साल 2019 और 2020 में सावित्री जिंदल की संपत्ति में 50 फीसदी तक की गिरावट हुई. हालांकि इसके बाद उनकी संपत्ति में बड़ा उछाल आया और इसके बाद, सिर्फ़ दो साल के अंदर उनकी संपत्ति तीन गुना से ज्यादा हो गई. इस उछाल की बदौलत आज सावित्री जिंदल एशिया की सबसे अमीर महिला हैं.

सावित्री जिंदल, सिर्फ़ एक बिजनेस वुमेन ही नहीं हैं. वह और उनका परिवार राजनीति में सक्रिय रहा है. कांग्रेस पार्टी के साथ इस परिवार के संबंध अच्छे रहे हैं और सावित्र जिंदल हरियाणा में भूपेंद्र हुड्डा की कांग्रेस सरकार में मंत्री रही हैं. उनके बेटे नवीन जिंदल कांग्रेस से सांसद रहे हैं लेकिन इसके अलावा इस परिवार का एक कनेक्शन मोदी सरकार से भी है. सावित्री जिंदल के एक और बेटे सज्जन जिंदल के मोदी सरकार से अच्छे संबंध हैं. ये संबंध यहां तक हैं कि भारत की विदेश नीति तक को तय करने में मदद करते हैं. 2015 में जब पीएम मोदी, अचानक से पाकिस्तान यात्रा पर पहुंचे थे तो इस यात्रा के पीछे सज्जन जिंदल का ही हाथ था. सज्जन जिंदल का कारोबार, पाकिस्तान में भी है और तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ से भी उनके अच्छे संबंध हैं. 2015 में सज्जन जिंदल, नवाज शरीफ के जन्मदिन पर बधाई देने पाकिस्तान तक गए थे. https://twitter.com/sajjanjindal/status/680314314222366720

ऐसे में सज्जन जिंदल ने दोनों देशों के पीएम के बीच बैठक में मध्यस्थ की भूमिका अदा की थी. 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले, सज्जन जिंदल ने पीएम मोदी के एक और कार्यकाल के लिए वकालत की थी. इतना ही नहीं, न्यूजक्लिक नाम की वेबसाइट के मुताबिक, रतन जिंदल की कंपनी के एक प्लांट के लिए ओडिशा में मोदी सरकार ने जंगल के बीच जमीन आवंटन को मंजूरी दी है. ओडिशा हाईकोर्ट में इससे जुड़े केस के पेंडिंग में होने के बावजूद ऐसा किया है और स्थानीय लोग इसका काफी विरोध कर रहे हैं. हालांकि, बीते दिनों नवीन जिंदल के यहां ईडी के छापे भी पड़े हैं. लेकिन अगर पूरा निचोड़ देखा जाए तो जिंदल परिवार ने बदले हालात में मोदी सरकार से संबंध काफी अच्छे रखे हैं और यही वजह है कि कांग्रेस में शामिल होने के बावजूद, सावित्री जिंदल की संपत्ति में इतना इजाफा हुआ है.

जैसे सावित्री जिंदल कांग्रेस में रही हैं और उनके बेटों को बीजेपी शासन में भी फायदा मिल रहा है ठीक वैसे ही गौतम अडानी बीजेपी के करीबी होने के बावजूद कांग्रेस शासित राज्यों में भी फायदा पा रहे हैं. 11 मई 2022 की टीवी 9 भारतवर्ष की एक खबर के मुताबिक, अडानी ग्रुप को राजस्थान में 6000 हेक्टेयर जमीन दी जाएगी. यहां अडानी ग्रुप 2000 मेगावाट क्षमता वाला सोलर पार्क बनाएगा. छत्तीसगढ़ में कोयले की खदानों को लेकर कांग्रेस सरकार जो कर रही है वह तो पूरी तरह हास्यास्पद भी है. यहां के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयले की खदानों से कोयला निकाले जाने का ठेका अडानी ग्रुप के पास है. 2016 में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि अगर उनकी सरकार बनी तो इस जंगल को उजड़ने नहीं दिया जाएगा.

हसदेव अरण्य को मध्य भारत का फेफड़ा कहा जाता है और आदिवासी समुदाय के लिए बहुत ज़रूरी है. कांग्रेस सरकार बनने के बाद भी इस प्रोजेक्ट पर काम नहीं रुका और जंगल की कटाई तक शुरू हो गई. ऐसे में स्थानीय स्तर पर इसका विरोध शुरू हुआ और छत्तीसगढ़ सरकार में सीएम भूपेश बघेल के प्रतिद्वंदी माने जाने वाले टीएस देव सिंह भी प्रदर्शन में शामिल हुए. धीरे-धीरे करके खबर, दिल्ली की मीडिया और ट्विटर तक पहुंची और दबाव में सीएम भूपेश बघेल ने पेड़ों की कटाई रोकने का ऐलान कर दिया लेकिन क्लाइमेट चेंज न्यूज डॉट कॉम नाम की वेबसाइट के मुताबिक, राजस्थान राज्य विद्युत निगम के चैयरमैन ने कहा है कि उन्हें ऐसा कोई आदेश नहीं मिला है. कुल मिलाकर, अडानी ग्रुप को आवंटित खदान की वजह से कांग्रेस में आपसी विवाद तक शुरू हो चुका है लेकिन फिर भी सरकार इस पर पीछे हटती नहीं दिखती है. अपने भाषणों में अडानी ग्रुप पर हमला करने वाले राहुल गांधी से जब कांग्रेस शासित राज्यों में अडानी ग्रुप को फायदे पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, "हम इस मामले को देख रहे हैं".

राहुल गांधी का एक और पसंदीदा अंबानी ग्रुप है. अडानी ग्रुप के साथ इस ग्रुप का जिक्र भी राहुल गांधी ज़रूर करते हैं लेकिन बीते दिनों कांग्रेस पार्टी के भीतर एक समिति बनाई गई है. इस समिति का काम पार्टी के लिए उद्योगपतियों से फंड जुटाना होगा. दरअसल, कांग्रेस पार्टी के पास फंड की कमी है. समिति का प्रमुख मिलिंद देवड़ा को बनाया गया है. मिलिंद देवड़ा का नाम कांग्रेस के युवा नेताओं में आता है. उनके पिता मुरली देवड़ा भी कांग्रेस के नेता थे. 2019 के चुनाव के समय जब राहुल गांधी अंबानी अडानी को लेकर मोदी सरकार पर हमला कर रहे थे तो मिलिंद देवड़ा के समर्थन में मुकेश अंबानी ने एक विज्ञापन दिया था. इस विज्ञापन में उन्होंने मुंबई दक्षिण सीट के लिए मिलिंद समर्थन दिया था. मिलिंद, मुंबई दक्षिण सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे. मिलिंद को फंड जुटाने वाली कमेटी का अध्यक्ष बनाने का मतलब साफ है, मुकेश अंबानी जैसे व्यापारियों से पैसे जुटाना. पार्टियों को कौन कितना चंदा देता है इस बात का खुलासा नहीं हो सकता, जबकि भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह इसी को माना जाता है.

बीजेपी के शासनकाल में विरोधी पार्टी की नेता और एक महिला कारोबारी, एशिया में सबसे अमीर महिला बन जाती है. वहीं तमाम विरोधी बयानों के बावजूद अडानी ग्रुप को कांग्रेस शासित राज्यों में लगातार कॉन्ट्रैक्ट मिलते रहते हैं. दूसरी तरफ अंबानी के करीबी कांग्रेस पार्टी में फंड जुटाने वाली समिति के प्रमुख बन जाते हैं. ऊपर दिए गए सारे फैक्ट, कारोबारियों और सरकारों के बीच संबंधों को दिखाते हैं कि दोनों एक दूसरे के पूरक की तरह हैं. दोनों का एक दूसरे के बगैर काम नहीं चल सकता. यूपीए- 2 में जयपाल रेड्डी को मुकेश अंबानी की कंपनी पर जुर्माना लगाने की कीमत, पेट्रोलियम मंत्रालय गंवाकर अदा करनी पड़ी थी. कल को कांग्रेस सरकार बनने पर ऐसा ही कुछ दोबारा होते दिखे तो बड़ी बात नहीं है.

जनता का ध्यान बजाय एक दो कारोबारियों को टारगेट करने के, इस पर होना चाहिए कि कारोबारियों और राजनीतिक पार्टियों के बीच रिश्ते को कैसे पारदर्शी बनाया जाए. यह पारदर्शिता अगर आएगी तो पूरा सिस्टम ही साफ होगा और अंबानी-अडानी के नाम की राजनीति भी बंद हो जाएगी.