बीते दिनों जातिगत जनगणना की मांग ने एक बार फिर से जोर पकड़ लिया. बिहार 10 राजनीतिक दल इस मुद्दे पर पीएम मोदी से मिले. खास बात यह थी कि इन 10 दलों में आरजेडी और नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू दोनों एक साथ थीं. यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने भी इस मुद्दे को लोकसभा में उठाया था. उनके पिता मुलायम सिंह यादव और आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव लंबे समय से ही जातिगत जनगणना की मांग करते रहे हैं. बीते समय में क्षेत्रीय पार्टियां राजनीति में हाशिए पर चली गई हैं. बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड हिट है जिसकी वजह पिछड़ी जातियों के बूते पर राजनीतिक करने वाले दलों की स्थिति कमजोर हो चुकी है. ऐसे समय में जातिगत जनगणना की मांग, पूरी राजनीति को पलटने वाली हो सकती है. आज हम जातिगत जनगणना के अलग-अलग पहलुओं के बारे में बात करेंगे.

पिछली बार कब हुई थी जाति जनगणना-

देश में पिछली बार जातिगत जनगणना आजादी के पहले 1931 में हुई थी. उसके बाद 1941 में जातिगत जनगणना ज़रूर हुई लेकिन उसके आंकड़े जारी नहीं किए गए. 1951 से लेकर पिछली जनगणना यानि 2011 SC-ST की जनगणना का डेटा ज़रूर दिया गया लेकिन ओबीसी का आंकड़ा नहीं दिया गया. 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के समय एक ऐसा बदलाव हुआ जिसने भारतीय राजनीति को भी काफी प्रभावित किया. वीपी सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिश पर, पिछड़ी जातियों के लिए सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान कर दिया. आपको बता दें कि यह आरक्षण 1931 की जनगणना के आधार पर ही दिया गया जिसके मुताबिक देश में 52% आबादी पिछड़े वर्ग की थी.

जातिगत जनगणना पर राजनीति-

क्षेत्रीय दल जातिगत जनगणना पर लगातार एक जैसा रवैया रखते हैं लेकिन राष्ट्रीय दल, बीजेपी और कांग्रेस दोनों का रवैया अलग है. दोनों ही पार्टियां विपक्ष में होने पर जातिगत जनगणना की मांग करती हैं वहीं सरकार में आने पर टालामटोली करने लगती हैं. 2011 में दिवंगत बीजेपी नेता गोपीनाथ मुंडे ने संसद में ओबीसी की जनगणना का मुद्दा उठाया था. मुंडे ने तब भाषण देते हुए कहा था कि अगर इस बार भी ओबीसी की जनगणना नहीं की गई तो उनके साथ अन्याय होगा. मोदी सरकार एक में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने जनगणना में ओबीसी की जनगणना कराने की बात कही थी. कांग्रेस ने 2011 में जातिगत जनगणना तो नहीं करवाई लेकिन लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह जैसे सहयोगियों के दबाव में कुछ कदम ज़रूर उठाए लेकिन विपक्ष में आने के बाद अब वो जातिगत जनगणना ही करवाने की मांग कर रही है.

जातिगत जनगणना के साथ आरक्षण की समीक्षा की क्यों है ज़रूरत है?

ओबीसी को अभी के समय में 27 फीसदी आरक्षण, 1931 की उनकी जनगणना के आधार पर ही मिल रहा है. उसके बाद से ओबीसी में जातियों की संख्या में भी इजाफा हुआ है और जनसंख्या में भी. 1931 में ओबीसी की जनगणना 52 फीसदी थी. सीधी सी बात है कि इतने दिनों में इस प्रतिशत में बदलाव तो हुआ ही होगा. संख्या में कमी होने की गुंजाइश कम है इसलिए यह संख्या बढ़ी ही होगी. इसलिए, जाति आधारित इस देश में कम से कम इतना तो पता ही होना चाहिए कि एक बड़े वर्ग की आबादी कितनी है, ताकि उनके हिसाब से बनाई जाने वाली योजनाओं का फायदा सही लोगों को मिल सके. 2014 की राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट भी कहती है कि पिछड़े वर्ग में जातियों की संख्या बढ़ी है इसलिए उन्हें 27 फीसदी से ज्यादा आरक्षण मिलना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए. ऐसे में अगर 50 फीसदी में ही, ओबीसी के लिए आरक्षण बढ़ाया जाएगा तो SC-ST का आरक्षण कम होगा. ऐसे में सरकार को उनके विरोध का सामना करना पड़ेगा.
इस समस्या का हल भी राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट में था. आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति बी ईश्वरैया ने तब कहा था कि पहले से आरक्षण का लाभ ले रही पिछड़ी जातियां, जो विकसित हो चुकीं हैं, इनकी पहचान कर हटाया भी जाना चाहिए. जो जातियां शैक्षणिक, सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़ी हैं, उन्हें ही आरक्षण मिलना चाहिए.

जातिगत जनगणना से लेकर आरक्षण की समीक्षा तक में दिक्कत क्या है?
आपको 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव याद करना चाहिए. चुनाव से ठीक पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक बयान दिया था. मोहन भागवत ने तब आरक्षण की समीक्षा की बात की थी. उस चुनाव में, आरजेडी और जेडीयू एक साथ चुनाव लड़ रहे थे. दोनों ही पार्टियों ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया. यह चुनाव बीजेपी हार गई थी. माना जाता है कि मोहन भागवत के बयान की इस हार में बड़ी भूमिका थी. जातिगत जनगणना से लेकर आरक्षण की समीक्षा तक में यही समस्या है. जातिगत जनगणना के बाद अगर ओबीसी की संख्या ज्यादा निकलती है तो जाहिर सी बात है कि आरक्षण का प्रतिशत 27 फीसदी से बढ़ाना होगा. अगर यह 50 फीसदी में से दिया गया तो SC-ST वर्ग की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा. आज के दौर में कोई भी पार्टी यह नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगा. अगर संसद में कानून बनाकर 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण किया गया तो सवर्ण वर्ग नाराज होगा और अगर आरक्षण की समीक्षा की गई तो ओबीसी से बाहर होने वाली जातियां नाराज होंगी. कुल मिलाकर इसमें सियासत का ऐसा खेल हो जाएगा कि बीजेपी जैसी पार्टी की राजनीति खत्म हो सकती है.

राजनीति से इतर अगर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के हिसाब से ही अगर 50 फीसदी आरक्षण के भीतर ही आरक्षण दिया जाना है तो जातिगत जनगणना के साथ, आरक्षण की समीक्षा ही सबसे बेहतर विकल्प हो सकती है, ताकि समाज के वास्तविक पिछड़े तबके को उसके लिए बनने वाली योजनाओं का लाभ मिल सके.