बीते दिनों हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भावुक हो गए. कोरोना काल में मारे गए लोगों के बारे में बात करते हुए वह भावुक हुए और कहा कि न जाने हमारे कितने लोग हमें छोड़कर चले गए. वैसे तो भावुक होने के मामले याद किए जाएं तो नरेंद्र मोदी जी ही बार-बार याद आते हैं लेकिन फिर भी उनके इस 'मास्टस्ट्रोक' को देखकर ब्रिटिश पीएम विंस्टन चर्चिल की याद आ गई. प्रधानमंत्री ने बीते साल आपदा में अवसर बनाने की बात कही थी. वह अक्सर भावुक होकर आपदाओं में अपने लिए अवसर बना लेते रहे हैं. विंस्टन चर्चिल ने भी 1952 में ऐसा ही किया था.

दरअसल 1952 में लंदन में प्रदूषण के चलते धुंध छा गई. हालत ये थी कि लोगों का दिन के उजाले में भी सड़कों पर चलना मुश्किल था. तमाम प्रदूषण के चलते कई लोग सड़क दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे थे. विंस्टन चर्चिल उस समय अपनी बढ़ती उम्र के चलते अपने ही कैबिनेट के सहयोगियों के निशाने पर थे और धुंध ने उनको और भी ज़्यादा कठघरे में खड़ा कर दिया. सबसे आपत्तिजनक था पीएम का इस आपदा को भगवान की मर्जी बताना. अखबारों के पन्नों पर रोज लोगों की मौतों की खबरें छपती थीं. फिर भी विंस्टन चर्चिल अपने पर अड़े थे और ऐसा बर्ताव कर रहे थे जैसे इस सबसे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता.

महारानी एलिजाबेथ को गद्दी संभाले कुछ ही दिन हुए थे. ब्रिटिश राजशाही उन दिनों उस दौर में जा चुकी थी जब वह सरकार की एक संरक्षक की भूमिका में थी. शासन में हस्तक्षेप और प्रधानमंत्री को आदेश देने जैसे भूमिका से राजशाही दूर हो चुकी थी. लेकिन एलिजाबेथ नई थीं और उन्हें इस भूमिका में सेट होने में समय लग रहा था. लंदन की बदहाली देखकर वह हस्तक्षेप के लिए तैयार थीं.

इसी बीच एक घटना घटी. पीएम की असिस्टेंट वेनेतिया स्कॉट की रूममेट की तबीयत धुंध के चलते खराब हो गई. वेनेतिया अपनी रुममेट को लेकर हॉस्पिटल गईं. वहां की हालत खराब थी. जरूरी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी थी. वेनेतिया ने डॉक्टर से बात की और कहा कि वह प्रधानमंत्री कार्यालय से बात करके सुविधाएं उपलब्ध करवा सकती हैं. वेनेतिया हॉस्पिटल से प्रधानमंत्री कार्यालय के लिए निकलीं, लेकिन पहुंच नहीं सकीं और धुंध के चलते एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गईं. चर्चिल को यह पता चला तो वह दुखी हुए, उन्होंने वेनेतिया के शव को देखने के लिए हॉस्पिटल जाने की इच्छा जताई. उधर बेकाबू होते हालात देखकर महारानी का धैर्य जवाब दे गया और उन्हें चर्चिल को मुलाकात के लिए बुलाया. चर्चिल को खुद भी अंदाजा था कि महारानी इस मुलाकात में नाराज होने वाली हैं.

चर्चिल, हॉस्पिटल गए और असिस्टेंट के शव को देखा. उनके दिमाग में विचार आया. उन्होंने अपने एक और असिस्टेंट से वहीं मीडिया बुलाने के लिए कहा. मीडिया आई, पीएम भावुक हुए और वहीं उन तमाम सुधारों का ऐलान कर दिया जिससे लंदन में दोबारा घुंध न छाए. इसके बाद पूरा खेल पलट गया. अखबारों में चर्चिल के उन तमाम बड़े फैसलों की खबरें जो उन्होंने एक अस्पताल से खड़े होकर किए थे. महारानी के साथ उनकी पहले से तय मुलाकात तो हुई लेकिन महारानी ने नाराजगी तो दूर धुंध के मामले का जिक्र तक नहीं किया. आंकड़ों के मुताबिक उस धुंध सेल लदंन में 4000 हजार लोग मारे गए और न जाने कितने बुरी तरह बीमार हुए लेकिन चर्चिल के एक कथित मास्टस्ट्रोक ने उनके लिए सब कुछ ठीक कर दिया.

हमारे पीएम नरेंद्र मोदी भी भावुक होते रहे हैं. कभी नोटबंदी के बाद, तो कभी ऊना में दलितों की पिटाई के बाद. उनके भाषण पर जनता का भरोसा रहा है. उन्होंने नोटबंदी के बाद 50 दिन मांगे और जनता ने उन्हें सच्चा मान लिया. 2014 से 2019 के सफर में वह कई बार मुसीबतों पर घिरे और जनता के साथ उनके संवाद ने कहीं न कहीं उन्हें मदद पहुंचाई. चर्चिल की तरह मीडिया उनके साथ रहा ही.

कोरोना की दूसरी वेव में 1 लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. शुरुआती दिनों में जब पीएम को दिल्ली में तैयारी करनी चाहिए थी, तब वो बंगाल की रैलियों में भीड़ देखकर आहलादित हो रहे थे. शुक्र है उन्होंने चर्चिल की तरह इसे भगवान की इच्छा नहीं बता दिया. जनता की प्रतिक्रिया देखकर लगता है कि प्रधानमंत्री का 'भावुकास्त्र' इस बार फेल हो गया है लेकिन उनका रिकॉर्ड देखकर लगता है कि वह कोई 'मास्टरस्ट्रोक' जरूर खेलेंगे. मीडिया-सोशल मीडिया आहलादित हो जाएंगे और प्रधानमंत्री के लिए सब कुछ ठीक हो जाएगा.