देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव का ऐलान जल्द होने वाला है. इन राज्यों में चुनाव प्रचार की शुरूआत हो चुकी है. यूपी देश की सियासत का बड़ा केंद्र है, इसलिए सभी राज्यों में यूपी की अहमियत सबसे ज़्यादा है. 403 विधानसभा सीटों वाले इस प्रदेश में बीते 3 कार्यकाल से लगातार बहुमत की सरकार बन रही है. एक जमाने में पूर्ण बहुमत यूपी के लिए एक कल्पना सा बन चुका था जिसे 2007 में बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने असलियत बनाया और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. उनके बाद 2012 में अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा ने पूर्ण बहुमत पाया और सरकार बनाई. सपा के बाद 2017 में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत से कहीं ज़्यादा सीटें (312) पाईं और सरकार बनाई. पिछली दो सरकारों के मामले में खास बात यह थी कि चुनाव में पूर्ण बहुमत होने के बावजूद दोनों ही पार्टियां सत्ता में वापसी नहीं कर पाईं और बुरी तरह हारीं. न केवल विधानसभा चुनावों में बल्कि बीते दो लोकसभा चुनावों में भी दोनों पार्टियां बुरी तरह हारीं. सवाल उठता है कि क्या बीजेपी इस सिलसिले को तोड़ पाएगी?

ऊपर पूछे गए सवाल का सीधा सा जवाब हो सकता है, हां या न. लेकिन यह राजनीति है और संभावनाएं यहां कभी खत्म नहीं होतीं. जब संभावनाओं की हो रही हो तो यह ज़रूरी है कि वाकई में जिसकी संभावना है उसकी चर्चा की जाए. पहला तथ्य यह है कि इस चुनाव में बीएसपी और कांग्रेस के लिए कोई संभावना नहीं हैं. बीएसपी की हालत इससे पहले ग्राउंड पर शायद ही कभी इतनी कमजोर रही हो. इस चुनाव में बीएसपी के उम्मीदवार न तो कहीं नजर आ रहें और न ही उनकी नेता. सतीश मिश्रा के हाथ में चुनाव की कमान है और मायावती प्रेस कॉन्फ्रेंस के अलावा अब तक पूरी तरह सक्रिय नजर नहीं आ रही हैं. सबसे बड़ी बात है कि जनता के बीच उनकी चर्चा न के बराबर है. यह अलग बात है कि उनका एक मजबूत वोट बैंक है जो हमेशा उनके साथ नजर आता है पर बड़ा सवाल है कि क्या इस बार यह वोट बैंक भी पूरा उनके साथ जाएगा या इसमें भी छिटकेगा? कुल मिलाकर मायावती के लिए यह लड़ाई चुनाव जीतने की नहीं बल्कि अब अपना वोट बैंक ही बचाने तक सीमित रह गई है, ताकि आगे कभी फिर से खड़ा हुआ जा सके.

कांग्रेस की बात करें तो यूपी में यह सदाबहार पार्टी है. हर चुनाव में इनका एक ही हाल होता है. वही हाल इस बार भी होने वाला है. पार्टी का कैडर कहीं नजर नहीं आ रहा है. प्रियंका गांधी और अजय सिंह लल्लू ही कांग्रेस के नाम पर नजर आ रहे हैं. बगैर संगठन के कोई चुनाव जीतना बहुत मुश्किल है और कांग्रेस जितनी जल्दी यह बात समझ ले बेहतर होगा. यह चुनाव उनके लिए इस बात का होगा कि देख लें कि प्रियंका गांधी के सिर्फ़ नाम के आधार पर उन्हें कितना वोट या सीटें मिल सकती हैं, ताकि आने वाले चुनावों में जमीनी सच्चाई के हिसाब से तैयारी की जाए.

अब आते हैं मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के ऊपर. समाजवादी पार्टी पूरी तरह सक्रिय है. इसके कार्यकर्ता और नेता दोनों ही सड़कों पर नज़र आ रहे हैं. पार्टी के पास में टिकटों के लिए उम्मीदवार भी हैं और यादव और मुस्लिम का एक बड़ा गठजोड़ भी है. यादवों के साथ-साथ मुस्लिम खुले तौर पर समाजवादी पार्टी के साथ नजर आ रहे हैं. इसके अलावा, पार्टी ने कोशिश की है कि दूसरी जातियों के भी लोग पार्टी से जुड़ें. इसके लिए हाल ही में पार्टी ने अलग-अलग जातियों के लोगों को पार्टी में शामिल करवाया है लेकिन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नेता के साथ-साथ दूसरी जातियों के लोग भी पार्टी का समर्थन करें. जो बेहद मुश्किल है. सपा के शासन के समय की गुंडाराज और मुस्लिमपरस्त होने की छवि पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है जो एक सामान्य वोटर को सपा को वोट करने से रोकेगी. यह तभी संभव है जब सत्ताधारी दल के खिलाफ बिल्कुल ही गुस्से का माहौल हो. जो फिलहाल नजर नहीं आता है. फिर भी समाजवादी पार्टी अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही है और बीजेपी कोई बड़ी गलती करती है तो सपा के लिए मौका बन सकता है.

आखिर में बात सत्ताधारी दल बीजेपी की. इस बात में किसी को संदेह नहीं है कि बीजेपी जमीनी और नेतृत्व स्तर, दोनों जगह ही मजबूत है. पार्टी के पास कैडर भी है और मोदी-शाह जैसे धुरंधरों के हाथ उनके चुनाव प्रचार की कमान है. पार्टी ने लगातार मुफ्त राशन, प्रधानमंत्री आवास योजना और नकद मदद और किसान सम्माननिधि जैसी योजनाएं चलाईं हैं जिसकी वजह से हर जाति के लोग कहीं न कहीं उनके साथ खड़े नजर आते हैं. लोग खुलकर भी बीजेपी के साथ खड़े हैं और बहुत से लोग बेहद शांति से. लोगों को मदद पहुंचाने वाली योजनाओं के अलावा, पार्टी के पास हिंदू-मुस्लिम का कार्ड भी है. जिस तरह इस बार के चुनाव में मुस्लिम सपा के साथ खुलकर खड़े नजर आ रहे हैं उससे बीजेपी की राह आसान ही होने वाली है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि पार्टी के सामने चुनौतियां नहीं हैं. कोरोना काल के समय का कुप्रबंधन, मौजूदा विधायकों से नाराजगी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से होने वाला नुकसान, और प्रतियोगी परीक्षाओं का कुप्रंधन पार्टी की चिंता बढ़ाते हैं. इन सबके बावजूद बीजेपी मजबूत नजर आ रही है. तो आर्टिकल की शुरूआत में हमने जो सवाल पूछा था उसका जवाब- "हां" है. हालांकि, जिन चुनौतियों का हमने जिक्र किया है उन्हें बीजेपी को दूर करना होगा. वर्ना यह राजनीति है और इसमें कुछ भी संभव है. आज हमने पार्टियों की संभावनओं के बारे में बात की. कल हम इस पर बात करेंगे कि बीजेपी की सत्ता में वापसी के बड़े कारण क्या हो सकते हैं. इसके बाद हम इस पर भी बात करेंगे कि वो कौन से कारण हैं जो बीजेपी को सत्ता से दूर कर सकते हैं.