यूपी चुनाव के बारे में कल हमने लिखा था कि बीजेपी एक बार फिर सत्ता में वापसी कर सकती है. आखिर क्या कारण हैं कि बीजेपी 5 साल सत्ता में रहने के बाद, इसके अलावा केंद्र में भी सत्ता में रहने के बाद एक बार फिर से सबसे मजबूत नजर आ रही है. आज हम उन कारणों के बारे में लिखेंगे जो इस चुनाव में बीजेपी की जीत के बड़े फैक्टर बन सकते हैं.

1. लोगों को सीधे तौर पर फायदा पहुंचाने वाली योजनाएं- एक बड़ा ही सस्ता और आसान सा विश्लेषण हर जगह घूमता रहता है कि बीजेपी की जीत के पीछे सबसे बड़ा हाथ हिंदू मुस्लिम राजनीति का है. ऐसा करके दरअसल लोग उन तमाम गरीबों का मजाक उड़ाते हैं जो उनको मिलने वाली योजनाओं के फायदे के बदले में बीजेपी को वोट करते हैं. ये वो लोग हैं जिन्हें हिंदू-मुस्लिम से कोई मतलब नहीं है. ये घुल मिलकर रहते हैं. हां, ये ज़रूर है कि उन्हें बीजेपी की हिंदू-मुस्लिम राजनीति से कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि उन्हें सरकार से रहने को मकान और खाने को राशन मिल रहा है जो मूलभूत आवश्यकताएं हैं.

यूपी में बीजेपी की अगर सत्ता में वापसी होगी तो उसके पीछे सबसे बड़ा कारण लोगों को कुछ योजनाओं के ज़रिए सीधे तौर पर मिलने वाला फायदा होगा. खास बात यह है कि यह योजनाएं उन लोगों तक पहुंची हैं जिन तक पहुंचनी चाहिए और ये वो लोग हैं जो जमकर वोट डालते हैं. इन योजनाओं में सबसे बड़ी योजना 'प्रधानमंत्री आवास योजना' है. गरीबों को आवास देने वाली इस योजना ने कम से कम छोटे शहरों से तमाम पुराने कच्चे घरों को गायब सा कर दिया है. अधिकतर लोगों के पुराने मकान गिरकर के नए बन चुके हैं. ये वो लोग हैं जिनके लिए पक्का नया घर एक सपना सा था.
प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनवाने वाले एक शख्स ने पीपुल पोस्ट से बातचीत में कहा, "हमारी 7 बेटियां थीं. बेटियों की शादी करते या घर बनवाते? हम तो अपनी जिंदगी में घर बनवा नहीं पाते. हम तो हमेशा बीजेपी के साथ खड़े होंगे". ऐसे ही तमाम लोग हैं जिनके घर इस योजना की वजह से बने हैं.

ऐसा नहीं है कि अन्य योजनाओं की तरह इस योजना में भ्रष्टाचार नहीं है. अधिकतर लाभार्थी बताते हैं कि उन्हें घूस के तौर पर 20,000 रूपये पहली किश्त आने पर देने पड़े. दूसरी तरफ तमाम ऐसे लोगों ने योजना का फायदा पाया है जो वास्तविकता में इसके पात्र नहीं थे. लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि जो लोग पात्र थे उन्हें फायदा ज़रूर मिला है इसका असर चुनाव में देखने को मिलेगा. प्रधानमंत्री आवास योजना की तरह ही किसान सम्मान निधि योजना भी बीजेपी को बड़ा फायदा पहुंचाने वाली है. दिल्ली के बॉर्डरों पर भले ही किसान बैठे हों और पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर उसका असर पड़ा हो लेकिन तमाम ग्रामीण क्षेत्रों में इस योजना के तहत आने वाली किश्त से लोग बेहद खुश भी रहे हैं. प्रधानमंत्री आवास योजना की तरह इसमें भी भ्रष्टाचार है लेकिन पात्रों को लाभ मिल रहा है और वो लोगों को फायदा पहुंचाने वाला है.

इसके अलावा कोरोना की दूसरी लहर के समय से बंटने वाला मुफ्त राशन बीजेपी के लिए सफलता की बड़ी वजह बनने वाला है. पेट्रोल-डीजल और खाने-पीने की चीज़ों की मंहगाई के बीच यह एक बड़ा फैक्टर रहा जिसकी वजह से आम जनता बीजेपी के खिलाफ बहुत ज्यादा खड़ी नजर नहीं आई.

इसके लाभार्थियों में मध्यम और निम्न वर्ग, दोनों वर्गों के लोग शामिल हैं और ये वो लोग हैं जो खुलकर वोट डालना पसंद करते हैं. सबसे बड़ी बात है कि इन योजनाओं का हर जाति-धर्म के लोगों को मिला है. इसमें मुस्लिम भी शामिल है. ये बात अलग है कि वो बीजेपी को वोट नहीं करेंगे लेकिन हिंदुओं में बाकी जातियों के लोग, जो आम तौर पर दूसरी पार्टियों के वोटर माने जाते हैं वे बीजेपी के साथ जा सकते हैं और वो एक बड़ा फायदा होगा.

2. ध्रुवीकरण का फायदा- यूपी चुनाव में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी प्रतिद्धंदी समाजवादी पार्टी है. इस पार्टी के ऊपर मुस्लिम परस्त होने का आरोप लगता रहा है. 2012 में मुजफ्फरनगर के दंगों को भी मुस्लिम तुष्टीकरण का परिणाम माना गया जिसने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पूरी राजनीति को बदलकर रख दिया. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पूरे प्रदेश में ये संदेश गया कि सपा मुस्लिमवादी पार्टी है और हमेशा उन्हीं के साथ खड़ी होती है. नतीजा यह हुआ कि सपा के कोर वोटर यादव को छोड़कर बाकी जातियों ने सपा से किनारा कर लिया. एक बात यहां यह भी ध्यान रखना ज़रूरी है कि सोशल मीडिया पर सपा भले ही दलितवादी पार्टी बने लेकिन यूपी में जमीनी स्तर पर यादवों और दलितों का विरोध कोई छुपी हुई बात नहीं है.

मौजूदा चुनाव भी सपा की उसी छवि के साथ ही जा रहा है. यूपी या देश में कहीं भी मुस्लिमों की राजनीति एक दम साफ है. वो उसे वोट करते हैं जो बीजेपी को हराने में सक्षम होता है. यूपी में फिलहाल, बीएसपी और कांग्रेस दोनों ही इस हालत में नहीं हैं कि उन्हें इस नाम पर वोट दे दिया जाए कि वो बीजेपी को हरा पाएंगी. ऐसे में मुस्लिम इस चुनाव में खुले तौर पर सपा के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. सपा के लिए अच्छाई भी यही है और बुराई भी. ऐसा नहीं है कि अखिलेश यादव इस समीकरण को समझते नहीं हैं. इस चुनाव में वो अपने सबसे बड़े मुस्लिम चेहरे आजम खान का नाम तक नहीं ले रहे. आजम खान इस समय जेल में हैं और अखिलेश यादव उनका किसी भी तरह से जिक्र नहीं कर रहे हैं. मुस्लिम राजनीति को लेकर सपा की रक्षात्मक नीति यहां बिल्कुल साफ नजर आती है. इस नीति के बावजूद मुस्लिमों का सपा के साथ खुलकर खड़े होना बीजेपी की राह आसान कर रहा है. उनके सामने प्रतिद्वंदी साफ है और वो उसके बारे में आक्रामकता के साथ अपना चुनाव प्रचार कर सकते हैं. सीएम योगी के भाषणों में जिस तरह से लगातार मथुरा में मस्जिद की जगह मंदिर बनवाने की बात की जा रही है वो एक इसी आक्रामक नीति का हिस्सा है. बीजेपी को पता है सामने से इसका पलटवार नहीं होने वाला है.

3. मजबूत संगठन और योगी-मोदी का चेहरा- बीजेपी संसाधनों में इस समय सबसे धनी पार्टी है. उसके पास पैसे भी हैं और कार्यकर्ता भी और इनका इस्तेमाल करने के लिए दो बड़े चेहरे भी हैं. काशी विश्ननाथ कॉरिडोर के उद्घघाटन के समय पीएम मोदी के मीडिया में छवि चित्रण ने दिखाया कि इस चुनाव में सबसे बड़े चेहरे पीएम मोदी ही होने वाले हैं. इससे पहले भी एक फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जिसमें पीएम मोदी- सीएम योगी के कंधे पर हाथ रखकर उन्हें कुछ समझाते नजर आ रहे थे. वो तस्वीर और पीएम मोदी के बारे में खास कवरेज दिखाती है कि चाहें यूपी हो या कोई भी प्रदेश सबसे बड़े नेता वहीं हैं. भले ही तमाम लोग उनके विरोधी हों लेकिन उनके जैसे कट्टर समर्थक शायद ही किसी नेता के रहे हों. उनके समर्थक और वोटर साफ देखते हैं कि एक तरफ अखिलेश यादव हैं जिनके परिवार के न जाने कितने लोग सियासत में हैं वहीं दूसरी तरफ मोदी और योगी अपने परिवारों को छोड़कर राजनीति में हैं. कुल मिलाकर चेहरे और संसाधनों की लड़ाई में भी बीजेपी दूसरी पार्टियों से आगे नजर आ रही है.

ऊपर बताए गए तीन बड़े कारणों की बीजेपी की जीत में बड़ी भूमिका हो सकती है. इन कारणों की वजह से कहीं न कहीं बीजेपी आज बाकी पार्टियों से आगे दिख रही है. अगले आर्टिकल में हम बात करेंगे कि वो कौन से बड़े फैक्टर हैं जो बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकते हैं और कोई बड़ी गलती होने पर उन कारणों की वजह से बीजेपी सत्ता से बाहर भी हो सकती है.