भारत एक ऐसा देश है जहां हर कोई राजनीतिज्ञ है. चाहें वह किसी राजनीतिक दल में शामिल हो या न हो. मौजूदा दौर में मीडिया वर्ग लगातार इस जुगत में है किस तरह से राजनीतिक पार्टियों की जगह ली जाए. इनकी राजनीति एक दम सीधी है. एक पक्ष मोदी जी के साथ तो दूसरा खिलाफ है. दोनों अपने-अपने प्रयासों से देश का नुकसान करने में लगे रहते हैं. ताज़ा मामला खिलाफ वालों का है. दरअसल अफगानिस्तान में तालिबान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है. देश के अंदर सभी इस बात पर रिएक्ट कर रहे थे. अधिकतर लोग तालिबान के खिलाफ बोल रहे थे वहीं कुछ लोग तालिबान का समर्थन भी कर रहे थे.

कुछ लोग तालिबान की आलोचना के नाम पर हिंदू आतंकवाद की थ्योरी भी पेश कर रहे थे. ऐसे में कुछ लोग वो भी थे जो भारत सरकार का बयान सुनना चाहते थे. तालिबान पर भारत सरकार क्या कहती है ये जानने की इच्छा ऐसे लोगों के मन में बलवती हो रही थी. इस बयान को सुनने की इच्छा इसलिए हो रही थी क्योंकि कुछ लोग तालिबान का समर्थन कर रहे थे. इनमें कुछ सीधे तौर पर कर रहे थे जबकि कुछ घुमा फिराकर. ऐसे में ऐसे लोगों को दूसरे पक्ष ने तालिबान परस्त बताया. इन तालिबान परस्तों के हितैषियों को यह बात पसंद नहीं आई और उन्होंने सरकार से बयान की मांग कर दी. ये लोग अपनी राजनीति के बीच यह भूल गए कि इस समय देश के कई नागरिक अफगानिस्तान में फंसे हुए हैं और उन्हें निकालने की ज़िम्मेदारी सरकार की है. अगर सरकार इस समय तालिबान के विरोध में कोई बयान देती है तो उन नागरिकों की वापसी संकट में फंस सकती है. भारत सरकार की पहली प्राथमिकता इस समय में अपने नागरिकों को वहां से सुरक्षित निकालना था ना कि बयानबाजी करना. इस बात पर भी ध्यान देने वाली बात है कि भारत सरकार के किसी उकसावे के बगैर ही तालिबान ने भारत के 150 से ज्यादा नागरिकों को पकड़ लिया था और कूटनीतिक प्रयासों से उन्हें छुड़ाया जा सका. अगर भारत सरकार भारत के इन कथित राजनीतिज्ञों के दबाव में आकर तालिबान के खिलाफ आक्रामक बयान दे देती तो उसका परिणाम क्या हो सकता था?

अब ताज़ा बयान इस पर आने शुरू हुए हैं कि कतर में तालिबान के साथ भारत सरकार ने बातचीत कैसे कर ली. पीएम मोदी के वे पुराने बयान निकाले जा रहे हैं जो उन्होंने तालिबान के खिलाफ दिए थे. तालिबान अब अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो चुके हैं. अफगानिस्तान के विकास से लेकर चाबहार पोर्ट तक में भारत ने निवेश किया हुआ है. इसके अलावा, आतंकी गतिविधियों न बढ़ें इसके लिए दो ही विकल्प हैं या तो तालिबान के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया जाए. मुझे नहीं लगता कि भारत का कोई भी कथित बुद्धिजीवी इसे लेकर सहमत होगा. दूसरा विकल्प है कि तालिबान से बात की जाए. कुछ समझौते किए जाएं ताकि नुकसान की संभावना को कम से कम किया जा सके. हालांकि, यह तय है कि बातचीत से शायद ही कोई नतीजा निकले लेकिन आखिर विकल्प है भी क्या?

तालिबान आतंकी संगठन है और कितना भी उदार बनने की कोशिश कर ले लेकिन एक दिन अपना असली रंग ज़रूर दिखाएगा. तालिबान के पिछले शासनकाल में भारत ने कांधार प्लेन हाइजैक का दंश झेला था. उस समय भारतीयों नागरिकों की रिहाई के बदले मौलाना मसूद अजहर जैसे आतंकियों को छोड़ना पड़ा था जो पाकिस्तान में बैठकर आज भी भारत को नुकसान पहुंचा रहे हैं. ऐसे में तालिबान कब तक कोई शैतानी हरकत नहीं करेगा ये देखने वाली बात होगी. भारत की दिक्कत ये है कि चाहकर भी इस मामले पर कुछ किया नहीं जा सकता क्योंकि कुछ करने की स्थिति में नुकसान ही हो सकता है. भारत में फ्रीलांसर राजनीतिज्ञों को हालात की गंभीरता को समझना चाहिए और इस तरह की उल्टी सीधी बयानबाजी बंद कर देनी चाहिए जिससे भारत के नागरिकों का ही नुकसान हो सकता है.