कल 16 दिसंबर था. 2012 में कल ही रात एक ऐसी वारदात हुई थी जिसके बाद पूरे देश में उबाल आ गया था. 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में निर्भया से गैंगरेप की वारदात हुई थी. देश की राजधानी की सड़क पर हुए इस दुर्दांत कांड ने सभी को हिलाकर रख दिया था. हालांकि, ऐसा नहीं था कि घटना के तुरंत बाद ही लोगों में गुस्सा आ गया हो. मुझे याद है कि वारदात के अगले दिन अखबार के पहले पन्ने पर यह खबर ज़रूर थी लेकिन हेडलाइन नहीं थी. चूंकि मामला देश की राजधानी का था इसलिए पहले पेज पर इस खबर को जगह ज़रूर मिल गई लेकिन शायद किसी को भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि यह केस कितनी जल्दी मीडिया में छा जाएगा.

उस वक्त काफी प्रदर्शन हुए. नए कानूनों की मांग हुई और कुछ बने भी. लेकिन क्या वाकई जमीनी सुधार हुए? निर्भया केस एक बड़ा मामला था. मीडिया में चर्चित था. ऐसे मामलों में एक नजीर बनाने की कोशिश होती है लेकिन हालत ये हुई कि केस खत्म होने और सजा सुनाए जाने के बाद भी निर्भया के दोषियों को फांसी पर लटकने में सात साल से ज्यादा का समय लग गया. ये केस भी भारत की सुस्त न्याय प्रणाली का शिकार हो गया जहां न्याय, फ़ाइलों के पीछे-पीछे साल दर साल भटकता रहता है. शायद दोषियों को सजा मिलने में और भी समय लगता लेकिन अहमदाबाद में जब एक डॉक्टर से वैसी ही वारदात हुई और उसके बाद पुलिस ने एनकाउंटर में सभी आरोपियों को मार दिया तब जाकर कहीं न्याय व्यवस्था को लगा कि मामला हमारे हाथ से निकल रहा है. इसके बाद निर्भया केस में कार्रवाई आगे बढ़ी और अहमदाबाद कांड के दो या ढाई महीने के बाद निर्भया कांड के दोषी फांसी पर पहुंचे. हालांकि, ऐसा नहीं है कि रेप के दोषियों को फांसी देने या उनका एनकाउंटर कर देने से रेप रुक जाएंगे. ऐसा नहीं होने वाला, लेकिन एक नज़ीर बनाने की कोशिश की जाती है.

राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के आंकड़ों के मुताबिक, 2020 में देश में हर दिन रेप के 77 मामले दर्ज हुए. ये वो मामले हैं जो पुलिस तक पहुंचे हैं या जिनकी पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की है. तमाम ऐसे मामले होंगे जिनकी कोई सुनवाई नहीं हुई होगी या जिनमें पीड़ित पुलिस तक आए नहीं होंगे. लेकिन इस मामले में सवाल सभी पर उठता है? पुलिस और प्रशासन पर, कि वो रेप के मामलों को किस तरह से देखते हैं और किस तरह से उनकी जांच करते हैं और दूसरा समाज इन मामलों को कैसे देखता है? सामान्यता रेप के मामलों पर चर्चा तब ही होती है जब उनमें या तो कोई नेता या उसका संबंधी आरोपी हो और या पुलिस, पीड़ित के खिलाफ ही कार्रवाई करने लग जाए. इसमें भी एक बड़ी बात यह है कि हमारी मीडिया राजनीति और आतंकवाद की खबरों में खासी दिलचस्पी रखती है. लेकिन कभी कभी ऐसा होता है कि इन दोनों मामलों पर देश में शांति होती है. ऐसे में कोई मामला आता है और खाली जगह भरने के लिए मीडिया चैनल उसकी छानबीन में जुट जाते हैं. इसके बाद मामला फेसबुक और ट्विटर पर आता है जहां जस्टिस फॉर.,.... जैसे हैशटैग चलाए जाने लगते हैं और एक क्रांति का माहौल बन जाता है. आम लोग भी सोशल मीडिया पर अपने गुस्से का इजहार करने लगते हैं.

इस मामले में अखबार हमारे दोहरे चरित्र को उजागर करते हैं. आप अखबार पढ़िए. उनमें रोज रेप की वारदातों की खबरें होती हैं. आम जनता, बड़े पत्रकार सभी पूरी शालीनता से खबर को पढ़कर आराम से पन्ने पलटते हुए चले जाते हैं. कोई गुस्सा नहीं. सोशल मीडिया पर कोई चर्चा नहीं. फिर साल- दो साल में अचानक कोई मामला उठता है और सभी नींद से जाग जाते हैं. फिर सभी को न्याय चाहिए होता है. सभी यह बोलने लगते हैं कि रेप रुकने चाहिए. ऐसा लगता है कि न्याय, लोगों की रसोई में बनने वाली कोई सब्जी है जिसे जब चाहे दो सीटी लगाई और पका लिया.

अगर वाकई समाज गंभीर है और जो सोशल मीडिया का एक कथित समाज है वह गंभीर है तो उसे हर घटना को उठाना चाहिए. उस पर सवाल पूछने चाहिए और दोषियों को सजा दिलवाने की कोशिश करनी चाहिए. हम सब अपनी सरकारों के काम करने के तरीके को जानते हैं. जब तक दबाव नहीं पड़ता ये कुछ नहीं करते. बगैर किसी शोर-शराबे के भी सरकार से पूछना चाहिए कि ये जो 2020 में हर दिन 77 रेप केस हुए हैं इनमें दोषियों की सजा की स्थिति क्या है. पर दिक्कत ये है कि सभी इंतजार करते रहते हैं शोर शराबे का और शोर को शांत करने के लिए सिर्फ आश्वासन ही किए जाते हैं क्योंकि इस तरह से अचानक उठने वाले शोर को शांत करना कोई बड़ी बात नहीं है. नेता भी जानते हैं कि 2-4 दिन में सब शांत हो जाएंगे.