अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता पर कब्जा जमा चुका है. और अपनी अंतरिम सरकार की घोषणा भी कर दी है। पर इसी के साथ तालिबान के अंदर अलग अलग गुटों में मतभेद भी सामने आने लगे है। खबरों के मुताबिक मुल्ला गनी बरादर, मुल्ला याकूब और सिराजुद्दीन हक्कानी के बीच मतभेद हैं. मुल्ला याकूब जहां पूर्व तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर का बेटा है वहीं सिराजुद्दीन हक्कानी, हक्कानी नेटवर्क का प्रमुख है और हक्कानी नेटवर्क के पूर्व प्रमुख जलालुद्दीन हक्कानी का बेटा है. हक्कानी नेटवर्क इस समय तालिबान में प्रभावशाली भूमिका में है और बताया जा रहा है कि काबुल की कथित सुरक्षा हक्कानी नेटवर्क के हाथ में ही है. हालांकि, सिरजुद्दीन हक्कानी अभी तक सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आया है. हक्कानी नेटवर्क लंबे समय से अफगानिस्तान में सक्रिय है. हालांकि यह हमेशा से तालिबान का हिस्सा नहीं रहा है.

हक्कानी नेटवर्क की स्थापना जलालुद्दीन हक्कानी ने की थी. अफ़गानिस्तान में सोवियत संघ की सेनाओं से लड़ने के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने कई संगठनों को खड़ा किया. हक्कानी नेटवर्क उन्हीं संगठनों में से एक था. हक्कानी नेटवर्क का मुखिया जलालुद्दीन हक्कानी खुद को एक विद्रोही के तौर पर बताता था जिसे अंतर्राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त है. अमेरिका, हक्कानी को इतना ज्यादा समर्थन करत था कि सोवियत-अफ़गान युद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने जलालुद्दीन हक्कानी को 'फ्रीडम फाइटर' तक बताया. कुछ मीडिया रिपोर्ट तो यह भी बताती हैं कि हक्कानी व्हाइट हाउस तक का दौरा कर चुका था. अमेरिकी पत्रकार स्टीव कोल अपनी किताब 'The Bin Ladens' में लिखते हैं कि हक्कानी को अमेरिका ही नहीं, अरब देशों से भी बड़ा समर्थन हासिल था.

1996 में तालिबान के काबुल पर कब्जा कर लेने के बाद हक्कानी, तालिबान में शामिल हो गया. तालिबान ने उसे काबुल में उत्तरी हिस्से का कमांडर नियुक्त किया. इसके बाद, तालिबान सरकार में उसे पकटिया प्रांत में सीमा और कबायली मामलों का मंत्री बनाया गया. हालांकि तालिबान सरकार बहुत ज़्यादा लंबे समय तक नहीं चल सकी. 11 सितंबर 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर भीषण हमला हुआ. इसके जवाब में अमेरिका ने तालिबान सरकार पर ओसामा बिन लादेन को सौंपने का दबाव बनाया. तालिबान तैयार नहीं हुए और अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर दिया. इसके बाद अधिकतर तालिबानी नेता भाग गए या मारे गए. माना जाता है कि अमेरिका ने हमले से पहले, हक्कानी को तालिबान के खिलाफ होने के लिए कहा लेकिन हक्कानी इसके लिए तैयार नहीं हुआ. हक्कानी ने खुद के मुस्लिम होने का हवाला देते हुए मना कर दिया. साथ ही, उसने ओसामा बिन लादेन की भागने में मदद भी की. हालांकि, अमेरिका का हक्कानी प्रेम इसके बावजूद भी कम नहीं हुआ. अफगानिस्तान में 2016 से 2018 तक अमेरिकी और नाटो सेनाओं की कमान संभालने वाले अमेरिकी जनरल जॉन डब्ल्यू निकोल्सन जूनियर के मुताबिक, अमेरिकी और नाटो सेनाओं ने अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क को निशाना नहीं बनाया था.

इसी का नतीजा था कि अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद भी हक्कानी नेटवर्क न केवल बचा रहा बल्कि इस ग्रुप ने लगातार हमले भी किए. हक्कानी नेटवर्क ने 2008 में काबुल में भारतीय दूतावास पर हमला किया. आत्मघाती कार हमले में 58 लोगों की मौत हुई थी और 140 लोग घायल हुए थे. इस हमले में दो सीनियर भारतीय अधिकारियों की भी मौत हुई थी. माना जाता है कि यह हमला पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने हक्कानी नेटवर्क से करवाया था. इसके अलावा, 2008 में अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई की हत्या का प्रयास भी हक्कानी नेटवर्क ने किया.

हक्कानी के मामले में अमेरिका को अपनी गलती का पता 2008 में चला. जब अमेरिका ने उत्तरी वजीरिस्तान के एक घर पर ड्रोन हमला किया. यह हमला हक्कानी को निशाना बनाकर किया गया था लेकिन हक्कानी को शायद इस हमले की जानकारी पहले ही मिल गई थी और वह वहां से निकल चुका था. इस हमले में 23 लोगों की मौत हुई थी.

2018 में 3 सितंबर के दिन तालिबान ने एक बयान जारी कर जलालुद्दीन हक्कानी की मौत का ऐलान किया. माना जाता है कि हक्कानी, मौत के काफी पहले से ही बीमार था और उसे लकवा मार गया था. बीमारी के चलते ही उसने अपने संगठन की कमान, अपने बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी के हाथों में सौंप दी थी. जलालुद्दीन हक्कानी की मौत के समय माना जा रहा था कि अब अफगानिस्तान में शांति लौटेगी लेकिन उसके बेटे भी उसी के जितने खूंखार हैं. सिरजुद्दीन हक्कानी जहां सरकार में शामिल होगा, वहीं दूसरा बेटा अनस हक्कानी सरकार गठन को लेकर बातचीत करने वाले तालिबान के प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा है. अनस हक्कानी, अफगानिस्तान में होने वाले कई बर्बर हमलों में शामिल रहा है जिसके चलते उसे मौत की सजा भी सुनाई गई थी. हालांकि, 2019 में कुछ अमेरिकी पत्रकारों की रिहाई के बदले अनस हक्कानी को छोड़ दिया गया था.
तालिबान में हक्कानियों के वर्चस्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राजधानी काबुल में कथित सुरक्षा की जिम्मेदारी अभी हक्कानी नेटवर्क की है. काबुल एयरपोर्ट की भी सुरक्षा का नियंत्रण लेने के लिए अनस हक्कानी ही अपने आतंकियों के साथ पहुंचा था. बीबीसी के मुताबिक, सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर अब्दुल गनी बरादर और अनस हक्कानी के बीच मारपीट हुई जिसमें गनी बरादर घायल भी हो गया. मुल्ला गनी बरादर, तालिबान के उन लोगों में शामिल हैं जिन्होंने तालिबान की स्थापना की थी. इसके बावजूद, अनस हक्कानी ने उसके साथ मारपीट की. माना जाता है कि हक्कानी नेटवर्क को अभी पूरी तरह से पाकिस्तान का समर्थन हासिल है और तालिबान की सरकार में इस आतंकी संगठन का बड़ा प्रभाव भारत के लिए चिंता का विषय है. हक्कानी नेटवर्क की सबसे बड़ी ताकत, अलग-अलग सरकारों के साथ उसका गुप्त गठबंधन रहा है. पहले अमेरिका और अब पाकिस्तान. कुल मिलाकर अमेरिका का लगाया गया पौधा अब बड़ा हो गया है जिसे पाकिस्तान से लगातार पानी मिल रहा है और मुसीबतें भारत की बढ़ रही हैं.