2017 की बात है. जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैय्या कुमार यूपी के हरदोई आने वाले थे. वामपंथी संगठन भारत बचाओ भारत बनाओ यात्रा निकाल रहे थे और उसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए कन्हैय्या कुमार हरदोई आने वाले थे. कन्हैय्या के आने की सूचना लोगों की मिली और उनका विरोध शुरू हो गया. हिंदू सेना नाम के संगठन ने ऐसा विरोध किया कि कन्हैय्या कुमार ट्रेन से उतर तक नहीं पाए और उन्हें वापस जाना पड़ा. नेताओं का विरोध आम बात है. किसी भी दूसरे दल के समर्थक विरोध करते ही हैं लेकिन कन्हैय्या के साथ में समर्थन बिल्कुल नहीं था. नतीजा यह हुआ कि उन्हें भागना पड़ा. कन्हैय्या कुमार में जेएनयू में देश विरोधी नारेबाजी करने का आरोप था और उनको तमाम लोग देशद्रोही की तरह देखते हैं. कन्हैय्या कुमार जल्द ही कांग्रेस में शामिल होने वाले हैं.

अब पंजाब चलते हैं. यहां हाल ही में कांग्रेस पार्टी ने बदलाव किया है. कैप्टन अमरिंदर सिंह को सीएम पद से हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाया गया है. अपने नाम के मुताबिक ही, अमरिंदर सिंह, आर्मी के कैप्टन रहे हैं. हाल-फिलहाल वह कांग्रेस की छवि के विपरीत, अपनी अलग राष्ट्रवादी छवि रखते हैं. राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद, अमरिंदर सिंह को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग भी इसीलिए हुई थी. तमाम बातों पर असहमति के बावजूद इस बात पर सभी सहमत होते हैं कि पाकिस्तान हमारे देश का दुश्मन है और जो लोग हमारे यहां के निर्दोष लोगों और जवानों को मारते हैं उनसे संबंध नहीं रखना चाहिए लेकिन कांग्रेस पार्टी का हालिया नेतृत्व शायद इस बात की गंभीरता को नहीं समझता. कैप्टन अमरिंदर सिंह का इस्तीफा, नवजोत सिंह सिद्धू के दवाब में हुआ जो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना प्रमुख बाजवा के गले मिलकर आए थे.

पंजाब में अमरिंदर सिंह को हटाना और कन्हैय्या कुमार को पार्टी में लाना. दोनों काम एक साथ हो रहे हैं. पंजाब में हो सकता है कि अमरिंदर सिंह के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर हो. वह 80 साल के हैं. ऐसे में उनकी जगह नए नेतृत्व को मौका देने में कोई बुराई नहीं है लेकिन कांग्रेस पार्टी यही काम दूसरे तरीके भी कर सकती थी. कैप्टन अमरिंदर कह रहे हैं कि उन्होंने 3 हफ्ते पहले ही इस्तीफे की पेशकश की थी, तब उन्हें मना कर दिया गया. 3 हफ्ते में ही ऐसा माहौल बना दिया गया कि कैप्टन को इस्तीफा देना पड़ा और खुलकर कहना पड़ा कि वह अपमानित महसूस कर रहे हैं. एक तरफ राष्ट्रवादी विचारधारा का शख्स पार्टी में बुरी तरह हाशिए पर डाला जा रहा है जबकि देशद्रोही छवि वाले शख्स को पार्टी में लाया जा रहा है.

यह जानते हुए भी कि देश में राष्ट्रवाद का माहौल चरम पर है. कांग्रेस पार्टी उल्टे फैसले ले रही है. कल को कन्हैय्या कुमार को कोई अदालत बरी भी कर दे तो भी लोगों के बीच बनी हुई उनकी छवि इतनी आसानी से नहीं बदलने वाली. दूसरी बात यह भी है कि जेएनयू से निकलकर, कन्हैय्या एक चुनाव भी लड़ चुके हैं. बिहार में हर साल बाढ़ आती है. पिछले समय में हर जगह की तरह बिहार भी कोरोना से परेशान था. कन्हैय्या कुमार सभी बुरे दौर में गायब ही दिखे हैं. उनकी खुद की विचारधारा के लोग इसे लेकर उनकी आलोचना करते रहे हैं. छात्र जीवन में भाषण देना एक अलग बात है. अपने शुरूआती राजनीतिक जीवन में तो राहुल गांधी भी अपने भाषण और सादगी से चर्चा में रहते थे, लेकिन आगे वह लोगों से जुड़ नहीं पाए और आज भी वह बस भाषण देते ही नजर आ रहे हैं. कन्हैय्या कुमार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है. राहुल गांधी तो फिर भी 'राष्ट्रीय' नेता है लेकिन कन्हैय्या तो अपने क्षेत्र के लोगों से ही जुड़ नहीं पाए.

ऐसे में बेवजह देशद्रोही छवि वाले एक नेता को पार्टी में एंट्री देना और अच्छे खासे राष्ट्रवादी छवि वाले नेता को अपमानजनक तरीके से हटाना. यह दिखाता है कि कांग्रेस नेतृत्व पूरी तरह से देश के राजनीतिक माहौल से पूरी तरह कट चुका है. कांग्रेस के जो नेता शायद जनता के बीच रहते हैं वे आलाकमान के सामने सिर्फ़ सेवक की भूमिका में रहते हैं और आलाकमान की सलाहकार परिषद शायद जमीन पर उतरकर कभी जनता से बात करना पसंद नहीं करती.

कोरोना काल में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली के बाद, जब संसद सत्र हुआ तो पार्टी को सरकार को इस मुद्दे पर घेरना था. खासतौर पर तब जब युवा कांग्रेस के लोगों ने उस दौर में बहुत से लोगों की मदद की लेकिन व्यक्ति पूजा में लगी पार्टी को पेगासस का मुद्दा सूझा जिसका आम लोगों से कोई जुड़ाव नहीं था. कांग्रेस का मुद्दा यह था कि राहुल गांधी की जासूसी कैसे हुई. पूरा संसद पेगासस पर हंगामे की भेंट चढ़ गया और कोरोना का मुद्दा अतीत का बनकर रह गया. कांग्रेस पार्टी विपक्ष की भूमिका तक से न्याय नहीं कर पा रही है. हालत यह है कि पार्टी आज राज्यों में धीरे-धीरे सिमटती जा रही है और गठबंधन मिलाकर पार्टी 5 राज्यों में सत्ता में है. हाल फिलहाल की स्थितियां बता रही हैं कि बड़ी बात नहीं पंजाब में भी पार्टी सत्ता से बाहर हो जाए. कुल मिलाकर यह दिखता है कि कांग्रेस पार्टी कुछ भी सीखने को तैयार नहीं है. सत्ता पक्ष चाहें जितनी गलतियां कर ले लेकिन ऐसा नहीं लगता कि कांग्रेस पार्टी इन सबका फ़ायदा उठा पाएगी.