जानें क्यों जल रहा है दार्जिलिंग, नया नहीं है ये तनाव

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Nishant Trivedi Wed, 06/28/2017 - 00:00 Gorkhaland, Darjeeling

वर्षों तक पृथक गोरखालैंड की मांग के कारण कभी हिंसा तो कभी अहिंसक आंदोलन की आग में भड़का रहने वाला दार्जिलिंग का क्षेत्र एक बार फिर से जल रहा है। देश की सेना में गोरखाओं का योगदान हमेशा याद किया जाता है और सेना में एक गोरखाओं की एक अलग गोरखा रेजीमेंट भी है। आज भी वहां आंदोलन हो रहा है और आर्मी को वहां लगाया गया है तो गोरखाओं ने आर्मी को खाना खिलाकर सेना के प्रति अपने प्रेम का परिचय भी  दिया है।
जैसा कि ऊपर भी कहा गया है कि दार्जिलिंग में तनाव नया नहीं है लेकिन जब किसी क्षेत्र में अचानक कुछ आग उठती है तो उसके पीछे कुछ न कुछ तात्कालिक कारण भी होता है। हाल ही में भड़की इस घटना के पीछे भी तात्कालिक कारण हैं।
दरअसल बीते महीने ममता बैनर्जी सरकार 10 वीं तक के स्कूलों में बांग्ला को अनिवार्य कर दिया। वर्तमान में गोरखालैंड की मांग को लेकर आंदोलन का नेतृत्व करने वाली पार्टी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष विमल गुरूंग ने इसे इसका विरोध किया। गुरूंग का कहना था कि भाषा को थोपकर उनकी संस्कृति पर चोट की जा रही है। इसके बाद वहां आंदोलन तेज हो गया। कुछ ही दिनों के बाद विमल गुरूंग के आवास पर छापा पड़ा। उनके घर पर पड़े छापे में एक आधुनिक धनुष और बड़ी मात्रा में तीर बरामद हुए। साथ में एक खुखरी और कुछ मोबाइल बरामद हुए। इसके बाद से गुरूंग अपने घर से फरार हैं। अब सवाल इस बात का है कि हैंड ग्रेंनेड और एके- 47 के जमाने में   तीर औरत धनुष किस तरह की साजिश का हिस्सा हो सकते हैं। हथियारों के विषय में वहां के नेता विनय तमांग ने कहा कि ये हथियार हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं और हम तीरंदाजी प्रतियोगिता का आयोजन करने जा रहे थे। उनका कहना है कि हम इसीलिए अलग राज्य की मांग इसीलिए कर रहे हैं ताकि हमारी संस्कृति की रक्षा हो सके।
विमल गुरूंग के घर पर छापे के बाद इस आंदोलन हिंसक हो गया और सरकारी और निजी गाड़ियों में आगजनी की गई और तोड़फोड़ की गई। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने दार्जिलिंग के लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। क्षेत्र में भारी मात्रा में पैरामिलेट्री फोर्स  तैनात है।
हाल के मामले में ममता सरकार ये स्पष्ट कर चुकी है कि पर्वतीय क्षेत्रों पर भाषा संबंधी नियम नहीं लागू होगा उसके बावजूद विरोध कायम है। बीबीसी के अनुसार अभी इस पर्वतीय क्षेत्र में विमल गुरूंग का वर्चस्व कमजोर हुआ है वो चाहते हैं कि वो अपना पुराना रूतबा फिर से कायम करें। राज्य सरकार ने गोरखा मुक्ति मोर्चा शासित नगर निगमों की जांच कराने का भी फैसला किया है जिसमें इस पार्टी के आर्थिक अनियमितातों की जांच की जाएगी। जीटीए और उन निगमों के ऑफिसों को भी सील कर दिया जाएगा। जिससे विमल गुरूंग और उनकी पार्टी का पूरा हस्तक्षेप इसमें से खत्म हो जाएगा।
अगर बीबीसी हिंदी डाट कॉम की मानें तो  ममता बैनर्जी और सुभाष घीसिंग के समर्थकों में समझौता हुआ है जिसके तहत दोनों वहां पर विमल गुरूंग पर दबाब बनाकर अपनी अपनी राजनीतिक जमीन की तलाश कर रहे हैं।
अब आपको ले चलते हैं इस पूरे प्रकरण की एतिहासिक पृष्ठभूमि में।
दार्जिलिंग का वर्तमान हिस्सा सिक्किम और भूटान का हिस्सा रहा है। 1905 में बंग विभाजन के बाद इसे बिहार की भागलपुर डिवीजन के अंतर्गत कर दिया गया। 1928 में अखिल भारतीय गोरखा लीग की स्थापना की गई जिसने गोरखाओं के लिए प्रशासनिक व्यवस्था की मांग की गई। 1943 में डंबर सिंह गुरूंग ने पहली बार गोरखा लीग का गठन करके बंगाल से अलग एक गोरखा लीग की मांग की। 80 के दशक में एक बार फिर से मांग तेज हुई और सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में अलग गोरखालैंड की मांग ने तेजी पकड़ी आंदोलन हिंसक हो गया। सुभाष ने गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा की स्थापना की थी। इसी बीच में 1986 में ज्योति बसु ने एक श्वेत पत्र जारी किया और इस बात को माना भी दार्जिलिंग पूर्व में सिक्किम और भूटान का हिस्सा हुआ करता था। 25 जुलाई 1988 को राज्य के मुख्यमंत्री, केंद्रीय ग्रहमंत्री और सुभाष घीसिंग के बीच एक बैठक हुई। 22 अगस्त को दार्जिलिंग समझौता हुआ जिसके तहत इसे अर्ध्दस्वायत्त राज्य का दर्जा दिया गया। और दार्जिलिंग गोरखा हिल कौंसिल एक्ट 1988 के तहत दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद का गठन हुआ। इसके बाद सुभाष ने इस बात को स्वीकार किया कि वो इसके बाद अलग राज्य की मांग नहीं करेगें। इस परिषद के हर बार चुनाव होते थे सुभाष ने इस चुनाव को 3 बार जीता। 2004 में जब चुनाव होने थे तब चुनाव न कराकर इसकी कमान सुभाष को ही दे दी गई। 2007 में बंगाल सरकार की सहमति से सुभाष ने इसे सविंधान की 6 वीं अनूसूची में शामिल करने को अनुमति दे दी। जिसके बाद विमल गुरूंग ने इसका विरोध करते हुए बगावत की और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नाम से एक अलग पार्टी की स्थापना की। 2008 में घीसिंग ने परिषद के पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद आंदोलन की कमान गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के हाथ में ही आ गई। 2011 में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेता, बंगाल की मुख्यमंत्री और ग्रहमंत्री पी चिदंबरम के बीच एक समझौता हुआ और गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन(जीटीए) का गठन किया गया। इसके तहत गोरखालैंड में प्रादेशिक शासन का रास्ता साफ हुआ और गोरखालैंड प्रशासन को 54 विभागों का दायित्व सौंपा गया इसमें भूमि की देखरेख का काम भी दिया गया। ये भी तय हुआ कि केंद्र सरकार गोरखालैंड प्रशासन को 600 करोड़ की मदद भी देगा।  गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन के पास गोरखा हिल काउंसिल से ज्यादा अधिकार दिए जाएगें। तेलंगाना के गठन के बाद गोरखा नेताओं ने भी अलग राज्य के की मांग को लेकर मांग तेज की और उस समय देश के वित्त मंत्री और राज्य के कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे प्रणव मुखर्जी ने कहा कि तेलंगाना 60 साल पुराना आंदोलन है इसलिए इससे गोरखालैंड के आंदोलन की मांग की उससे तुलना नहीं की जा सकती। प्रणव को उस वक्त इतिहास का ज्ञान ही नहीं था या वो जानबूझकर अंजान बन रहे थे ये तो वहीं बता सकते हैं।
गोरखालैंड को लेकर वहां के राजनीतिक दलों में एकराय हैं और सभी गोरखालैंड के विरोध में हैं हांलाकि भाजपा के दिलीप घोष भले ही दावा करें कि उनकी पार्टी अलग गोरखालैंड की मांग का समर्थन नहीं करती लेकिन 2009 में भाजपा ने अलग गोरखालैंड का समर्थन किया था। जसवंत सिंह के वहां से लोकसभा चुनाव जीतने का कारण भी यही था।
जो कुछ भी हो अभी पूरा क्षेत्र आंदोलन की आग में झुलस चुका है और इससे क्षेत्र में शांति के साथ साथ आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है।
 
(This article written by Nishant Trivedi . The views expressed are personal. He can be reached at n.nishanttrivedi@gmail.com
Disclaimer: The opinions expressed within this article are the personal opinions of the author. The facts and opinions appearing in the article do not reflect the views of The People Post and The People Post does not assume any responsibility or liability for the same.

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