कोई साधारण नेता नहीं हैं असाधारण बयान देने वाले नरेश अग्रवाल

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Saurabh Fri, 07/21/2017 - 00:00 Naresh Agrawal

सपा के राज्यसभा सदस्य नरेश अग्रवाल एक बार फिर से चर्चा में हैं। इस बार वो भगवान राम और सीता पर राज्यसभा में की गई अपनी टिप्पणी के कारण चर्चा में हैं। अग्रवाल को अपनी टिप्पणी में गलती का अहसास जल्दी ही हो गया और उन्होंने राज्यसभा में तुरंत ही माफी मांग ली और राज्यसभा की कार्यवाही से हटा दिया गया। उनके इस बयान की सोशल मीडिया पर काफी आलोचना हुई।
ये पहली बार नहीं है कि नरेश अग्रवाल अपने गलत बयान की वजह से चर्चा में है। इससे पहले भी कई बार अपने गलत बयानों की वजह से चर्चा में रहे हैं। 2014 में लोकसभा के चुनावों से पहले चुनावों के से पहले उन्होंने नरेंद्र मोदी को लेकर एक बयान दिया था जिसके कारण वो काफी चर्चा में रहे थे। अपने बयान में उन्होंने कहा था कि भला एक चाय वाला क्या राष्ट्रीय स्तर का नेता बनेगा। उनके इस बयान की भी काफी आलोचना हुई थी।
अगर नरेश के अब तक के राजनीतिक जीवन की ओर देखा जाए तो आप उन्हें एक दलबदलु नेता के तौर पर पाएगें। 1989 में निर्दलीय चुनाव जीतने के बाद वो कांग्रेस में शामिल हुए और भाजपा की लहर में भी वो 1991 में चुनाव जीतने में कामयाब रहे। इसके बाद वो चुनाव जीतते रहे। 1996 में राजनीतिक सौदेबाजी करते हुए इन्होंने लोकतांत्रिक कांग्रेस का गठन किया और भाजपा को समर्थन दिया। इसी के साथ वो पहली बार प्रदेश सरकार में उर्जा मंत्री के पद पर आसीन हुए। उस दौरान हरदोई जिले में बिजली व्यवस्था काफी चाक चौबंद थी। इसी दौरान जिले के ही एक और कद्दावर भाजपा नेता और बिलग्राम सवायजपुर क्षेत्र से भाजपा विधायक गंगा सिंह चौहान के आवास पर हमला हुआ। इस पहले में गंगा सिंह की पत्नी की मौत हो गई जबकि वो खुद और उनका बेटा बुरी तरह से घायल हुआ। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि नरेश ने ही ये हमला करवाया था। यहां तक कि लखनऊ में इलाज के लिए भर्ती गंगा सिंह को देखने के लिए जब अटल बिहारी वाजपेई आए तो उन्होंने इस बात का जिक्र भी किया। अटल ने कारवाई का आश्वासन भी दिया लेकिन ये नरेश की राजनीतिक पंहुच का ही परिणाम था कि उनके खिलाफ कभी कोई कारवाई तो दूर जांच तक नहीं हुई। जिले में कौन अफसर आएगा कौन जाएगा इस बात का पूरा निर्णय नरेश का होता था। अधिकतर अधिकारी उनके पसंद के ही होते थे और कोई अगर बगैर मन का आ भी गया तो उसे नरेश के कोप का शिकार होना पड़ता था।
किसी बड़े बाहुबली के समान नरेश के साथ भी पूरे क्षेत्र के दबंगो का साथ है। रजनीश दुबे नाम के एक डीएम जिले में आए। उन्होंने अपने एक महीने के कार्यकाल के दौरान हरदोई में नरेश और उनके सहयोगियों के खिलाफ काफी कारवाई भी की। इसके बाद रजनीश दुबे का ट्रांसफर कर दिया गया।
हरदोई में होने वाले बड़े बड़े जमीनी सौदों में सरकार को राजस्व का जबरदस्त चुना लगाया जाता है। ये काम नरेश और उनके सहयोगियों के द्वारा खूब किया गया। इस प्रक्रिया के लिए नरेश या उनके सहयोगी जमीन खरीदते हैं। जमीन की खरीद की कोई भी प्रक्रिया कागजों पर संपन्न नहीं होती। सिर्फ जमीन का धन जिसकी जमीन होती है उसे दे दिया जाता है। अगर जमीन खरीद की प्रक्रिया को कागजों पर किया जाएगा तो उसके आवश्यक स्टांप और रजिस्ट्री का शुल्क देना पड़ेगा और बड़े जमीन सौदों में ये रकम काफी ज्यादा होती है। ऐसे में उसे बचाने के लिए सरकारी तौर पर कोई काम नहीं किया जाता। नरेश का दबदबा इतना ज्यादा है कि कोई भी उनके साथ धोखा नहीं कर सकता। खरीदी गई जमीन को बेचते वक्त जो सौदा होता है वो कागजी तौर पर नरेश जिससे जमीन खरीदतें हैं और जिसे बेचते हैं उसके बीच होता है। बीच में कमाया गया पूरा धन इनका होता है इस तरह से सरकार को पूरे एक जमीनी सौदे की राशि का नुकसान होता है। बेशक गहराई से जांच करने में और तरीकों की अनियमितताओं का पता चल सकता है।
नरेश को हमेशा राज्य सत्ता के साथ रहने की आदत है इसका फायदा होता है कि वो जिले में पूरी सरकारी मशीनरी को अपने काबू में रखते हैं। इतना ही नहीं हरदोई में होने वाले चुनावों की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े होते रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि नरेश सिर्फ जनता के समर्थन से ही नहीं जीतते हैं बल्कि बूथ का खेल करने में भी वो खिलाड़ी हैं।
ऐसा माना जाता है कि नरेश के राजनाथ सिंह के साथ गहरे राजनीतिक मतभेद हैं। जिसके कारण वो पहली बार में भाजपा छोड़ने को मजबूर हुए थे इसके बाद हालांकि ­­­­­­–प्रदेश में भाजपा कमजोर हो गई और नरेश कभी हाथी तो कभी साइकिल की सवारी करते रहे। जब 2017 के चुनावों में भाजपा फिर से मजबूत दिखी तो ऐसी खबरें उड़ी कि वो भाजपा में फिर से जाने वाले हैं लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो सका। फिलहाल जिले में उनके कई करीबियों पर कारवाई हुई है तो कई ने अपना पाला बदल दिया है लेकिन ये देखने वाली बात होगी की नरेश की चमक कितने दिनों तक फीकी रह पाती है।

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