आखिर क्यों करना पड़ रहा है OBC वर्ग के लोगों को लालू यादव का समर्थन?

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admin Mon, 07/17/2017 - 00:00 Lalu Prasad Yadav, Mulayam Sigh Yadav

विकल्पहीनता ख़तरनाक होती है, क्योंकि वो निरंकुशता को जन्म देती है. विकल्प सीमित होने पर भी समस्या गंभीर ही होती है. उसके बाद नापसंद होने के बाद भी आपको मज़बूरीवश उन्हीं सीमित विकल्पों में से किसी का समर्थन करना पड़ता है. कुछ ऐसी ही मज़बूरियों से इस समय 'अन्य पिछड़ा वर्ग' (OBC) भी जूझ रहा है.
आपातकाल के बाद या यूं कहें कि जेपी आंदोलन के बाद से राजनीतिक पटल पर उभरे इस वर्ग के पास विकल्प हमेशा से सीमित रहे हैं. उत्तर प्रदेश में मुलायम और बिहार में लालू यादव शुरू से ही OBC वर्ग के अगुवा रहें. इन दोनों के अलावा कोई और इस वर्ग का नेता बन ही नहीं पाया या शायद इन्होंने बनने ही नहीं दिया. अगर उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति को देखा जाए, तो मुलायम और लालू के अलावा दूर-दूर तक कोई कद्दावर नेता इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला नहीं दिखाई देता है.
मुलायम ने 'समाजवादी पार्टी' (सपा) और लालू यादव ने 'राष्ट्रीय जनता दल' (राजद) पार्टी का गठन करके अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की. दोनों पार्टियों के नेता शुरू से लोहिया के समाजवादी सिद्धांतों की बात करते थे. इन्होंने तत्कालीन राजनीति की नब्ज को पकड़ा और जमीन से जुड़े हुए मुद्दों को उठाया. लालू यादव के ठेठ गंवई अन्दाज़ में लोगों को एक ताज़गी दिखी और उन्होंने लालू को नेता के रूप में स्वीकार कर लिया. जनता और ख़ासकर पिछड़े वर्ग के लोगों को लगा कि अब उनके बीच से ही कोई उनका नेता बन गया है, जो उनकी परेशानियों को समझेगा. इसी भरोसे पर लोगों ने तरक्की के हसीन सपने भी देखें. लेकिन लोगों के ये सपने, सपने ही रह गए और लालू यादव का समाजवाद जल्द ही परिवारवाद और भ्रष्टाचारवाद में बदल गया.
ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ लालू यादव ने ही जनता के सपनों को कुचला. मुलायम सिंह यादव ने भी उन उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया, जो लोगों ने उनसे लगाई थी. मुलायम यादव के शासनकाल को विकास कार्यों के लिए कम और गुंडागर्दी के लिए ज़्यादा जाना जाता है. मुलायम पर आय से अधिक सम्पत्ति रखने के भी मामले चल रहे हैं. इन्होंने भी राजनीति में परिवारवाद को आगे बढ़ाया. इसका खामियाजा भी मुलायम को भुगतना पड़ा और उनके बेटे अखिलेश यादव ने पारिवारिक झगड़े के बीच उन्हें हटा कर ख़ुद पार्टी प्रमुख बन गए. पिछले दिनों CBI ने लालू यादव के कई ठिकानों पर छापेमारी की है. इस बात से लालू यादव के कट्टर समर्थक भी इंकार नहीं करेंगे कि लालू यादव एक भ्रष्ट नेता हैं. अदालत भी उन्हें भ्रष्टाचार के मामले में दोषी करार देकर, सज़ा सुना चुकी है. लालू यादव को चुनाव लड़ने के अयोग्य भी घोषित कर दिया गया है. इसके बावजूद, जिस तरह से सोशल मीडिया और ज़मीनी स्तर पर लालू का समर्थन किया जा रहा है, वो हैरान करने वाला है. ये उसी विकल्पहीनता की तरफ़ इशारा करता है, जिसका ऊपर जिक़्र किया गया है.
अगर आज OBC वर्ग के पास विकल्प होता, तो शायद उसे लालू का समर्थन करने की ज़रूरत नहीं पड़ती. पढ़ाई से किसी की नेतृत्व योग्यता को नहीं मापा जा सकता है, लेकिन जिन परिस्थितियों में लालू यादव अपने बेटे तेजस्वी यादव को उप मुख्यमंत्री बनवाया है, वो भी जनता के ऊपर थोपा गया लगता है.
लालू यादव का आज जिस तरह से समर्थन हो रहा है, वो कहीं न कहीं नेताओं के अंदर भ्रष्टाचार करने की हिम्मत बढ़ाएगा. समस्या ये भी है कि अगर पार्टी का मुखिया ही भ्रष्ट हो, तो वो अपने नेताओं के भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगा पाएगा. आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि जबसे नीतीश कुमार ने लालू यादव के साथ गठबंधन करके सरकार बनाई है, बिहार में अपराध और भ्रष्टाचार के आंकड़े बढ़े हैं.
डर एक ऐसी चीज़ है, जो इंसान को ग़लतियां करने से रोकता है. लेकिन फिलहाल जिस तरह से लालू यादव का समर्थन किया जा रहा है, वो भविष्य में नेताओं को भ्रष्टाचार करने के लिए प्रोत्साहित करेगा. इसे एक लोकतन्त्र के लिए अच्छा संकेत तो कतई नहीं कहा जा सकता है.
अब अगर OBC वर्ग के भविष्य के नेताओं की तरफ देखा जाए, तो परिवारवाद का दामन थामकर राजनीति में आए हुए अखिलेश और तेजस्वी यादव ही दिखते हैं. अखिलेश की व्यक्तिगत छवि भले ही साफ़-सुथरी हो, लेकिन बतौर मुख्यमंत्री वो भी गुंडागर्दी को रोकने में असफल रहे हैं. इसके अलावा पारिवारिक झगड़ों ने भी उनकी छवि को धूमिल करने का काम किया.
जिस तरह के हालात इस समय हैं, उसमें अब OBC वर्ग के लोगों को अपने बीच से एक नया विकल्प तलाशना होगा, जो उनका प्रतिनिधित्व कर सके. जिससे भविष्य में उन्हें विकल्पहीनता का शिकार होकर किसी भ्रष्ट नेता का समर्थन न करना पड़े.

This article written by Sunil. The views expressed are personal. Disclaimer: The opinions expressed within this article are the personal opinions of the author. The facts and opinions appearing in the article do not reflect the views of The People Post and The People Post does not assume any responsibility or liability for the same

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