कारगिल: भारतीय सैनिको के अदम्य साहस की गाथा

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Nishant Trivedi Wed, 07/26/2017 - 01:44 Kargil, Kargil Day

कारगिल की लड़ाई एक ऐसे समय में शुरू हुई थी जब भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती का माहौल था और तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कुछ दिनों पहले ही पाकिस्तान की यात्रा की थी। इसके बाद ही कारगिल के क्षेत्र में पाकिस्तान द्वारा घुसपैठ की गई जिसकी भनक भारतीय खुफिया एजेंसियों को नहीं लग सकी। ऐसे में पूरे क्षेत्र में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने जबरदस्त घुसपैठ कर ली थी और बंकर बना लिए थे।
कारगिल के बटालिक सेक्टर में अपना याक ढूंढने निकले जब एक व्यक्ति को जब वहां 5-6 बंदूकधारी दिखे जो अपने रहने के लिए जगह बना रहे थे तो उसने इसकी सूचना भारतीय सैनिको को दी। इसके बाद सेना द्वारा इस मामले की जांच की गई। जिसमें पहले तो पाया गया कि ये पाकिस्तान समर्थित घुसपैठिए थे लेकिन बाद में पता चला कि दरअसल ये पाकिस्तानी सैनिक थे।
उस समय पाकिस्तान सेना के चीफ ऑफ जनरल स्टॉफ रहे शाहिद अज़ीज़ ने पाकिस्तानी चैनल जियो टीवी को दिए गए अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि दरअसल मुशर्ऱफ की योजना इसके जरिए भारत को कश्मीर के लिए बातचीत करने पर मजबूर कर देना था। शाहिद अजीन के अनुसार कारगिल पर कब्जा कर लेने से सियाचीन से भारत की सप्लाई लाइन कट जाएगी और भारत को सियाचीन छोड़ने पर मजबूर होना पड़ेगा। ऐसे मे भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध की स्थिति बन जाएगी और विश्व समुदाय इसमें हस्तक्षेप करेगा और फलस्वरूप भारत को कश्मीर पर बात करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। अजीज के अनुसार इस योजना के बारे में पाकिस्तान मे बहुत ही चुनिंदा लोगों को ही मालूम था। हालांकि भारतीय सेना ने अपनी बहादुरी का परिचय देते हुए विषम परिस्थितियो में भी जीत हासिल की।
वैसे तो इस जीत में हर भारतीय सैनिक का अपना एक अहम योगदान था लेकिन आज हम आपको बताने जार रहे हैं कारगिल की लड़ाई के उस परमवीर के बारे में जिसकी कहानी देश के पूर्व सेनाध्यक्ष और वर्तमान विदेश राज्यमंत्री वीके सिहं ने खुद अपने फेसबुक एकाउंट से शेयर की थी। ये कहानी है 15 गोलियां और टूटे हाथ के बावजूद कारगिल की टाइगर हिल पर तिरगां फहराने वाले योगेंद्र सिंह की।
.योगंद्र को उनके 18 अन्य साथियो के साथ टाइगर हिल पर बने दुश्मन के 3 बंकरों को ध्वस्त करने का काम लक्ष्य मिला था। टाइगर हिल की उँचाई 18 हजार फीट थी ऐसे में उस पर चढ़कर दुश्मन को हराना मुश्किल था लेकिन ये एक ऐसा काम था जिसके बारे में दुश्मन कभी सोचं भी नहीं सकता था और ये उनके लिए बेहद ही चौकाने वाला था। योगेंद्र अपने दल में सबसे आगे थे उन्होनें इस दौरान अपने पीछे आ रहे साथियों के लिए रस्सीयां भी लगाईं।
3 जुलाई 1998 की रात को जैसे ही योगेंद्र अपने साथियो के साथ चोटी पर पंहुचे वहां मौजूद पाकिस्तानियों ने उनकी टीम पर जबरदस्त हमला कर दिया। इस हमले में योगेंद्र की टीम बिखऱ गई और और उन्हें खुद के भी 3 गोलियां लगी लेकिन घायल होने के बावजूद उन्होंने चढ़ाई के अंतिम 60 फीट भी पूरे किए।
जनरल सिंह आगे लिखते हैं सिंह ने उपर पंहुचते ही आंतकियों की भीषण गोलीबारी की परवाह न करते हुए पहले बंकर पर बम फेंककर सारे आंतकवादियों को मार गिराया। इसके बाद योगंद्र का ध्यान उस बंकर की तरफ गया जहां से पीछे आ रही भारतीय टुकड़ी पर लगातार हमला हो रहा था उन्होंने खुद परवाह न करते हुए दूसरे बंकर पर हमला कर दिया और वहां से हमला कर रहे 4 आतंकियों को मार गिराया। तब तक भारतीय सेना की अन्य टुकड़ियां भी वहां पंहुच गईं और योगेंद्र को 15 गोलियां लग चुकी थी। इस दौरान योगेंद्र का हाथ भी टूट गया था। 1 बंकर तब तक बाकी था  और टूटे हाथ के साथ भी उन्होंने अपने साथियों को तीसरे बंकर पर भी कब्जा करने ललकारा और आखिर में उस पर भी कब्जा कर लिया।

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