अतिवाद का शिकार हो रहे हैं भारतीय लोग

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Nishant Trivedi Fri, 07/14/2017 - 00:24 Amarnath Yatra

अमरनाथ की पवित्र यात्रा पर हमले के बाद से देश में कई तरह की चर्चाओं ने जोर पकड़ा है। एक तरफ आंतकवादियों पर कड़ी कारवाई करने की मांग हो रही है। दूसरी तरफ सलीम शेख नाम के ड्राईवर नाम के उस बस ड्राईवर की भी लगातार प्रशंसा हो रही है जिसने बड़े साहस और बुद्धिमानी का परिचय देते हुए बस के बाकी यात्रियों की जान बचाई। कुछ हमारे देश के ऐसे गणमान्य नागरिक भी थे जिन्होंने हमले के गुजरात चुनाव से तार जोड़ते हुए इस हमले के पीछे किसी विशेष तरह की साजिश की आशंका भी व्यक्त की थी।
देखा जाए तो देश में अलग अलग तबके हैं जो समय समय पर होने वाली घटनाओं पर अपनी अपनी सोंच के अनुसार बयान देते हैं और ये सही भी है। हालांकि कई लोग अतिवाद में बहकर भी भावनाएं व्यक्त करते हैं। बेशक ऐसे दौर में भावनाएं उमड़ती हैं और इसीलिए कई बहुत से लोगों ने सरकार की निंदा करते हुए कहा कि सरकार सिर्फ बयान देती है और आतंकवादियों पर कोई कारवाई नहीं करती है। जबकि बीते दिनों अगर देखा जाए तो कश्मीर घाटी में लगातार आतंकवादियों को मार गिराया गया है और उन पर कारवाई हुई है। बुरहान वानी के दोस्त सबजार भठ्ठ जैसे आतंकवादियों को हाल ही में मार गिराया गया था। इसके अतिरिक्त भी प्रतिदिन आतंकवादियों के सफाए की खबरें हमारे सामने आती रहती हैं। बेशक अमरनाथ यात्रियों पर हमला सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल जरूर खड़े करता है लेकिन इससे ये सरकार की आतंकवादियों के विरूद्ध कारवाई करने की मंशा पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते।
एक दूसरा तबका था जो इस हमले के तार गुजरात चुनाव से जोड़ रहा था। गुजरात के बर्खास्त पुलिस ऑफिसर संजीव चतुर्वेदी, आप विधायक अलका लांबा और भी कई लोगों ने ट्वीट करते हुए लिखा कि मारे गए सारे यात्री गुजरात के थे और अगले कुछ ही दिनों में वहां चुनाव भी होना है। ऐसे में भाजपा चुनाव में फायदा उठाने के लिए ये काम कर सकती है। वैसे तो इन लोगों की बात को गंभीरता से कोई नहीं लेता और नहीं लेना चाहिए लेकिन ये दिखाते हैं कि लोग किस तरह से लोग अपने राजनीतिक फायदों के लिए बयानबाजी के किस स्तर पर जाने के लिए तैयार हैं।
एक और तबका है देश में बुद्धिजीवियों का। जो अपने ही धुन में मस्त रहते हैं। ये वो लोग हैं जो जब हमेशा अलगावादियों से , आतंकवादियों से बातचीत करने के पक्ष में रहते हैं। वास्तविकता में बातचीत अच्छा विकल्प है और इसके बिना किसी समस्या का हल नहीं निकलता लेकिन समस्या की बात ये है कि जब सामने वाला गोली और पत्थर से नीचे बात ही नहीं करे तो ऐसे में बातचीत का रूख रखना कितना अच्छा है ये एक सवाल है। ये लोग हमेशा सेना की कार्यप्रणाली पर सवाल खडे करते हैं और जब कोई आतंकी हमला होता है तो बड़ी आसानी से सरकार पर सुरक्षा में चूक का जिम्मा डालकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं। इस वर्ग के समर्थन से आतंकवादियों को एक मोरल सपोर्ट मिलता है जोकि बेहद खतरनाक है। इस तरह के मोरल समर्थन को बंद करना चाहिए।
अमरनाथ यात्रा पर हमला बेहद खतरनाक है बेशक इस पर सरकार को चिंतित होना चाहिए और सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसी घटना दोबारा न हो। दूसरी तरफ आम जनता और तमाम लोगों को इस गंभीर परिस्थिति में धैर्य के साथ काम लेना चाहिए और किसी भी तरह की अतिवादी प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए।

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