व्यंग: 'क्योंकि फूफा भी कभी दामाद था'

Sun, 07/15/2018 - 01:41

आज दिन है रविवार का है.आधिकारिक तौर पर आज देश में छुट्टी है हालांकि मेरी नहीं है.लेकिन मैं आज आपको छुट्टी जरुर देना चाहता हूं. रोज राजनीति और तमाम गंभीर बातें पढ़ने से भी आखिर छुट्टी चाहिए.रोज तमाम नेताओं की गाली गलौज से निकलकर जरूरत है कभी आपकी बातें भी की जाएं. तो आज मैं आपकी बात करने जा रहा हूं हालांकि अगर आप किसी के फूफा या जीजा हैं तो शायद आहत हो जाएं. अगर आहत हो जाएं तो वो आपकी जिम्मेदारी है और आपका मीटर कैसे डाउन होगा ये आप जानें.
दरअसल आज मैं 'फूफा' प्रजाति के बारे में लिख रहा हूं. इस प्रजाति का अपना ही स्वैग है.चूंकि हर पेड़ की जडें तो होती ही हैं तो जरूरी है कि शुरुआत इस फूफा प्रजाति के पेड़ की जड़ से की जाए .क्योंकि हर एक फूफा,फूफा बनने से पहले दामाद भी होता है इसलिए शुरुआत उसी से होगी.

जब इंसान बेटी की शादी करता है तो उसके बाद इस बाहरी प्राणी की आपके परिवार में एंट्री होती है.चूंकि ये बाहरी प्राणी होता है और 'अतिथि देवो भव' तो इसका सम्मान आप बड़े कायदे से करते हैं.आप खुद मिठाई खाएं या न खाएं लेकिन खाने में इसे मिठाई जरुर खिलाएंगे. हर बार जगह पर पानी भी देंगे और नहाने पर बाथरुम में बढ़िया धुला तौलिया भी जरूर रखेंगे.शादी के पहले तक इसे घर में भले खाली खटिया पर लेटने की आदत हो लेकिन आप उसे बढ़िया मखमल का बिस्तर देंगे. हालांकि आपके दिए हुए दहेज के बेड से उसकी काफी कुछ आदत पहले ही ठीक हो चुकी होगी.घर से विदाई के वक्त बढ़िया घर पर दरवाजे पर ही रिक्शा बुलवाकर दक्षिणा के रुपयों के साथ उसे विदा करेंगे.फिर साले या साली की शादी होगी.तब भी जीजा हर जगह आगे. नए संबधियों से बात करने में और तमाम कथित समझदारी भरे कामों में, शादी के वक्त स्टेज की फोटो में ये जीजा हमेशा आगे रहेंगे.ऐसा नहीं है कि जीजा उछलेंगे बल्कि आप ही उन्हें विशेष राज्य के दर्जे की तरह स्पेशल पैकेज देते रहेंगे.देखिए आपको बोला था कि राजनीति से आज छुट्टी है लेकिन आखिर में ये लाइन लिख ही बैठा. खैर इसके लिए माफी दीजिए.

अब आते हैं फूफाजी पर. दरअसल हर इंसान कुछ बनने से पहले सीखता है. कहने का मतलब है कि प्रांरभिक अवस्था हर एक जीवन में होती है. दअसल जीजा वाली अवस्था फूफा बनने के जीवन का ट्रेनिंग पीरियड होती है.इस दौरान वो खुद को मिलने वाली खास सुविधाओं के बारे में जानकारी हासिल करता है और फिर बनता है वो 'फूफा'.पिछले पैराग्राफ में जो आपने पढ़ा वो तब तक है जब तक फूफा के साले की शादी नहीं हुई थी. अबकी बार साले के बेटे-बेटी की शादी का नंबर है.फूफा ससुराल की सेवाओं से एकदम अभ्यस्त हैं,सबकुछ मजे से चल रहा है बस इस बार फूफा का मेजबान व्यस्त है.ससुर साहब बुढ़े हो चुके हैं वही हाल सास का है.साले की पत्नी भी घर में 4 बुआओं और परिवार के तमाम प्रपंचों के संकट को झेलते हुए व्यस्त है हालांकि वो फूफा का ध्यान रखे है.

काम काजियों की व्यस्तता के कारण इस बार फूफा को वो मजा नहीं आ रहा जो हमेशा आता था.मुंह से निकलते ही न तो इस बार पानी मिल रहा है और हद है कि बाथरुम में तौलिया भी नया नहीं है.सुविधाभोगी फूफा इतना तो झेल जाता है. फिर वो जाता है कि जहां जयमाल पड़ना है वहां कि जरा तैयारियां देखे.वहां पहुंचे तो साले साहब खड़े थे अपना काम धाम देख रहे थे.उनके पास जाकर खड़े हुए लेकिन ये क्या साले साहब देख नहीं उन्होंने बोला ही नहीं फूफा को कुर्सी दो तो ये बैठ जाएं . खैर ये भी वो बिचारे झेल गए.अब नंबर आया जयमाल पर फोटो खिंचाने का.स्टेज पर साले से बहुत बड़ी मिस्टेक हुई और वो ये कि गलती से फूफूा की बजाय उन्होंने पहले अपने साले को आवाज लगा दी. इतने में फूफा का मुंह बन गया.तब तक साले की नजर पड़ी तो उसने तुरंत ही आगे कर अपने जीजा को उचित सम्मान दिया.फूफा के दीमाग में घायल नागिन की तरह सारी तस्वीरें कैद होती जा रही हैं लेकिन सबसे बड़ा झटका उन्हें तब लगा जब सब कार्यक्रम निबट गया और वो जाने वाले हैं. साले ने सोचा शादी में खर्चा हुआ है इस बार इनकी दक्षिणा से 50 रूपए कम कर लिए जाएं.

जब फूफा वापस घर आए तो उन्होंने पहले सारी भड़ास निकाली बुआ पर. बुआ ने चुपचाप सुना फिर अपनी भौजाई को सुनाया.4 रिश्तेदारों में बात पहुंची.मामला गर्म हुआ.वो भी इतना ज्यादा कि फूफा ने जब अगली शादी तय हुई तो पिछली शादी के कथित दुर्व्यवहार का हवाला देते हुए ससुराल जाने से मना कर दिया. मानमनौवल का दौर जारी है.हालांकि ये तय है कि फूफा शादी में जाएंगे लेकिन उससे पहले ब्याज सहित जब तक सुना नहीं लेगें तब तक उन्हें चैन नहीं पड़ेगा.

कुल मिलाकर ये एक आदर्श फूफा की कहानी है. भारतीय समाज की शादियों का ये सबसे क्रूर किरदार है.इस प्रजाति को शादी में दुल्हा दुल्हन से भी ज्यादा सुविधाओं की आवश्यकता होती है. बीते दिनों अपने ससुराल में किसी शादी में डांस करते डब्बू अंकल उर्फ फूफाजी के वीडियो देखने के बाद इस प्रजाति को लेकर थोड़ी आशा की उम्मीद जगती है लेकिन फिर भी अब तक का रिकॉर्ड जब खराब हो तब उम्मीद भला किससे की जाए.हालांकि इन सारे कामों की ट्रेनिंग इस प्रजाति को ससुराल में ही जवानी के दिनों में दामाद के तौर पर होती है.इसलिए शायद आपको अब पता चल गया हो कि लेख का शीर्षक 'क्योंकि फूफा भी कभी दामाद था' क्यों है...

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