अभी पिछले ही साल श्रीलंका ने दावा किया था कि उसने आतंकवाद को अपनी धरती से समाप्त कर दिया है. यहां आतंकवाद से उसका मतलब तमिल उग्रवाद से था, विडंबना देखिये साल भर के भीतर ही वहां के चर्च पर सबसे बड़ा आतंकी हमला हुआ है. अभी तक 150 से ज्यादा लोगों की जानें जा चुकी हैं और हमला करनेवाले दो संदिग्ध आतंकियों की पहचान अबू मोहम्मद और जाहरान वसीम के रूप में हुई है.

देखिये एक ऐसे समय में जब विश्व के तकरीबन सभी बड़े देश इस धार्मिक उन्माद से उपजे आतंक के खतरे को समझ रहे हैं, भारत और इजरायल सहित आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित देश लगातार वैश्विक मंचों पर गुहार कर रहे हैं, आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि संयुक्त राष्ट्रसंघ ने अभी तक आतंकवाद की परिभाषा तक तय नहीं की है.

वैसे भी संयुक्त राष्ट्रसंघ में ताकतवर देश तब तक कुछ नहीं करते, जब तक उन पर खतरा ना आ जाये. 9/11 से पहले अमेरिका सहित पश्चिमी देश आतंक का एग्जिस्टेंस ही स्वीकार नहीं करते थे. जब भारत जैसे देश आतंकवाद की बात करते तो वहां से कहां जाता कि ये आपके लॉ एंड आर्डर का मसला है. 9/11 हमले के बाद इन्हें आतंक के बढ़ते स्वरूप का मतलब समझ आया.

उसके बाद भी आतंकी वारदात का सिलसिला जारी रहा. 2004 में स्पेन के मेड्रिड में ट्रेन पर आतंकी हमला, 2005 में लन्दन में डबल डेकर बस पर आतंकी हमला, 2005 में ही इजिप्ट के शर्म-अल-शेख पर आतंक हमला, फ्रांस के शार्ली हेब्दो के ऑफिस पर आतंकी हमला जैसी घटनाएं लगातार होती रहीं लेकिन कभी सामुहिक तौर पर पूरे विश्व ने एकमत होकर आतंक के जड़ों पर प्रहार नहीं किया.उल्टे गुड टेररिस्ट और बैड टेररिस्ट के श्रेणी में आतंक के नए रूप को स्वीकारा गया.

भले ही इन देश के नेताओं ने आतंक के खिलाफ मजबूत और सख्त रवैया ना अपनाया हो लेकिन इन देशों के लोगों ने इस खतरे को समझा. शायद इसीलिए अमेरिका में उन ट्रम्प के हाथों में सत्ता दे दी गई जो आतंक के खिलाफ बिना लाग-लपेट के बोलते थे, नीदरलैंड में पार्टी ऑफ फ्रीडम (PVV) की लोकप्रियता आज चरम पर है. हाल-फिलहाल इजरायल की जनता ने बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में उस गठबंधन को दोबारा मौका दिया जिसने आतंक के खिलाफ़ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई. भारत में भी बहुत बड़ा वर्ग आतंक से पीड़ित रहा है. ऐसे में यहां की जनता की विश्व समुदाय से इतर राय हो इसकी गुंजाइश कम ही है.

विश्व समुदाय के नेताओं को तेरा आतंक और मेरा आतंक की श्रेणी से जल्द बाहर आकर समाज के लिए कैंसर बन रहे इस खतरे के प्रति समुचित कार्रवाई करनी ही होगी. वरना आतंक से पीड़ित लोग अगर नेता चुनने की जगह खुद ही सड़क पर आ गए तो ये बहुत बुरा होगा. बहुत ही बुरा होगा.

आतंक से पीड़ित श्रीलंका के लोगों को श्रद्धांजलि.

(ये लेख विवेक सिंह के फेसबुक पेज से लिया गया है, विवेक ZEE Media Corporation में पत्रकार है।)