भारत के मित्र देश इजरायल में आज फिर से चुनाव है. दरअसल फिर से चुनाव इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि बीते अप्रैल में ही इजरायल में चुनाव हुआ था. इस चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू ने जीत हासिल की थी. भारत की तरह इजरायल में भी गठबंधन राजनीति है. ऐसे में एक विधेयक को लेकर टकराव के बाद नेतन्याहू सरकार अल्पमत में आ गई और इजरायली संसद को भंग करना पड़ा. इसके बाद सितंबर में फिर से चुनाव कराने का एलान हुआ. आज हम आपको इजरायल की इस राजनीति और उसके प्रमुख चेहरे बेंजामिन नेतन्याहू के बारे में बताने जा रहे हैं,.

बेंजामिन नेतन्याहू का जन्म 1949 में इजरायल के तेल अवीव में हुआ था.वो अपने पिता के साथ अमेरिका के फिलाडेल्फिया में पले बढ़े.1967 में वो इजरायली सेना में शामिल हुए.1972 में तेल अवीव एयरपोर्ट पर बंधक बनाए गए विमान को मुक्त करने के लिए किए गए ऑपरेशन का वो हिस्सा थे.इसके बाद वो वापस अमेरिका चले गए और उन्होंने प्रतिष्ठित मेसाचुसेट्स टेक्निकल यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन और आर्किटेक्चर में उन्होंने डिग्री ली.1976 में उन्होंने बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप में काम करना भी शुरू किया.तभी एक घटना घटी जिसके बाद नेतन्याहू वापस इजरायल लौटे.दरअसल युगांडा में अगवा विमान से बंधको रिहा करने के लिए किए गए ऑपरेशन में उनके सबसे बड़े भाई योनी की मौत हो गई.इसके बाद उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय आतंकनिरोधी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया.

1982 से 1984 तक उन्होंने अमेरिका में इजरायली दूतावास में काम किया.1984-1988 तक वो संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के दूत भी रहे.1988 में वो पहली बार लिकुड पार्टी से संसद के सदस्य बने.1996 में पहली बार वो लेबर पार्टी के नेता शिमोन पेरेज को हराकर पीएम पर काबिज हुए.1999 तक वो इजरायल के पीएम रहे.इस दौरान उन्होंने फिलिस्तीन के साथ हर्बन और वाय के शांति समझौते भी किए. इसके बाद इजरायल के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा और उन्होंने कुछ वक्त के लिए राजनीति छोड़ दी.2002 में वो राजनीति में वापस आए और इजरायल के विदेश और वित्त मंत्री रहे.

2009 में वो एक बार फिर से पीएम बनने में कामयाब रहे.उन्होंने उस दौरान बयान दिया,"अगर फिलिस्तीन इजरायल को यहूदी राष्ट्र के तौर पर मान्यता देता है तो वहां से सेनाएं हटा ली जाएंगी. 2013 में उन्होंने अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते का विरोध किया.अमेरिका की आलोचना भी की.2014 के दौर में नेतन्याहू ने काफी आक्रामक और विवादित फैसले लिए. दरअसल तीन नौजवानों की मौत के बाद इजरायल ने गाजा में सैकड़ों रॉकेट दागे और वहां हमास और इजरायल के बीच जंग छिड़ गई.इस लड़ाई में गाजा में खासा नुकसान हुआ.इसी साल दिसंबर में सरकार की आलोचना करने पर नेतन्याहू ने अपने दो मंत्रियों को सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया.मार्च 2015 में इजरायल में फिर से चुनाव हुए.लेबर पार्टी के नेता ईसाक हर्जोग ने इस चुनाव में घरेलू मुद्दों को उठाया.वहीं नेतन्याहू अपने उग्र राष्ट्रवादी रवैये पर कायम रहे.उन्होंने हमास और फिलिस्तीन के खिलाफ अपना चुनाव प्रचार रखा.अपने इसी रवैये के चलते वो 2015 में चुनाव जीतने में कामयाब रहे.इस बार के चुनाव में भी नेतन्याहू ने उग्र राष्ट्रवाद के रवैए के साथ ही प्रचार किया.उन्होंने कहा कि अगर उनकी सरकार बनती है तो वो वेस्ट बैंक पर कब्जा कर लेंगे.वेस्ट बैंक में भी हमास और इजरायली सेनाओं के बीच जंग होती रही है.

नेतन्याहू बेशक राष्ट्रवादी नेता के तौर पर विख्यात हैं लेकिन भ्रष्टाचार के मामले में वो साफ सुथरे नहीं हैं.अगस्त 2017 में उनके ऊपर भ्रष्टाचार के दो आरोप लगे.ये आरोप दो उद्योगपतियों से घूस लेने के थे.दिसंबर 2017 में उनके खिलाफ तेल अवीव में एक बड़ा प्रदर्शन हुआ.फरवरी 2018 में इजरायल पुलिस ने एक बयान जारी कर नेतन्याहू के खिलाफ भ्रष्टाचार के सबूत होने का दावा किया.हालांकि नेतन्याहू ने इस्तीफा देने से मना कर दिया.

इस बार के इजरायली चुनाव की बात करें तो नेतन्याहू भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घिरे हैं. उनके खिलाफ कई मामलों में मुकदमा चलाए जाने की अनुमति दी जा चुकी है. इन पर कार्रवाई अगले महीने शुरु होगी. ऐसे में नेतन्याहू ने अपना प्रचार फिलिस्तीन विरोध और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर ही केंद्रित कर रखा है. उन्होंने हाल ही में एलान भी किया कि अगर उनकी सरकार बनी तो इजरायल वेस्ट बैंक पर कब्जा कर लेगा. वहां रहने वाले इजरायली लोगों को सुविधाएं देगा. वो अमेरिका के साथ अपने अच्छे संबंधों का हवाला भी देते हैं. उनके पास गिनवाने के लिए उपलब्धियां भी हैं. येरूशलम को राजधानी के तौर पर मान्यता दिलवाना उनकी बड़ी उपलब्धि है.6 दिसंबर 2017 को अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने ये एलान किया.इसके बाद दुनिया में इस फैसले की आलोचना हुई लेकिन इजरायल में इसकी खासी प्रशंसा हुई. अमेरिका ने अपना दूतावास भी तेल अवीव से हटाकर येरुशलम में बना लिया है. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों ने येरूशलम को राजधानी के तौर पर मान्यता दी.

बेंजामिन के सामने इस बार पूर्व सैन्य प्रमुख बेनी गैंट्ज़ की चुनौती है. हाल के दो चुनावी सर्वे में बेंजामिन की लिकुड पार्टी विपक्षियों से महज एक सीट आगे रही है. एक सर्वे में जहां बेंजामिन की पार्टी को 120 में 33 और विपक्षी ब्लैंक एंड व्हाइट को 32 मिलीं, वहीं दूसरे सर्वे में ये आंकड़ा 56 और 55 का रहा. पिछले चुनाव में भी इसी तरह के आंकड़े थे जब बेंजामिन की पार्टी ने 120 में 36, वहीं विपक्षी पार्टी ने 35 सीटें जीती थीं. हालांकि इजरायल में दक्षिण पंथी पार्टियों की संख्या ज्यादा है और लगभग सभी बेंजामिन के साथ हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि वो सरकार बनाने में कामयाब हो जाएंगे.

भारत के साथ संबंधों की बात करें तो इजरायल हमेशा से ही भारत का दोस्त रहा है लेकिन पीएम मोदी के साथ नेतन्याहू की खूब जमीं.पुलवामा हमले के बाद इजरायल ने हर संभव मदद का एलान भी किया. भारत ने जिन मिसाइल पाकिस्तान के बालाकोट में हमला किया था वो इजरायल की ही दी हुईं थीं. जब पीएम मोदी ने चुनाव जीता तो बेंजामिन ने उन्हें फोन किया और बधाई दी. उन्होंने अपनी बातचीत का वीडियो भी ट्विटर पर शेयर किया था. जिसमें दोनों के बीच गर्मजोशी साफ नजर आ रही है. इससे पहले 2018 में नेतन्याहू भारत भी आए थे और दोनों देशों के बीच तेल और गैस को लेकर समझौते भी हुए. हाल ही में भी नेतन्याहू की भारत यात्रा की खबरें कई बार आईं. हालांकि हर बार नेतन्याहू की यात्रा रद्द हो गई. इजरायली चुनाव के वो पोस्टर भी खासा वायरल हुआ था जिसमें नेतन्याहू ने पीएम मोदी को भी जगह दी थी. अगर बेंजामिन दोबारा निर्वाचित होते हैं तो भारत के साथ इजरायल के रिश्ते पहले जैसे ही चलते रहेंगे. अगर वो हारते हैं तो दोनों देशों के नए सिरे से संबंधों की शुरुआत करनी होगी.