पिछले हफ्ते लेबनान की राजधानी बेरुत में एक भीषण धमाका हुआ. इस धमाके में करीब 150 लोगों की मौत हो गई जबकि 5000 लोग घायल हुए. इस भयानक विस्फोट ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में 76 साल पहले हुए एक धमाके की काली यादों को ताजा कर दिया. 19 अप्रैल 1944 को मुंबई भी ऐसे ही एक धमाके से दहल गई थी. एक के बाद एक, दो धमाकों में 1000 लोगों की मौत हुई थी. शहर की तमाम इमारतें तबाह हो गई थीं. आपदाकर्मियों को इस पर काबू पाने में तीन दिन लग गए थे.

दरअसल अंग्रेजों ने भारत को हर वो एक जख्म दिया है जो एक गुलाम को दिया जा सकता है. चाहें वो बंगाल का अकाल हो या मुंबई का ये भयानक विस्फोट, सभी अंग्रेजों की गलत निर्णयों के परिणाम थे, ऐसे निर्णय जो जानबूझकर लिए गए. द्वितीय विश्व युद्ध का वक्त था, एशिया भी महाशक्तियों के इस भयानक खेल का हिस्सा बन चुका था. इसी बीच 1944 में ब्रिटेन का एक जहाज 'फ़ोर्ट स्ट्राइक' ब्रिटेन के बिर्केनहेड से विस्फोटक, फ़ाइटर एयरक्राफ्ट और सोने की ईंटें लादकर मुंबई के लिए रवाना हुआ. कराची से इस जहाज में 300 टन डाइनामाइट रखा गया जिसके नीचे कपास की गांठे रखी गईं. ये जानकर भी कि इससे विस्फोट हो सकता है, लापरवाही बरती गई.

14 अप्रैल को दोपहर का वक्त था, ब्रिटिश जहाज मुंबई के विक्टोरिया डॉक पर पहुंचा. यहीं जहाज पर आग लग गई. फायर ब्रिगेड के लोगों ने आग बुझाने की कोशिश की लेकिन कुछ ही घंटों में आग डाइनामाइट तक पहुंच गई और दो बड़े धमाके हुए. विस्फोट की वजह से आसपास के 12 जहाज तबाह हो गए. उस एरिया के आस-पास शायद जो भी था, वो मारा गया. मरने वालों का आंकड़ा 800 से 1300 के बीच बताया गया. मारे जाने वाले लोगों में मुंबई बंदरगाह पर काम करने वाले कर्मचारी, सेना के सिपाही, नौसेनिक, पुलिसकर्मी, और जहाज पर काम करने वाले लोग थे.

बेरुत की तरह ही मुंबई में भी दूसरे धमाके से ज़्यादा तबाही हुई थी. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, "पहले धमाके के बाद अधिकांश लोग उस दिशा में भागे जहां से उन्हें काले धुएं का गुबार उठता दिखा. दरअसल, इन लोगों को दूसरे धमाके का अंदाजा नहीं था. पैदल चल रहे लोगों के चीथड़े उड़ गए, वाहन भी उलट-पलट गए और पुरे आसमान को घने काले धुएं ने घेर लिया".