अमेरिकी में राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए वोट डाले जा चुके हैं. जल्द ही यह पता चल जाएगा कि अमेरिका के राष्ट्रपति की कुर्सी पर दोबारा ट्रंप बैठेंगे या जो बाइडेन, ट्रंप को हराने में कामयाब हो जाएंगे. कहा जाता है कि अमेरिका का राष्ट्रपति दुनिया का सबसे ताकतवर शख्स होता है ऐसे में पूरी दुनिया को अमेरिकी चुनाव के नतीजे का बेसब्री से इंतजार रहता है. दुनिया में युद्ध और शांति के तमाम मुद्दे, अमेरिकी राष्ट्रपति पर निर्भर करते हैं. ऐसे में यह समझने की कोशिश करेंगे कि ट्रंप का 4 साल का कार्यकाल इस मामले में कैसा रहा और उनके पूर्ववती डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा का कार्यकाल कैसा रहा. मौजूदा डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडेन, बराक ओबामा के समय उपराष्ट्रपति रहे हैं.

बराक ओबामा को 2009 में शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया लेकिन क्या ओबामा का कार्यकाल वाकई विश्व में कोई शांति लाया और क्या डोनल्ड ट्रंप के कार्यकाल में ओबामा के समय स्थापित की गई शांति को नुकसान पहुंचाया गया. बराक ओबामा के कार्यकाल में लीबिया में अमेरिका के नेतृत्व में हमला किया गया. वहां के तानाशाह मुअम्मर गद्दाफी को मारा गया और सत्ता परिवर्तन कराया गया. लेकिन लीबिया में शांति जैसी कोई बात नहीं आई. गद्दाफी के जाने के बाद लीबिया पहले से भी ज्यादा असफल राष्ट्र हो गया जहां पूरी तरह से आतंकवाद अपने पैर पसार चुका था. इसके बाद, उन्होंने सीरिया में हवाई हमलों को मंजूरी दी. ये हवाई हमले वहां के तानाशाह बशर अल असद की सेना पर किए गए. एक तरफ रूस असद की मदद कतर रहा था तो दूसरी तरफ विद्रोहियों की मदद अमेरिका कर रहा था. सीरिया के तेल पर कब्जे की इसी लड़ाई का नतीजा आईएस जैसा खतरनाक आतंकी संगठन है. सीरिया वो सातवां मुस्लिम देश था जहां ओबामा ने हवाई हमलों को मंजूरी दी थी. सीरिया में बमबारी से पहले ओबामा ने अमेरिकी कांग्रेस तक की मंजूरी नहीं ली थी. सीरिया में बाद में आईएस ने भयानक आतंकवाद फैलाया और तमाम लोगों को देश छोड़ना पड़ा. ये तमाम लोग आज यूरोपीय देशों में शरणार्थी बनकर रहे हैं और यूरोपीय देशों के हालात भी खराब हैं.

माना जाता है कि पहले अपने हितों के लिए अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने विद्रोहियों को हथियार और ट्रेनिंग दिए जो बाद में ISIS बन गए और अमेरिका के हितों को नुकसान पहुंचाने लगे. इस तरह ओबामा के राष्ट्रपति रहते एक खतरनाक आतंकी संगठन तैयार हुआ जिसे उन्हें बाद में खत्म करना पड़ा. वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने उस वक्त लिखे गए अपने एक लेख में कहा था, "ओबामा ने यही साबित किया है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सैन्य आक्रामकता की दृष्टि से वह अमेरिका के सर्वाधिक मुखर राष्ट्रपति हैं". एक ऐसे समय में जब विश्व शक्ति के रूप में अमेरिका का क्षरण हो रहा है और उसे अपने घरेलू मुद्दों पर नए सिरे से काम करने की आवश्यकता है, वह युद्ध में उलझ रहा है. ऐसे युद्धों से उसे बहुत कुछ शायद ही हासिल हो सके. दुर्भाग्य से देखने को यही मिल रहा है कि एक युद्धप्रिय व्यक्ति के तौर पर बुश को जहां अपनी सत्ता गंवानी पड़ी, वहीं उनके उत्तराधिकारी ओबामा भी निरंतर युद्धों में उलझ रहे हैं.

बराक ओबामा के समय, उत्तर कोरिया के साथ भी अमेरिका के संबंध खराब ही रहे और लगातार बयानबाजी और उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण होते रहे. ईरान के साथ समझौते के मामले में जरूर अमेरिका आगे बढ़ा और एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर हुए. इसके अलावा अफगानिस्तान और ईराक से सैनिकों की वापसी पर ओबामा पूरी तरह क्न्फ्यूज रहे और सैनिकों की तैनाती बनी रही. रूस के तनातनी भी बराकरार रही.

अब हम डोनल्ड ट्रंप के कार्यकाल पर आते हैं. डोनल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ समझौते को तोड़ दिया और अमेरिका और ईरान के बीच तनाव काफी बढ़ गया. अमेरिका ने ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी को मार भी गिराया, इसके बाद ईरान ने ईराक में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए. कई बार तो ऐसा लगा कि दोनों देशों में जंग छिड़ने वाली है लेकिन खैर हालात इससे ज्यादा खराब नहीं हुए. ट्रंप का ये काम, ओबामा की मेहनत खराब करने वाला था लेकिन इसके अलावा ट्रंप के खाते में कई उपलब्धियां हैं. सबसे बड़ी बात ये है कि 4 साल में ट्रंप ने कोई नया युद्ध शुरू नहीं किया. वर्ना बुश और ओबामा दोनों के समय ऐसा होता रहा है. उत्तर कोरिया के साथ ट्रंप की शुरूआत बहुत बुरी थी. किम जोंग और ट्रंप ने एक दूसरे को अपशब्द भी कहे लेकिन इसके बाद जो हुआ वो ऐतिहासिक था. दोनों नेताओं के बीच दो बार मुलाकात हुई और हमेशा रहने वाली युद्ध की स्थिति थोड़ी शांत हुई. अमेरिका के सहयोगी इजरायल के साथ, कई अरब देशों ने शांति समझौते किए जो अपने-आप में ऐतिहासिक हैं. इजरायल हमेशा से अरब देशों का दुश्मन रहा था. आतंकवाद फैलाने वाले पाकिस्तान पर भी नकेल कसी गई.

कुल मिलाकर ओबामा औऱ ट्रंप, शांति के मामले में अपनी ब्रांडिंग से एकदम अलग रहे हैं. दरअसल ओबामा एक परिपक्व राजनेता की तरह व्यवहार करते थे जो बोलता कुछ और करता कुछ है. ट्रंप बड़बोले हैं. कई बार अपनी क्षमता से ज्यादा की बात कर डालते हैं लेकिन आखिर में करते उतना हीं हैं जितना किया जा सकता है. तमाम आक्रामक बातें कहने के बावजूद ट्रंप ने कोई नया युद्ध शुरू नहीं किया. उम्मीद है कि ट्रंप अगर राष्ट्रपति बनते हैं तो वो अपने पुराने रिकॉर्ड को बरकरार रखेंगे. वहीं बाइडेन से उम्मीद है कि वो बुश और ओबामा से अलग, कुछ नया और वास्तविकता में शांति लाने वाले प्रयास करेंगे.