कोरोना वायरस ने भारत की कई कमियों की उजागर किया. इस संकट के वक्त में हमने जाना कि हमें तमाम क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है. इसी तरह कोरोना वायरस की वजह से ही दुनिया की कई महाशक्तियों की भी पोल खुली. अमेरिका ने महाशक्तियों में सबसे ऊपर है. यहां कोरोना से सबसे ज्यादा मौते हुई हैं. अमेरिका की तमाम खामियां इस दौरान सामने आई हैं. वो तमाम मिथक टूटे हैं जो हम भारतीय भारत से बैठकर अमेरिका के बारे में सोचते हैं, हालांकि अमेरिकी खुद भी अपनी व्यवस्था के खोखलेपन को अब समझ पा रहे होंगे. आज हम उन मिथकों की ही बात करेंगे जो हम अमेरिका के बारे में सोचते रहे हैं.

अमेरिका में एक भी जान की कीमत है-

अमेरिका के बारे में हमने सुना था कि वहां एक रोड एक्सीडेंट होने पर एक भी आदमी की हालत गंभीर होने पर हेलीकॉप्टर आ जाता है ताकि जान बचाई जा सकी. 911 जैसी इमरजेंसी सर्विस है जिस पर संपर्क करने पर कुछ मिनटों में ही आप तक मदद पहुंच जाती है. ये सब वाकई अमेरिका में होता भी रहा है. ये सबकुछ सुनकर लगता था कि वाकई अमेरिका में लोगों की जान की कीमत है और उन्हें बचाने का प्रयास किया जाता है. भारत में तो रोड एक्सीडेंट होने पर मौके पर एंबुलेंस भी पहुंच जाए तो बड़ी बात है. इसी अमेरिका में आज 40 हजार से ज्यादा लोग अपनी जान कोरोना वायरस की वजह से गंवा चुके हैं. मास्क से लेकर वेंटिलेटर तक के लिए अमेरिका को दूसरे देशों में निर्भर रहना पड़ा. अमेरिका बहुत कम सामान का प्रोडक्शन करता है इसलिए उसे दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. दूसरी तरफ लोग और सरकार इस बीमारी को लेकर गंभीर नहीं थे. 28 फरवरी को नॉर्थ चार्ल्सटन में एक रैली के दौरान ट्रंप ने कहा कि हम कोरोना को लेकर पूरी तरह से तैयार हैं और डेमोक्रेटिक पार्टी उन्हें नीचा दिखाने के लिए बार बार कोरोना का मुद्दा उठा रही है. ट्रंप ने कोरोना को डेमोक्रेटिक पार्टी का एक ड्रामा बताया. दूसरी तरफ लोगों का कहना था कि चीन में बेवजह कोरोना से हाहाकार मचा है और इतने लोग तो अमेरिका में सामान्य बुखार से मर जाते हैं. ट्रंप समर्थकों की हालत तो ये थी कि सोशल मीडिया पर वो कहते नजर आए कि 35 करोड़ की आबादी के देश में 1 लाख लोग मर भी जाएंगे तो क्या होगा.

जिस अमेरिका में हम एक एक जान की कीमत समझते थे, उसकी हालत ये है. आज अमेरिका में एक एक दिन में 2500 लोग तक अपनी जान गंवा रहे हैं. कोरोना ने अमेरिका के बारे में हमारे एक मिथक को पूरी तरह से तोड़ दिया है. महाशक्तिशाली देश की ताकत पूरी तरह से खुलकर सामने आ चुकी है. ये देश महज अपने हथियारों के दम पर भले दुनिया को डरा दे, लेकिन अंदर से खोखला है.

अमेरिका की राजनीति भारत से बेहतर है-

भारत में नेताओं को लेकर लोग वोट जरूर करते हैं लेकिन गुस्सा भी रहता है. भारत में नेता कब किस मुद्दे पर अपनी राजनीति चमकाने में लग जाएं, इसका कोई भरोसा नहीं है. आज कोरोना संकट के दौर में जैसा कि हम पीपुल पोस्ट में लिख भी चुके हैं कि सीधे राजनीतिक पार्टियां भले ही राजनीति ना करें लेकिन सोशल मीडिया पर आईटी सेल के जरिए यह काम जारी है. यहां की राजनीति और अमेरिका में चुनाव से लेकर जिस तरह की प्रक्रिया थी उसे देखकर लगता था कि वहां के हालात यहां से बेहतर हैं. जो रॉबर्ट गेट्स जॉर्ज बुश की रिपब्लिकन कैबिनेट में रक्षा मंत्री थे वही डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा की कैबिनेट में भी रक्षा मंत्री बने रहते हैं. भारत में ऐसा करने के लिए आपको विचारधारा के साथ समझौता करना पड़ता है और आप दलबदलू बनकर ऐसा काम कर पाते हैं लेकिन अमेरिका में ऐसा नहीं हुआ.

अमेरिका की इसी राजनीति पर पड़ा पर्दा कोरोना के दौर में उतर चुका है. जल्द ही अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं और डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन के बीच राजनीति चरम पर है. जिस देश में 40 हजार से ज्यादा लोग अपनी जान कोरोना की वजह से गंवा चुके हों, वहां जबरदस्त राजनीति हो रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप अभी लॉकडाउन हटाने के पक्ष में हैं. ट्रंप का कहना है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था को खतरे में नहीं डाल सकते. दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी के गवर्नर अपने राज्यों में लॉकडाउन हटाना नहीं चाहते, वो लॉकडाउन बढ़ा चुके हैं. अमेरिका के विस्कांसिन राज्य की राजधानी मेडिसन में 24 अप्रैल को लॉक़डाउन के खिलाफ रैली होने वाली है. इस रैली में 3000 लोग शामिल होने वाले हैं. आर्टिकल लिखे जाने तक 2400 लोग रैली में शामिल होने के लिए रजिस्ट्रेशन करवा चुके हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस रैली के समर्थन में हैं और लॉकडाउन के विरोध में हो रहे ऑनलाइन प्रोटेस्ट का समर्थन कर रहे हैं. इससे पहले जब न्यूयॉर्क की हालत खराब थी तो ट्रंप ने लॉकडाउन का आदेश दिया. उस वक्त न्यूयॉर्क के गवर्नर एंड्रयू क्यूमों ने ट्रंप के आदेश को यह कहकर मानने से मना कर दिया कि ट्रंप को राज्य में लॉकडाउन लगाने का अधिकार नही है. हालत ये है कि अजीब क्रोनोलॉजी बन चुकी है, रिपबल्किन राष्ट्रपति का आदेश डेमोक्रेटिक गवर्नर नहीं मानते और डेमोक्रेटिक गवर्नर का आदेश स्थानीय प्रशासन के रिपब्लिकन मेयर और काउंटी एडमिनिस्ट्रेटर नहीं मानते.

विस्कांसिन के डेमोक्रेटिक गवर्नर ने राज्य में 26 मई तक लॉकडाउन बढ़ाने का ऐलान किया था लेकिन यहां कि वाशिंगटन काउंटी के रिपब्लिकन प्रशासक ने इनके आदेश को मना कर दिया और गोल्फ कोर्स समेत कई सुविधाओं पर पाबंदी हटाने का आदेश जारी कर दिया. इसी तरह अन्य जगहों पर भी हालत खराब है. राष्ट्रीय से लेकर जिला स्तर तक पर राजनीति जारी है. दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक पार्टी की सियासत भी जारी है. यहां राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के तौर पर जो बिडेन का नाम साफ हो चुका है और वो कोरोना वायरस के मुद्दे पर राष्ट्रपति ट्रंप को लगातार घेर रहे हैं. अमेरिकी राजनीति की हालत देखकर अपने देश के नेता भी फिर भी ठीक नजर आ रहे हैं.

अमेरिका से जुड़े हुए उन दो मिथकों के बारे में आज हमने बात की जो कोरोना वायरस की वजह से टूट गए. कोरोना ने अमेरिका को दूर का वो सुहावना ढोल साबिक कर दिया है जो अब फट चुका है.

ये भी पढ़े
महामारी के समय भी सोशल मीडिया पर गन्दी राजनीति से बाज नहीं आ रहे राजनीतिक दल