अमेरिका में हुए सत्ता परिवर्तन के साथ ही भारत और अमेरिका के आपसी सम्बन्ध किस ओर जायेंगे उस पर संशय बना हुआ है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी के आपसी घनिष्ठ सम्बन्ध किसी से छुपे नहीं थे। हालांकि दोनों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध दोनों देशों के आपसी फायदे पर आधारित रहे है।

पूरी दुनिया में चीन जिस तरह से अमेरिका के लिए एक नयी चुनौती बन कर उभरा है। चीन ने आर्थिक उन्नति के साथ साथ रक्षा क्षेत्र में भी विकास किया है। पूरी दुनिया में हथियारों को बेंचने वाले देशों में अमेरिका पहले नंबर पर और रूस दूसरे नंबर पर है। पर चीन जिस तरह से नये हथियारों के विकास में लगा हुआ है बल्कि सामरिक दृष्टि से महत्त्पूर्ण इलाकों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।

इसके साथ ही रूस के आर्थिक रूप से कमजोर पड़ने के कारण बहुत से मामलों में अब उसकी हैसियत पहले जैसी नहीं रही है। जिस वजह से सयुंक्त राष्ट्र हो या दुनिया के अन्य फोरम हर जगह चीन ने रूस की जगह ले ली है। चीन अब यूरोपियन देशों खासतौर से ब्रिटेन और उसके अलावा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को भी आँखे दिखाने से नहीं डरता।

पूरी दुनिया में वर्चस्व कायम करने की इस लड़ाई में अमेरिका को एशिया में एक ताकतवर सहयोगी की जरूरत है। बीते सालों तक जब भारत और रूस के सैन्य सम्बन्ध बहुत ही ज्यादा घनिष्ठ थे ऐसे में अमेरिकी पाकिस्तान को हथियार और अन्य जरूरी सैन्य सामान बेच कर इलाके में अपने सैन्य नेटवर्क को मजबूत कर रहे थे।

आतंकवाद के मामले में पूरी दुनिया में बदनाम होने और बेहद ख़राब आर्थिक हालत की वजह से पाकिस्तान चीन पर धीरे धीर पूरी तरह से निर्भर होता गया। ओसामा बिन लादेन के पाकिस्तान में मारे जाने और अफगानिस्तान में तालिबानी लड़ाकों को मिल रही पाकिस्तानी मदद की वजह से अमेरिका के लिए पाकिस्तान की आर्थिक मदद कर पाना बहुत लम्बे समय तक संभव भी नहीं था।

ऐसे में अमेरिका को क्षेत्र में वायु और नौसैनिक गतिविधि जारी रखने के लिए एक ऐसे सहयोगी की तलाश थी जो न सिर्फ अमेरिकी गतिविधियां जारी रखने में मदद करे बल्कि खुद भी सैन्य और आर्थिक रूप से इतना समृद्ध हो जो चीन को चुनौती भी दे सके। ऐसे में अमेरिका के सभी मापदंडो पर भारत खरा उतरता था जिस वजह से ओबामा और डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के संबंधो में इतनी रूचि दिखाई।

भारत और अमेरिकी संबंधो का यह बेहद महत्त्पूर्ण समय है। क्यों की अमेरिका में सत्ता डोनाल्ड ट्रम्प के हाथों से निकल कर बाइडेन के हाथों जा चुकी है। डेमोक्रेटिक पार्टी का मौजूदा भारत सरकार की नीति को लेकर रुख बेहद उत्साह जनक नहीं रहा है। हालांकि जैसे सभी जानते है की दोनों के सम्बन्ध आपसी फायदे पर आधारित है ऐसे में अमेरिका की भारत पर निर्भरता ज्यादा है। किसी समय में भारत की अमेरिका से अच्छे संबंधो को लेकर ज्यादा उत्साहित रहता था पर अब मजबूत भारत से अच्छे सम्बन्ध अमेरिका की भी जरूरत है।

ऐसे बेहद खास समय में जब अमेरिकी रक्षा मंत्री लायड आस्टिन भारत के दौरे पर है, तब अमेरिकी सीनेट कमेटी के चेयरमैन बॉब मेंडेज ने रक्षा मंत्री आस्टिन को पत्र लिख कर कहा है की भारत को ये समझना चाहिए की अगर वो रूस से S 400 प्रणाली की डील करता है तो अमेरिकी नियम के अनुसार भारत भी प्रतिबंधों के दायरे में आता है। इससे जाहिर होता है की बाइडेन प्रसाशन भारत और रूस के बीच हुई इस डील को रद्द करने की कोशिश में है।

यह पत्र उस समय भी लिखा गया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन ने रूस के राष्ट्रपति को हत्त्यारा कहा और उसके बाद रूस से उसके सम्बन्ध और भी निचले स्तर पर जाने की सम्भावना है। रूस भी अमेरिका के इस दवाब को समझ रहा है और रूस के विदेश मंत्री अगले महीने भारत की यात्रा पर आ रहे है।

इससे पहले भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रूस की यात्रा की थी और रूस से जल्द से जल्द मिसाइल डिलीवरी शुरू करने को कहा था। भारतीय सेना का एक बड़ा दल पहले ही रूस की यात्रा पर है और S-400 प्रणाली को इस्तेमाल की ट्रेनिंग ले रहा है। भारत ने पहले भी साफ़ किया है की अमेरिकी दवाब में वह रूस के साथ की गयी किसी भी डील को रद्द नहीं करेगा।

बीते साल अमेरिका ने अपने मित्र देश तुर्की पर इस प्रणाली को लेने के बाद प्रतिबन्ध लगा दिए थे। हालांकि अमेरिका भी ये जनता है की भारत और तुर्की में बहुत फर्क है। एशिया पैसिफिक क्षेत्र में अगर कोई देश चीन के प्रभाव को मजबूती से कम करने में सक्षम है तो वह भारत है ऐसे में क्या वाकई अमेरिका भारत पर तुर्की जैसे प्रतिबन्ध लगा पाने की स्तिथि में है ये भी सोचने का विषय है।

मौजूदा माहौल में मोदी सरकार के सामने चुनौती यह होनी चाहिए की कैसे इसका लाभ उठा कर अमेरिका से ज्यादा से ज्यादा व्यापार और हथियारों की तकनीकी को भारत लाया जाये। अमेरिकी सरकार की किसी भी तरह के प्रतिबन्ध की गीदड़ भभकी के दवाब से भारत सरकार को बचना चाहिए।