कोरोना वायरस के चलते दुनिया में कई देश एक दूसरे की मदद कर रहे हैं. इसी बीच चीन ने भी कुछ देशों को मदद दी. चीन ने पाकिस्तान को मदद के तौर पर मास्क दिए. जब पाकिस्तान ने इन मास्क को चेक किया तो ये अंडरवियर से बने पाए गए. इसके अलावा कुछ देशों से चीन मे मुफ्त में सामान लिया और फिर उसे उन्हीं देशों के बेच दिया. चीन की तरह ही अमेरिका की भी एक ऐसी ही मदद चर्चा बनी थी. अमेरिका ने यह मदद अपने कट्टर प्रतिद्वंदी रुस को दी थी. दरअसल 1980 के वक्त में सोवियत संघ की हालत खराब थी. वहां फूड सिक्योरिटी चैन टूट गई थी. लोगों को खाने पीने का संकट का पैदा हो गया था. ऐसे में रूसी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाच्योव ने अमेरिका राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के साथ एक ट्रेड डील की. इसके तहत अमेरिका रूस को चिकन भेजने को तैयार हुआ. अब इस चिकन को बुश लेग के नाम से क्यों जाना गया ये पढ़िए.

अमेरिका में लोग चिकन का ऊपरी हिस्सा खाना पसंद करते थे. ऐसे में चिकन का पैरों वाला हिस्सा बेकार हो जाता था. अमेरिका चिकन के पैरों वाला हिस्सा कूड़े के तौर पर फेंका जाता था. अमेरिकी राष्ट्रपति ने चिकन के नाम पर रूस को ये पैरों वाला हिस्सा भेजना शुरु कर दिया. इसीलिए इस चिकन को बुश लेग के नाम से जाना जाता है. रुसी लोगों ने इसे सालों तक अपने अपमान के तौर पर देखा हालांकि खाने की कमी की वजह से रुस को ये अपमान सहना पड़ा. रूस के लोगों का ये भी मानना था कि अमेरिका चिकन को केमिकल के इंजेक्शन लगाकर बड़ा करता है इसीलिए चिकन में कोई स्वाद नहीं होता.

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2002 में रूस ने अमेरिका से आने वाले इस बुश लेग चिकन पर बैन लगा दिया. दरअसल उस वक्त अमेरिका ने स्टील पर टैरिफ बढ़ा दिया था. इसके बाद 2008 में जॉर्जिया के साथ तनाव के चलते रूस ने अमेरिका पर क्षेत्र में अशांति फैलाने का आरोप लगाया और कई अमेरिकी चिकन कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया. 2010 में तत्कालीन रूसी पीएम और वर्तमान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बुश लेग पर पूरी तरह से प्रतिबंध का ऐलान कर दिया.

अमेरिका कोरोना संकट से इस समय बुरी तरह प्रभावित है. रूस ने भी ऐसे समय में वेंटिलेटर समेत मदद का सामान अमेरिका भेजा है. माना जा रहा है कि रूस ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए ये मदद अमेरिका को भेजी है