11 साल के एक बच्चे को उसका बड़ा भाई मुंबई के शिवाजी पार्क में अंडर-15 क्रिकेट खिलाड़ियों के सेलेक्शन के लिए लगे समर कैंप में लेकर जाता है.वहां एक क्रिकेट कोच के सामने बच्चे को बैटिंग करने का मौका मिलता है.अपनी क़लोनी में हमउम्र बच्चों के साथ गावस्कर और विवियन रिचर्ड्स की नकल करते हुए खेलने वाला बच्चा वहां घबरा जाता है.

कोच को बच्चे के खेल में कोई खूबी नजर नहीं आती.उन्हें लगता है की बच्चे की उम्र अभी कम है.उन्होंने बच्चे के बड़े भाई को यही बोला भी,लेकिन बच्चे के बड़े भाई को उस पर पूरा भरोसा था.उन्होंने कोच से बच्चे को एक और मौका देने को कहा.कोच ने उस शख्स की बात मान ली और बच्चे को एक और मौका दिया.और फिर उसे अपनी टीम में शामिल कर लिया.

ये कहानी है दुनिया के महान क्रिकेट खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर और उनके गुरू रमाकांत आचरेकर के बीच पहली मुलाकात की.सचिन के गुरू रमाकांत आचरेकर का कल मुंबई में निधन हो गया था.सचिन ने अपनी आत्मकथा प्लेयिंग ईट माई वे के दूसरे अध्याय में अपने गुरू के साथ अपनी पहली मुलाकात के दिलचस्प किस्से का जिक्र किया है.सचिन ने कल अपने गुरू को प्रतिक्रिया देते हुए कहा की अब 'अब आचरेकर सर के स्वर्ग में होने से वहां भी क्रिकेट चमकेगा।

पहली मुलाकात में आचरेकर के दिए गए उस दूसरे मौके के बारे में सचिन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं की इस मौके से वो बेहद खुश थे और इससे उनकी जिंदगी बदल गई.अपनी कालोनी में टेनिस बॉल के साथ खेलने वाले सचिन ने रमाकांत आचरेकर के मार्गदर्शन में ही टेनिस बॉल छोड़कर पहली बार क्रिकेट बॉल से खेलना शुरू किया था.

क्रिकेट जगत में अपनी बल्लेबाजी के दम पर 24 साल तक राज करने वाले तेंदुलकर के करियर पर आचरेकर का गहरा प्रभाव था और यही वजह थी की सचिन लगातार अपनी सफलता का श्रेय उन्हें देते हैं.आपने शायद उन सिक्कों के बारे में सुना होगा जो जिन्हें सचिन अपने जीवन के सबसे बड़े उपहार मानते हैं.दरअसल जब सचिन स्कूल में प्रैक्टिस करते थे तो उनके कोच आचरेकर एक रुपये का सिक्का विकेट पर रख देते थे और सभी गेंदबाजों से बोलते थे कि अगर उन्होंने सचिन का विकेट लिया तो वह सिक्का उनका हो जाएगा, सचिन ने भी कभी अपने गुरु को निराश नहीं किया और पूरे सेशन में उन्हे कोई आउट नहीं कर पाया. सचिन ने कुल 13 सिक्के जीते और वो इन्हें अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा उपहार मानते हैं.

अनुशासन गुरू और शिष्य के रिश्ते के बीच अहम हिस्सा होता है और आचरेकर और तेंदुलकर भी इससे अछूते नहीं रहे.2017 में तेंदुलकर ने ट्वीट कर बताया की आचरेकर की एक डांट ने किस तरह उनकी जिंदगी बदल दी.यह मेरे स्कूल के दिनों के दौरान बात थी. मैं अपने स्कूल (शारदाश्रम विद्यामंदिर स्कूल) की जूनियर टीम से खेल रहा था और हमारी सीनियर टीम वानखेडे स्टेडियम (मुंबई) में हैरिस शील्ड का फाइनल खेल रही थी. उसी दिन अचरेकर सर ने मेरे लिए एक प्रैक्टिस मैच का आयोजन किया था. उन्होंने मुझसे स्कूल के बाद वहां जाने के लिए कहा था. उन्होंने (अचरेकर सर ने) कहा, 'मैंने उस टीम के कप्तान से बात की है, तुम्हें चौथे नंबर पर बैटिंग करनी है.' सचिन ने बताया कि मैं उस प्रैक्टिस मैच को खेलने नहीं गया और वानखेडे स्टेडियम सीनियर टीम का मैच खेलने जा पहुंचा. मैं वहां अपने स्कूल की सीनियर टीम को चीयर कर रहा था. खेल के बाद मैंने आचरेकर सर को देखा, मैंने उन्हें नमस्ते किया. अचानक सर ने मुझसे पूछा, 'आज तुमने कितने रन बनाए? ' सचिन के अनुसार- मैंने जवाब में कहा-सर, मैं सीनियर टीम को चीयर करने के लिए यहां आया हूं. यह सुनते ही, अचरेकर सर ने सबके सामने मुझे डांट लगाई. उनके एक-एक शब्‍द अभी भी मुझे याद हैं.

सचिन लिखते हैं "'दूसरों के लिए ताली बजाने की जरूरत नहीं है. तुम अपने क्रिकेट पर ध्यान दो. ऐसा कुछ हासिल करो कि दूसरे लोग, तुम्‍हारे खेल को देखकर ताली बजाएं.' मेरे लिए यह बहुत बड़ा सबक था, इसके बाद मैंने कभी भी मैच नहीं छोड़ा. सचिन के मुताबिक, सर की उस डांट ने मेरी जिंदगी बदल दी. इसके बाद मैंने कभी भी क्रिकेट प्रैक्टिस को लेकर लापरवाही नहीं की. परिणाम सबके सामने हैं.

क्रिकेट की दुनिया में भगवान का दर्जा हासिल करने वाले सचिन लगातार अपने गुरू का आशर्वीद लेने जाते रहते थे.बीते साल अक्टूबर में जब सचिन मुंबई में तेंदुलकर मिडिलसेक्स ग्लोबल अकादमी की शुरूआत करने वाले थे तो उन्होंने विनोद कांबली के साथ जाकर उनका आर्शीवाद लिया.सचिन तेंदुलकर ने इस मुलाकात की तस्वीरें ट्वीट करते हुए लिखा था, 'एक खास दोपहर उस इंसान के साथ जिसने हमें इतना कुछ सिखाया और हमे वो बनाया जो आज हम हैं। कल टीएमजीए मुंबई कैंप की शुरुआत से पहले उनका आर्शीवाद सबसे जरूरी है।'

बेशक रमाकांत आचरेकर ने कल इस दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन सचिन के तौर पर नायाब हीरा जो उन्होंने क्रिकेट जगत और भारत को दिया उसके बाद वो वाकई अमर हो चुके हैं.अलविदा रमाकांत आचरेकर......