यजुवेंद्र चहल का हाल ही में एक वीडियो सामने आया. वीडियो में वो महेंद्र सिंह धोनी को याद करते हुए एक खाली सीट का जिक्र करते हैं. बस की आखिर के कोने की सीट. पूरी बस खाली होने की बावजूद अक्सर मैं उस सीट पर बैठना पसंद करता हूं. ये जानते हुए भी कि वहां बहुत धक्के लगते हैं. फिर भी, क्योंकि वहां एक अलग शांति है. शायद धोनी भी उसी शांति की तलाश में उस पीछे की सीट तक जाया करते होंगे. हालांकि शांति और धोनी एक दूसरे के पर्यायवाची लगते हैं. विपत्तियों के बीच शांति से मुस्कुराते हुए हमने समस्या हल करने वाले भगवान कृष्ण की तमाम कथाएं पढ़ी होंगी. श्रीकृष्ण के धैर्य को हमने क्रिकेट के मैदान में धोनी के अंदर देखा. कभी विकेट के पीछे तो कभी आगे. श्रीकृष्ण भगवान थे तो वो महज उंगली उठाकर ही चमत्कार कर देते थे लेकिन इंसान होते हुए धोनी को भी क्रिकेट के मैदान में चमत्कार के लिए बस आंखों और हाथ के कुछ इशारों की जरूरत पड़ती थी.

पिता और पुत्र शिखर और ढलान के सबसे अच्छे उदाहरण हैं. जब पिता अपनी उम्र के ढलान पर होता है उसी वक्त उसका बेटा शिखर की तरफ बढ़ रहा होता है. सचिन तेंदुलकर अपने रिटायरमेंट तक एक जैसा ही खेलते रहे. हालांकि चोटों ने उन्हें परेशान जरूर किया और आखिर में एक उम्र पर सबको रुकना होता है. जब सचिन उस उम्र की तरफ बढ़ रहे थे तब धोनी शिखर पर चढ़ रहे थे. जब अजहरुद्दीन के मैच फिक्सिंग कांड ने क्रिकेट को हिलाया तो गांगुली ने भारत को संभाला और जब चैपल के फैसलों ने क्रिकेट का बंटाधार किया तो धोनी ने इसे थाम लिया. बल्लेबाजी और विकेटकीपिंग के साथ कप्तानी का बोझ अपनी पीठ पर लादकर वो एडमंड हिलेरी की तरह एवरेस्ट की चढ़ाई पर निकल गए. इस चढ़ाई को भारतीय दर्शकों की उम्मीदें और मुश्किल कर देती हैं. कमजोर गेंदबाजी का आक्रमण लेकर भी धोनी ने विश्वकप उठाकर एवरेस्ट के शिखर को पीछे छोड़ दिया.

इसके बाद भी कई मौके आए जब धोनी ने भारत को मुस्कुराने का मौका दिया. बीते दिनों बीजेपी ने नारा दिया था, मोदी है तो मुमकिन है. धोनी जब तक टीम में रहे सबकुछ मुमकिन सा लगता रहा. 2015 के विश्वकप के सेमीफाइनल में भी जब बड़े लक्ष्य का पीछा करते हुए टीम इंडिया हारने लगी तो धोनी ही थे जो एकतरफा जीत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खड़े रहे. जब तक धोनी मैदान पर थे तब तक लगता रहा कि धोनी है तो मुमकिन है. धोनी तब रन आउट हुए थे. वक्त देखिए 4 साल बाद भी धोनी रन आउट ही हुए और जब रन आउट हुए तब भी सभी सोच रहे थे 'धोनी है तो मुमकिन है'. ये उम्मीद तब भी कायम थी जब धोनी के मैच फिनिश करने की क्षमता पर सवाल खड़े होने लगे थे.

महानता के अपने अपने पैमाने होते हैं, विंस्टन चर्चिल हिटलर से इंग्लैंड को बचाने के बाद भी चुनाव हार गए थे. धोनी भी 15 साल के अपने करियर में बहुतों के लिए विलेन की तरह हैं. मैंने भी उन्हें विलेन की तरह देखा है, बल्कि उन्हें बुरे सन्यांस की बद्दुआ भी दी है. जब सौरव गांगुली को मजबूर होकर सन्यास लेना पड़ा तो लगा कि धोनी के साथ भी ऐसा ही होना चाहिए लेकिन वक्त सारे समीकरण बदल देता है. आज टीम इंडिया की बस की वो आखिरी खाली सीट बहुत दुख दे रही है. अपनी बद्दुआओं पर अफसोस भी है.

यूपी बिहार के लोगों अक्सर कागज में अपनी उम्र कम लिखवाते हैं. धोनी भी मुझे इस परंपरा के अनुयायी मालूम पड़ते हैं. सफेद दाढ़ी ज्यादा उम्र की ओर इशारा करती है. फिर भी एनर्जी और धोनी के जादू की वजह से आंखे उन्हें वापस मैदान पर वापस देखना चाहती हैं. बैटमैन सीरीज की फिल्म डार्क नाइट राइजेज में जब गोथम बर्बाद होने वाला होता है तो लोग शहर से गायब हो चुके बैटमैन के बारे में पूछने लगते हैं, क्या वो वापस आएगा ? बैटमैन हमेशा की तरह वापस आता है और अपने शहर को अपनी जान देकर बचाता है. भारतीय टीम फिलहाल अच्छा कर रही है. लोग ऋषभ पंत न सही के एल राहुल से काम चला ही रहे हैं. बीते दिनों ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक मैच में हार के बाद जरूर लोगों ने धोनी को याद किया लेकिन फिर से वो गायब हो गए. बीसीसीआई ने धोनी को कॉन्ट्रैक्ट लिस्ट से बाहर कर दिया है. फिलहाल उनके वापस आने की कोई खबर नहीं है. लोग कह रहे हैं IPL में अच्छा खेले तो शायद विश्वकप टी-20 में उन्हें जगह मिले. धोनी के तमाम फैंस के मन में गोथम के नागरिकों की तरह सवाल है, क्या वो वापस आएगा ? मुझे नहीं लगता कि वो आएगा.

धोनी का नाम लेने पर पहले उनकी विजय कुटिल मुस्कान की छवि याद आती थी, लेकिन अब 2019 के सेमीफाइनल में रन आउट के बाद का वो रोता चेहरा याद आता है. हमेशा मुस्कुराकर चुनौतियां झेलने वाले की वो छवि हृदय विदारक है. ऐसा लगता है कि 15 साल के उस सुनहरे सफर को मार्टिन गप्टिल ने अपने रन आउट से धूमिल कर दिया है. धोनी के सफर को देखने का ये मेरा नजरिया है, शायद वो इसे किसी और तरह से देखते हों. फिर भी लगता है कि उस हृदयविदारक छवि को मिटाने के लिए धोनी को वापस आना चाहिए.