31 जुलाई 1948 की वो खास शाम जो भारतीय फुटबाल के इतिहास में हमेशा के स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गयी। ओलंपिक खेलो के दौरान, पूर्वी लंदन का एक टाउन इलफोर्ड जंहा एक खास मुकाबला खेला जा रहा था भारत और फ्रांस के बीच।

17000 लोगो से खचाखच भरा स्टेडियम और नंगे पांव खेलती भारतीय फुटबाल टीम। फ्रांस ने 1-0 की बढ़त हासिल की पर खेल के 70 मिनट में भारत के रमन ने गोल दाग कर खेल को बराबरी पर ला दिया। हालॉकि फ्रांस ने ये खेल 2-1 से जीत लिया पर भारतीय टीम ने लोगो की दिलो को जीता।

भारत ने 2 पेनल्टी स्ट्रोक मिस किये वरना खेल का रिजल्ट शायद कुछ और ही होता।

उसके बाद बकिंघम पैलेस में भारतीय टीम के सम्मान में आयोजित चाय पार्टी में जब राजकुमारी मार्गरेट ने भारतीय कप्तान शैलेन्द्र नाथ मन्ना से पूछा "क्या इस तरह नंगे पांव खेलने से दर्द नहीं होता" मन्ना का जबाब था " नहीं हम ऐसे ही खेलना पसंद करते है, गेंद पर नियंत्रण करना आसान होता है" उन्होंने भारतीय फुटबाल की गरीबी का जरा भी अहसाह नहीं होने दिया।
इसके बाद कई सारे अफवाह भी फैली की इंग्लैंड के किंग जॉर्ज ने मन्ना का ट्रॉउज़र ऊपर करके देखा की कंही उनके पैर स्टील के तो नहीं बने है।

शैलेन्द्र मन्ना को बाद में इंग्लैंड के फुटबाल एसोसिएशन ने सर्वकालिक महानतम कप्तान की श्रेणी में रखा। उनके नेतृत्व में भारतीय टीम ने अपना पहला अंतर्राष्ट्रीय मैडल प्राप्त किया। ये मैडल भारत ने 1951 के एशियाई गेम्स में गोल्ड मैडल प्राप्त किया।

उस समय फुटबाल में पैसे नाम मात्र के भी नहीं थे, शैलेन्द्र मन्ना जो की मोहन बागान की तरफ से क्लब लेवल फुटबाल खेलते थे, उन्हें अपनी ड्रेस के पैसे खुद ही देने पड़ते थे। फुटबॉल के जूते खरीद पाना किसी के लिए संभव नहीं था।

मन्ना को दो बातों का मलाल हमेशा रहा एक फ्रांस के खिलाफ पेनल्टी स्ट्रोक मिस करना और दूसरा वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई करने के बाद भी भारतीय टीम का ब्राज़ील न पहुंच पाना। दरअसल भारतीय फुटबाल संघ पैसे के आभाव से गुजर रहा था और टीम के क़्वालीफाय करने के बाद भी टीम पर इतना भरोसा नहीं दिखा सका की टीम को ब्राज़ील भेजा जा सके।