हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे आ चुके हैं. बीजेपी और शिवसेना महाराष्ट्र में सरकार बनाने वाले हैं, वहीं हरियाणा में बीजेपी को सरकार बनाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है. हरियाणा में बीजेपी ने अबकी बार 75 पार का नारा दिया था, फिर आखिर ऐसा क्या हो गया कि बीजेपी राज्य में महज 40 सीटों पर सिमट गई. आखिर कांग्रेस ने कैसे हरियाणा में 31 सीटों पर बाजी मार ली. हरियाणा चुनाव के नतीजों का सबसे बड़ा संदेश क्या है, इस पर एक नजर-

हरियाणा चुनाव में बीजेपी पूरी तरह से बड़ी जीत के लिए आश्वस्त थी. सीएम खट्टर के बयानों और बाकी बीजेपी के नेताओं के बयानों से भी यही लगा था. यहां तक कि कई एग्जिट पोल भी धोखा खा गए और उन्होंने बीजेपी की बड़ी जीत की भविष्यवाणी कर दी. दरअसल ये हवा कहीं न कहीं लोकसभा चुनाव के नतीजे देखकर बनी थी. लोगों को ऐसा लगा कि जैसे पार्टी ने लोकसभा में अच्छा किया है, वैसे ही यहां भी बड़ी जीत होगी लेकिन विधानसभा चुनाव के नतीजे अलग आए.

दरअसल हरियाणा की राजनीति जाट बनाम गैर जाट की है. 2014 में बीजेपी बगैर चेहरे के ही चुनाव लड़ी. ऐसे में मोदी लहर के बीच बीजेपी को हर जाति का वोट मिला. हरियाणा की राजनीति में हमेशा हावी होने रहने वाले जाटों को लगा था कि बीजेपी किसी जाट नेता को सीएम बनाएगी लेकिन बीजेपी ने इसका उल्टा किया. बीजेपी ने इस समीकरण को बदलने की कोशिश की. एक गैर जाट नए नेता को सीएम बनाया गया. इसके बाद जाट आरक्षण के लिए 2017 में आंदोलन भी हुआ. यह बेहद हिंसक आंदोलन था. प्रशासन की कार्रवाई में कई लोगों की मौत हुई. ऐसे में जाट बीजेपी के खिलाफ हो गए.

उधर कांग्रेस में भूपेंद्र हुड्डा के बजाय अशोक तंवर को प्रदेश की कमान मिली. अशोक तंवर भी गैर जाट नेता थे. इस तरह कांग्रेस और बीजेपी दोनों से ही जाटों ने खुद को कटा हुआ महसूस किया. 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को बड़ी सफलता मिलने के बाद बीजेपी अपनी पुरानी रणनीति पर कायम रही. उधर कांग्रेस ने अशोक तंवर को हटाकर कुमारी शैलजा और भूपेंद्र हुड्डा को पार्टी की कमान दे दी. दूसरी तरफ खत्म हो रही INLD से अलग होकर दुष्यंत चौटाला ने अलग पार्टी बना ली. दुष्यंत की छवि युवा और साफ सुथरे नेता की थी. ऐसे में हरियाणा में जाटों के पास दो विकल्प हो गए. पहली भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस और दूसरी जेजेपी.

बीजेपी ने चुनाव में जाट नेताओं को कम टिकट भी दिए. शायद यह गैर जाट जातियों को आकर्षित करने का तरीका भी हो लेकिन जाटों के बीच इसका गलत संदेश भी गया. इस तरह हरियाणा की सबसे बड़ी जाति बीजेपी से दूर हो गई. जाटों ने जेजेपी और हुड्डा के लिए वोट किया. शायद यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर हुड्डा को कमान नहीं मिली होती तो हरियाणा में जेजेपी की सीटें और भी बढ़ सकती थीं. बीजेपी को चुनाव में गैर जाट जातियों का वोट मिला है. इस तरह यह पता चलता है कि बीजेपी ने जातिगत राजनीति के तिलिस्म को तोड़ दिया है, यह कहना सही नहीं होगा. बीजेपी ने कोशिश अच्छी की लेकिन जातिगत राजनीति का दौर अभी जारी है और यह बात क्षेत्रीय पार्टियों के लिए अच्छा संकेत हैं.