बीते दिनों यूपी के इटावा से एक खबर सामने आई. यहां एक बुजुर्ग को सामान्य पहनावा होने की वजह से शताब्दी ट्रेन में चढ़ने से रोक दिया गया. बुजुर्ग ने धोती पहन रखी थी और पैरों में चप्पलें थीं. बुजुर्ग के पास ट्रेन का कन्फर्म टिकट था इसके बावजूद उसके साथ टीटी ने ये सलूक किया. टीटी के बर्ताव से नाराज बुजुर्ग ने रोडवेज बस से इसके बाद इटावा से गाजियाबाद तक का सफर किया.

घटना के एक दिन बाद रेल मंत्री पीयूष गोयल ने एक ट्वीट किया. इसमें उन्होंने बेहद सुविधा संपन्न ट्रेन वंदे भारत एक्सप्रेस का जिक्र किया. उन्होंने लिखा कि लोग इससे बेहद ही खुश हैं. उनके ट्वीट पर कई लोगों ने जवाब दिया. उन्होंने वंदे भारत एक्सप्रेस पर गर्व जताया. बीते दिनों कई बार शताब्दी में मैंने भी सफर किया. बेहतरीन आरामदायक सीटों पर विंडो सीट के पास बैठकर चाय पीते हुए बहुत अद्भुत फीलिंग आती है. फोन चार्जिंग की भी सुविधा है. खाना भी बढ़िया सीट पर मिल रहा है. शौचालय एकदम साफ हैं. कुलमिलाकर ऐसा लगता है कि मानो भारतीय रेलवे एकदम स्वर्णिम दौर में है. पर इन सभी सुविधाओं की कीमत ली जाती है. वो कीमत जो अंतर है अमीरी और गरीबी के बीच का. शताब्दी में बेहतर सुविधाओं का लाभ उठाते हुए 'फीलिंग प्राउड ऑन इंडियन रेलवे' कैप्शन के साथ एक बेहतरीन सेल्फी कोई भी डाल सकता है लेकिन उसे ये सोचना चाहिए कि क्या एक गरीब इंसान को जो आपकी तरह कीमत नहीं अदा कर सकता, उसे शताब्दी प्राउड फील करने का मौका देगी. अगर नहीं देगी तो कैसा फीलिंग प्राउड है.

वैसे तो गरीबों और अमीरों के साथ व्यवहार में अंतर के तमाम उदाहरण रोज मिल जाएंगे लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र में रेलवे खुला तौर पर इसे बढ़ावा देता है. सरकारी अस्पतालों की हालत खराब है. वहां अमीर इलाज नहीं कराते. वो प्राइवेट हॉस्पिटल में चले जाते हैं. बढ़िया सुविधाओं के साथ उनका इलाज होता है. आप इसे गरीबी-अमीरी के बीच का अंतर ही कह सकते हैं लेकिन यहां ऐसा नहीं है कि कोई सरकारी अस्पताल ज्यादा पैसे लेता हो जिसमें अमीरों को बढ़िया इलाज मिलता हो और गरीब उसमें जाने के बारे में सोच भी न सके. या अगर पैसे का जुगाड़ कर भी ले तो उसके पहनावे की वजह से उसे निकाल दिया जाए.

रेलवे में खुला तौर पर लगातार इस तरह का पक्षपाती व्यवहार हो रहा है. ट्रेन में जनरल डिब्बों की तादाद कम है. इनमें लोग शौचालयों में अगरबत्ती जलाकर सफर करते हैं ताकि इसकी बदबू को झेलकर सफर पूरा सकें. किसी स्टेशन पर लोग उतरते हैं तो एकदूसरे के सिर के ऊपर से पैर रखकर निकलने की नौबत आती है. जो जनरल से बचते हैं तो जैसे तैसे स्लीपर में घुसते हैं. जमीन में लेटकर या मान मनौवल , लड़ाई झगड़ा करके यहां सीट पर बैठकर सफर पूरा करते हैं.

रेल मंत्री जी के ट्वीट में इनकी बात कभी नहीं होती है. वो कभी नहीं कहते कि उन्हें ट्रेनों के ऐसे हालात पर शर्म भी आती है. ऐसे लोग ट्विटर भी इस्तेमाल नहीं करते जो ट्वीट कर बता सकें कि रेल मंत्री जी अभी अभी एक शख्स के सिर के ऊपर पैर रखकर ट्रेन से निकलकर आया हूं. खास बात ये है जिनकी आवाज उठाने की क्षमता है उन्हें ये अहसास भी कराया जा रहा है कि सब कुछ बढ़िया है. जो ट्विटर पर है वो बढ़िया ट्रेन में सफर भी कर रहा है. वो फीलिंग प्राउड कर रहा है. वंदे भारत और शताब्दी पर गर्व कर रहा है. रेल मंत्री जी भी खुशी से फूले हुए हैं वो बखान कर रहे हैं कि कैसे वंदे भारत समय पर ले जा रही है. बढ़िया खाना खिला रही है. खैर मंत्री जी का ये सब करना समझ में आता है. उन्हें खुद की और साथियों की कमियां छुपाना है. वो अगर कह देंगे कि जनरल डिब्बे देखकर शर्म आती है तो उनका अपमान हो जाएगा लेकिन दुर्भाग्य ये है कि जनता भी मंत्री जी की राह पर है.

जनता खुद बढ़िया है तो उसे सबकुछ बढ़िया दिखता है. ये सही है कि हमारी मीडिया में तमाम कमियां है. वो भटकाव की शिकार है लेकिन हर वक्त किसी से उम्मीद रखना भी तो बेईमानी है. जब आप ट्वीट करके मंत्री जी वंदे भारत के लिए बड़ाई कर सकते हैं तो जनरल कोच के लिए थोड़ी आलोचना भी कर दीजिए. इसमें भी कोई बहुत बड़ी क्रांति नहीं करनी है बस घर बैठे ही एक ट्वीट करना है जो बड़ा काम नहीं है. सोचिए आप के जैसे तमाम लोग अगर ऐसा करने लगे तो नेताजी के पास कुछ तो संदेश जाएगा. एक सामान्य राजनैतिक शर्म लिहाज में ही कुछ प्रभावी कदम उठाए जाएंगे. वर्ना ये वक्त है, कभी भी पलटी मार सकता है. भगवान न करे आपको कभी ट्रेन के जरनल डिब्बे का सफर करना पड़े और 'फीलिंग प्राउड' से सेल्फी का कैप्शन 'फीलिंग सेम' हो जाए.