कल 8 मार्च यानि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का दिन था. इस मौके पर महिलाओं के बारे में तमाम बातें लिखीं गईं. पूरे दिन को अलग तरीके से सेलिब्रेट किया गया, लेकिन ऐसा लगा कि इस दिन को सिर्फ़ उपलब्धियों के दायरे में देखा गया. महिलाएं कितनी मजबूत हैं और वो कितना आगे बढ़ चुकी हैं. इस पर बातें हुईं और लिखी गईं लेकिन महिलाओं के सामने क्या क्या चुनौतियां हैं, इस पर बहुत ज्यादा फोकस नहीं दिखा. आज के समय में भी महिलाओं के सामने तमाम चुनौतियां हैं. उन्हें पुरुषों के समान तमाम अधिकार मिले हैं, तो आज भी बहुत सी महिलाएं को बेसिक अधिकार भी नहीं मिले हैं. कुल मिलाकर स्थिति अभी भी सिर्फ इतनी है कि भविष्य में कुछ अच्छा होने की उम्मीद की जा सकती है. इसके कई उदाहरण हैं, मसलन स्मृति ईरानी के एक सशक्त महिला होने पर कोई शक नहीं कर सकता. उनकी अपनी एक पहचान है, लेकिन इसी देश में प्रधानपति और नगरपालिका प्रमुख पति, जैसे असंवैधानिक पद गढ़ दिए गए हैं. जब बात महिलाओं के प्रतिनिधित्व की होती है, तो वहां प्रतिशत बहुत ज्यादा होता है, लेकिन असलियत में तमाम महिला प्रधान महज अंगूठा लगाने या दस्तखत करने का काम करती हैं. ये हालत, जिला पंचायत अध्यक्ष और महिला विधायकों तक की होती है.

महिलाओं के सामने तमाम तरह की चुनौतियां हैं और एक बना बनाया सिस्टम है जिसमें आम तौर पर उन्हें चलना होता है. कई बार कोई वो सिस्टम तोड़ देता और आगे निकल जाता है, तो अधिकांश को उसी चक्र के भीतर जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ता है. चूंकि महिलाएं पहले बेटियां होती हैं, इसलिए हम उनके ज़रिए आज के समय में महिलाओं के विकास के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों के बारे में लिखने की कोशिश करेंगे. चूंकि आज मुखरता बहुत ज्यादा है, इसलिए कोशिश यही है कि उनके बारे में लिखा जाए जिनके बारे में आज बात बहुत कम होती है. हम ऐसी ही दो बड़ी चुनौतियों के बारे में बात करेंगे जो शायद अगर खत्म हो जाएं तो आज के समय में महिलाओं की स्थिति में बहुत बड़ा सुधार हो सकता है.

1. दहेज प्रथा- दहेज और शादी से जुड़े तमाम आडंबर महिलाओं के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं. आम तौर पर लोग बेटियों के जन्म से इसीलिए घबराते हैं क्योंकि उसकी शादी में बड़ा खर्च करना पड़ेगा. यही वजह थी कि बहुत से लोग बेटियों को गर्भ में ही मार देते थे. खैर सरकारी सख्ती की वजह से इस पर लगाम तो लगी है लेकिन बेटियों को लेकर नजरिया बदल नहीं पा रहा. गांवों में बेटियों के जन्म के साथ ही लोग उनकी शादी के बारे में चिंता करने लगते हैं. लिहाजा, पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया जाता. अगर लड़की पढ़ने लिखने की कोशिश करे भी तो ज्यादा से ज्यादा बीए करवाकर उसकी शादी करवा दी जाती है. मां-बाप को लगता है कि ज्यादा पढ़ाई में खर्च करेंगे तो शादी कैसे होगी.

इस सोच की वजह से ही, बड़ी दिक्कत है. इसका नतीजा यह होता है कि शादी के बाद भी लड़कियां घर के कामों में फंसी रह जाती हैं. दुर्भाग्यवश कोई दुर्घटना हो गई तो रिश्तेदारों के रहम पर जीना पड़ता है. सोचिए, अगर दहेज खत्म हो जाए तो मां-बाप पढ़ाई की तरफ ध्यान देंगे. लड़कियां पढ़ेंगी, आत्मनिर्भर बनेंगी. घर के साथ, बाहर की भी जिम्मेदारी संभालेंगी और कोई हादसा होने पर उन्हें किसी के सामने आश्रित भी नहीं होना पड़ेगा. सरकार ने दहेज प्रथा के खिलाफ कानून बनाया. लोगों को सजा भी होती है, लेकिन फिर भी दहेज रुक नहीं रहा क्योंकि हमारा समाज उसे रोकना नहीं चाहता. एक बड़ी साधारण सी सोच लोगों ने बना ली है कि लड़की की शादी में दहेज दो, लड़के की शादी में दहेज लो. हिसाब बराबर, लेकिन इसके इतर जाकर भी कुछ किया जा सकता है, यह सोचने की कोशिश कोई नहीं करता. लोग एक सिस्टम बनाए हुए हैं, उसी के हिसाब से चलते जा रहे हैं, लेकिन इसमें सुधार की ज़रूरत है. इस पूरी सोच में सुधार की जरूरत है.

2. महिला-सुरक्षा- महिला सुरक्षा आज के समय में महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध का हल अब तक सरकार या समाज ढूंढ नहीं पाए हैं. सड़क चलते होने वाली छींटाकशीं, किसी गांव के खेत से लेकर-दिल्ली की सड़कों पर होने वाले रेप तक को कम करने में कोई कामयाबी नहीं मिली है. पुलिस का रवैया भी इन मामलों में निराशाजनक ही रहता है. यह सही है कि तमाम बच्चियों से लेकर महिलाएं तक घर में अपने परिजनों की ही बुरी नजर की शिकार होती हैं, लेकिन उसे रोक पाना चुनौतीपूर्ण ज्यादा है लेकिन जहां सरकार रोक सकती है, वहां भी प्रयास असफल है.

भारत में माता-पिता पर एक बड़ा आरोप लगता है कि पुरूषवादी मानसिकता की वजह से लड़कियों को बाहर पढ़ने के लिए नहीं भेजते. दरअसल माता-पिता इस माहौल को देखकर हिम्मत नहीं कर पाते कि वो बेटियों को बाहर पढ़ने के लिए भेज पाएं. ज्यादातर शहरों के हालात ऐसे हैं कि वहां किसी महिला के साथ कब क्या घटना हो जाए, कोई भरोसा नहीं. ऐसे में वह भरोसा कायम नहीं हो पा रहा और नतीजा यह है कि आज भी बड़ी संख्या में जो लड़कियां पढ़ लिखकर आगे जा सकती हैं वो सिर्फ इस भयानक माहौल की वजह से अपनी पढ़ाई छो़ड़ने को मजबूर हैं. अगर यह माहौल सुरक्षित बनाया जा सके, तो बेशक महिलाओं के सशक्तिकरण में बड़ा सुधार होगा.

हमने ऊपर दो बड़ी चुनौतियों के बारे में लिखा है. ऐसा नहीं हैं कि बाकी चुनौतियां नहीं हैं. आज के दौर की एक बड़ी चुनौती फर्जी नारीवाद भी है. ऐसा नारीवाद जिसे पढ़कर लगेगा कि इसका जमीन से कोई संबंध नहीं है. यह नारीवाद बहुत ही उत्तेजक है और हमेशा तुरंत परिणाम चाहने की इच्छा में रहता है. अच्छी बात यह है कि जिन लोगों को वाकई सशक्तिकरण की जरूरत है, वो इसके झांसे से बहुत दूर हैं. उन्हें एक सही राह की जरूरत है, जिस पर चलकर वो अपना भविष्य अच्छा बना सकें. ऐसा हुआ भी है और आगे भी होगा. इसी भारत से सती-प्रथा खत्म हुई थी और इसी भारत में एक दिन दहेज भी खत्म होगा और महिलाएं भी सुरक्षित होंगी.