देश में पिछले कुछ सालों से लगातार क्रांति का दौर रहा है. सीधे शब्दों में कहें, तो 2014 के बाद से ही. वैसे क्रांति का दौर अन्ना आंदोलन और निर्भया आंदोलन के समय में भी चला, लेकिन वो क्रांतिया जनता से सीधे तौर पर जुड़ी हुई थीं. नतीजा यह हुआ कि दोनों आंदोलन तात्कालिक तौर पर सफल हुए और सत्ता के बदलाव में भी इनकी भूमिका रही. यही वजह है कि आज के समय में अन्ना आंदोलन को लोग संघ की साजिश बताते हैं. इनमें कांग्रेस और कांग्रेस प्रेमी तमाम बुद्धिजीवी और आंदोलन में शामिल रहे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण तक शामिल हैं.

2014 के बाद की बात करें, तो भूमि अधिग्रहण विधेयक का जोरदार विरोध हुआ. हालांकि, उसकी तुलना अन्ना आंदोलन या निर्भया कांड के समय के आंदोलन से नहीं की जा सकती, लेकिन फिर भी इस विरोध के परिणामस्वरुप सरकार को विधेयक वापस लेना पड़ा. उसके बाद से, दादरी कांड के बाद बुद्दिजीवियों के स्तर पर एक आंदोलन हुआ. जिसमें अवार्ड वापस किए गए और देश में असहिष्णुता का हवाला दिया गया. इसका कोई फायदा नहीं हुआ और नतीजा ये हुआ कि पूरे देश में बुद्धिजीवी शब्द की फजीहत हुई. इसके बाद कई स्तर पर ऐसे छोटे-छोटे आंदोलन हुए जब क्रांति का अपने चरम पर दिखी.

बीते साल CAA का कथित आंदोलन हुआ जिसके नाम पर हिंसा हुई और सड़कों को घेरकर बैठा गया. सड़कों को घेरकर बैठने को आंदोलन का नाम देने का ट्रेंड दरअसल वहीं से चला. शाहीन बाग के वो लोग जो सड़कों को घेरकर बैठे थे उन्हें महान क्रांतिकारी का दर्जा दिया गया.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप जब भारत आए, उस वक्त भी CAA का बवाल चलता रहा जिसका नतीजा भारी दंगे को तौर पर सामने आया. तमाम लोगों के घर जले, दुकानें जलीं और जानें भी गईं. इससे पहले भी यूपी में करीब 70 लोगों ने CAA प्रदर्शन के दौरान हिंसा में अपनी जान गंवाई. CAA वैसे का वैसा ही है. NRC की प्रक्रिया अगर होगी, तो एक बार इसके खिलाफ उबाल आने की संभावना है. इसके बाद अब किसान आंदोलन चल रहा है. सोशल मीडिया पर इंकलाब के नारे देखकर लगता है कि बस सरकार गिरने ही वाली है.

26 जनवरी की हिंसा को लेकर तमाम तर्क गढ़े जा चुके हैं. एक प्रतिष्ठित अतर्राष्ट्रीय अखबार ने 26 जनवरी की हिंसा के दौरान, एक कथित किसान की मौत को पुलिस की गोली से होने की बात साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. प्रोपगंडा अपने चरम पर है. ऐसा नहीं है कि ये एकतरफा है. अपने किसी भी तरह के विरोध को कुचलने के लिए, प्रोपगेंडा का सहारा सबसे पहले कोई भी सरकार लेती है. भारत में भी ये बात लागू होती है लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है.

सरकार किसान कानूनों में संशोधन को तैयार है. सरकार कानूनों को टालने के लिए तैयार है. फिर भी आप अड़े हुए हैं कि किसान कानून रद्द किए जाएं. दिल्ली के आस-पास तीन बॉर्डर जाम हैं. एक बार दिल्ली में घुसकर ड्रामा हो चुका है. फिर भी लोग मानने को तैयार नहीं हैं. दिल्ली के बॉर्डरों पर आज अंतर्राष्ट्रीय बॉर्डरों से सुरक्षा है. आस-पास के नौकरीपेशा लोग आज जो दिक्कत उठा रहे हैं, वो भी वही जानते हैं. ये वो लोग हैं जो अपनी गाड़ियों और ऑफिस की कैब में भर भरकर किसान नेताओं को गालियां दे रहे होंगे. हां ये बात सही है कि ये किसानों के ऊपर हमला करने नहीं जाएंगे क्योंकि इनमें अधिकतर मीडिल क्लास लोग होते हैं जो महीने के आखिर में आने वाली तनख्वाह से अपना घर चलाते हैं. उनके पास इतना टाइम नहीं होता कि वो कहीं जाकर दंगा फसाद करें. इसीलिए वो लोग गाली भी खाते हैं कि ये वर्ग तो बेकार है.

शाहीन बाग के कथित आंदोलन के समय मैं एक न्यूज चैनल में काम करता था. वहां एक सहयोगी दोपहर 3 से- रात 12 बजे तक की शिफ्ट में आते थे. 12.15 पर हमारी कैब ऑफिस से निकलती थी, और नोयडा से उनके घर जाने में 1 बजता था. उनका घर शाहीन बाग के पास था. उस तरफ रास्ता बंद था और वाहन नहीं जा सकते. मजबूरन रात के 1 बजे वो करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जाते थे. अगर किसी शख्स के साथ रात के अंधेरे में कोई वारदात होती, तो क्या इस तरह के आंदोलन का समर्थन करने वाले लोगों में से कोई भरपाई करने जाता? ऐसा नहीं है कि लोगों के साथ, वारदातें नहीं होंती, होती होंगी, लेकिन इन आंदोलनों के शोर में सुनता कौन है.

आंदोलन करिए, दिल्ली में रामलीला मैदान या किसी बड़े स्टेडियम में बैठकर. शांतिपूर्ण मार्च निकालिए. ये सड़कों पर अराजकता फैलाने का क्या मतलब है? और फिर लोग पूछते हैं कि आखिर मोदीराज में आंदोलन सफल क्यों नहीं होते. आंदोलन सफल होते हैं, अराजकता नहीं.