बिहार चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस नेतृत्व पर एक बार फिर से सवाल उठ रहे हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने भी पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं. बिहार में कांग्रेस की सहयोगी पार्टी आरजेडी के नेता शिवानंद तिवारी ने भी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की सक्रियता पर सवाल खड़े किए हैं. हालांकि तमाम पत्रकारों ने यह भी कहा कि RJD के तमाम नेता नहीं चाहते थे कि राहुल गांधी उनके प्रचार के लिए उनके क्षेत्र में जाएं क्योंकि इससे उनके वोट कट जाएंगे. दोनों ही सूरतें राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए बिल्कुल भी अच्छी नहीं हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की किताब में भी जिस तरह से लगातार राहुल गांधी को केंद्र में लिखकर बातें कहीं गईं हैं उनसे भी राहुल गांधी की छवि और भी ज्यादा खराब हो गई है. ओबामा की यह किताब तब सामने आई है जब राहुल गांधी को पसंद करने वाला भारत का बुद्धिजीवी वर्ग, अमेरिका में ओबामा की पार्टी के नेता जो बिडेन की जीत की खुशी मना रहे हैं. ओबामा ने जो टिप्पणियां की हैं वो राहुल गांधी के बारे में भारत में पहले से प्रचलित हैं लेकिन ओबामा की किताब से राहुल की उस छवि पर एक बड़ी मुहर लगी है. लगातार बड़ी असफलताएं और अजीबो-गरीब बयान राहुल गांधी की छवि और उनकी कार्यकुशलता पर सवाल खड़े कर चुकी हैं. जहां एक तरफ बीजेपी, पीएम मोदी और अमित शाह के सामने भी वर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा का लगातार सम्मान कर रही है और उन्हें बिहार में जीत का श्रेय दे रही है वहीं कांग्रेस आज भी अपने अंतर्द्वंदों और गांधी परिवार से आगे नहीं बढ़ पा रही.

कांग्रेस में सोनिया गांधी अभी अंतरिम अध्यक्ष हैं लेकिन उनका स्वास्थ्य और उम्र उनके साथ नहीं हैं. अघोषित रूप से राहुल गांधी ही पार्टी के सबसे बड़े नेता है. रैलियों में प्रचार के लिए वही जाते हैं. सबसे बड़े नेता के तौर पर उनका ही नाम लिया जाता है. कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि वो गांधी परिवार से आगे सोच नहीं पाए, नतीजा यह हुआ कि आज पार्टी के पास दूसरी पंक्ति के नेता जैसा कोई नेतृत्व नहीं है. पार्टी राहुल गांधी से छुटकारा पाने की कोशिश करे भी तो कहां जाएगी, सीधे शब्दों में कहें तो कांग्रेस भी विकल्पहीनता की शिकार है. अगर अभी पार्टी गांधी परिवार से अलग जाएगी तो बिखराव भी डर रहेगा.

कांग्रेस पार्टी में हालात लगातार बदतर होते जा रहे हैं. पार्टी को गांधी परिवार का विकल्प कौन के सवाल से आगे बढ़ने की ज़रूरत है. जो हालत है उसमें भी आगे पार्टी खत्म ही हो जाएगी. ऐसे में एक नेतृत्व को मौका देने की जरूरत है. जो पार्टी को एक नई रणनीति और सोच के हिसाब से आगे बढ़ाए. कांग्रेस को इस मामले में अपनी प्रतिद्वंदी बीजेपी से सीखने की जरूरत है. लालकृष्ण आडवाणी बीजेपी के संस्थापक सदस्य और पार्टी को खड़ा करने वालों में सबसे आगे थे लेकिन पार्टी ने उन्हें 2009 के बाद दोबारा मौका नहीं दिया. पार्टी को नरेंद्र मोदी के तौर पर एक बड़ा विकल्प दिखा. आज कांग्रेस को भी एक नए विकल्प की ज़रूरत है. इस बदलाव की शुरुआत गांधी परिवार को ही आगे बढ़कर करनी चाहिए. गांधी परिवार को समझना चाहिए कि राहुल गांधी की अभी की छवि के साथ पार्टी बहुत आगे नहीं जा सकती. खासतौर पर तब जब सामने मोदी-शाह जैसे शातिर राजनीतिज्ञों की चुनौती है.