देश में ग्रामीण बच्चों की शिक्षा के लिए बनाए गए जवाहर नवोदय विद्यालय गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं.इंडियन एक्सप्रेस अखबार की एक रिपोर्ट में ये बात सामने आई है.रिपोर्ट में किए गए सबसे बड़े खुलासे के बारे में अगर बात करें तो पता चलता है की बीते पांच साल में इन विद्यालयों में 49 बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं.इनमें से सात को छोड़कर सभी बच्चों ने फ़ांसी लगाकर आत्महत्या की. इसकी जानकारी भी साथ पढ़ने वाले बच्चों को या स्कूल स्टाफ के किसी सदस्य को सबसे पहले लगी.

अख़बार के मुताबिक नवोदय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की आत्महत्या के ये आंकड़े 2013 से 2017 के बीच के हैं. इन्हें सूचना के अधिकार के जरिए हासिल किया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक आत्महत्या करने वाले अधिकांश लड़के थे. सबसे ज़्यादा आत्महत्याएं दो महीने की गर्मी की छुटि्टयों के बाद स्कूल लौटने पर हुईं. यानी जुलाई, अगस्त और सितंबर में. इसके बाद परीक्षाओं के असपास जनवरी, फरवरी और मार्च के महीनों में आत्महत्या की घटनाएं हुईं.

अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक 2013 में 8 बच्चों ने, 2014 में 7, 2015 में 8, 2016 में 12 और 2017 में 14 बच्चों ने आत्महत्या की। नवोदय विद्यालय में आत्महत्या करने वाले 16 बच्चे अनुसूचित जाति के थे। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों की संख्या को मिलाकर यह आंकड़ा 25 हो जाता है। वहीं सामान्य और पिछड़ी जाति के 12-12 बच्चों ने मौत को गले लगाया है।

लखनऊ और भोपाल में बच्चों में आत्महत्या करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है.यहां बीते पांच साल में 10-10 बच्चों ने आत्महत्या की.इसके बाद हैदराबाद का नंबर है जहां 7 बच्चों ने आत्महत्या की.इन पांचों सालों में 2017 में सबसे ज्यादा 14 बच्चों ने आत्महत्या की.जबकि 2016 में 12 बच्चों ने आत्महत्या की थी.आत्महत्या करने वाले 49 बच्चों में से 43 बच्चे 9वीं,10वीं,11वीं, और 12वीं के थे.

आत्महत्या के कारणों में सबसे ज़्यादा तीन तरह के बताए जाते हैं. ये हैं- असफल प्रेम संबंध, पारिवारिक समस्याएं और स्कूल की ओर से मिली शारीरिक प्रताड़ना की सज़ा. इसके बाद शिक्षकों का अपमानजनक व्यवहार, पढ़ाई का दबाव, डिप्रेशन और दोस्तों के बीच झगड़े जैसे कारणों का नंबर आता है.

2016 में जब बच्चों के आत्महत्या करने के आंकड़ो ने पहली बार दहाई का आंकड़ा छुआ तो नवोदय प्रशासन ने एक सर्कुलर जारी किया और कैंपस में आत्महत्या के किसी केस पर संबधित नवोदय़ की जवाबदेही तय़ की गई.लेकिन सर्कुलर जारी होने के बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई और आत्महत्याओं को रोकने की सारी योजनाएं कागजी साबित हुईं.

आपको बता दें की ख़ासकर ग्रामीण एवं पिछड़े वर्गों के प्रतिभावान बच्चों की मदद के लिए 1985-86 में जवाहर नवोदय आवासीय विद्यालयों की स्थापना की गई थी. ये स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर रिजल्ट के लिए जाने जाते हैं.ये 2012 से लगातार 10 और 12वीं की सीबीएससी परीक्षाओं में 95 से 99 फ़ीसदी तक नतीज़े देते रहे हैं. देशभर में इस वक़्त 635 जवाहर नवोदय विद्यालय चल रहे हैं. इनमें 75 फ़ीसदी सीटें ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों के लिए आरक्षित होती हैं.