पंजाब के किसान बीते 23 दिल्ली और इसके बॉर्डर पर जुटे हुए हैं. भारी ठंड और कोरोना के बीच भी किसान आंदोलनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और लगातार अपनी मांगों को लेकर डंटे हुए हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान भी इस आंदोलन भी शामिल हैं. किसानों का कहना है कि जब तक उनकी सभी मांगे नहीं मानी जातीं, तब तक वो आंदोलन वापस नहीं लेंगे. इसी बीच किसान आंदोलन में शामिल करीब 20 लोगों की मौत हो चुकी है, इनमें अधिकतर उम्रदराज किसान शामिल हैं. किसानों का कहना है कि ये किसान शहीद हुए हैं.

किसान आंदोलन के बाद से सरकार और उसके समर्थकों का रूख अलग-अलग है. सरकार जहां लगातार किसानों से बातचीत करने और इस आंदोलन को गैर-राजनीतिक बता रही है, वहीं सरकार के समर्थक इसे लगातार खालिस्तान समर्थित आंदोलन बताते रहे हैं. इसके अलावा, भी कई ऐसी तस्वीरें वायरल होती रही हैं जिनसे किसान आंदोलन भी सवाल खड़े होते रहे हैं. एक तरफ जहां सरकार किसान आंदोलन को लेकर गंभीरता दिखाने की कोशिश कर रही हैं, वहीं पीएम मोदी नए कृषि कानूनों की लगातार तारीफ करते जा रहे हैं. हालांकि, सरकार के मंत्री कानूनों में संशोधन की बात भी करते रहे हैं.

किसानों से जुड़ा यह पहला मुद्दा नहीं है जब सरकार कठघरे में खड़ी है. इससे पहले भी मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर सरकार पर सवाल खड़े हुए थे और सरकार को यह विधेयक वापस भी लेना पड़ा था. लेकिन आखिर इस बार ऐसा क्या है कि सरकार भी अपने रूख पर कायम है और किसानों के विरोध के बावजूद कानूनों पर कायम है?

दरअसल आंदोलन के लगभग 23 दिन बीतने के बावजूद, अभी तक यह संदेश नहीं गया है कि यह देशव्यापी आंदोलन है और सारे देश के किसानों का इसे समर्थन हासिल है. यह आंदोलन अभी तक मोटे तौर पर पंजाब और के कुछ किसानों का ही आंदोलन बना हुआ है. सोशल मीडिया पर इसे ज़रूर देश के तमाम क्षेत्रों से जुड़ें लोगों का समर्थन हासिल हो रहा है लेकिन देश के बाकी हिस्सों में इसे लेकर ज्यादा उत्साह नहीं दिखता. पश्चिमी उत्तर प्रदेश को छोड़ दें तो बाकि यूपी में किसान आंदोलन का कोई असर नहीं दिखता. 8 दिसंबर का भारत बंद भी इस मामले में फेल रहा. दरअसल किसानों को मिलने वाले रूपयों की किस्त और कृषि कानूनों के बारे में जानकारी न होना इसका एक बड़ा कारण हो सकता है.

राजनीतिक तौर पर देखें तो यूपी में विपक्षी पार्टियों में सिर्फ सपा ही इसे लेकर थोड़ी आंदोलन की स्थिति में दिखी. हालांकि, विरोध प्रदर्शन रस्म अदायगी भर नजर आए. बाकी पार्टियों में बीएसपी और कांग्रेस दोनों ही ठंडे नजर आए. बिहार में भी ऐसी ही स्थिति है. हालांकि वहां नई कृषि व्यवस्था पहले से लागू है. ऐसे में जनता का खुद विरोध के लिए उतरना अपने-आप में एक बड़ी बात होती. दक्षिण भारत या बाकी राज्यों में आंदोलन की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही.

2022 में यूपी और पंजाब में विधानसभा चुनाव होना है. इसके अलावा हरियाणा में बीजेपी की सरकार दांव पर है. यूपी में किसान आंदोलन का कोई खास असर दिखाई नहीं दे रहा. ऐसे में राजनीतिक तौर पर बेहद ज़रूरी इस राज्य को लेकर बीजेपी ज्यादा चिंतित नहीं है. दूसरी तरफ पंजाब में पार्टी अकाली दल के साथ चुनाव लड़ती रही है जो गठबंधन अब टूट चुका है. ऐसे में पार्टी अकेले ही चुनाव लड़ने उतरेगी. पार्टी को शायद पंजाब के चुनाव नतीजों की उतनी चिंता नहीं हैं, वहीं हरियाणा में फिलहाल जेजेपी के साथ गठबंधन वाली सरकार पर संकट ज़रूर है. हालांकि, बीजेपी के साम-दाम-दंड-भेद के आगे, दुष्यंत चौटाला गठबंधन तोड़ें यह थोड़ा मुश्किल है.

इन तमाम तथ्यों के बाद लगता है कि सरकार, आंदोलन से होने वाले चुनावी नुकसान का आकलन कर चुकी है और शायद इसीलिए पीएम मोदी कृषि कानूनों पर अडिग नज़र आ रहे हैं. हालांकि, सरकार अपनी छवि बिल्कुल भी किसान विरोधी नहीं बनाना चाहती है, शायद इसीलिए पार्टी थोड़ी संजीदा टिप्पणियां कर रही है. वैसे भी आंदोलन पर होने वाली शुरुआती कार्रवाई सरकार की छवि को पहले ही नुकसान पहुंचा चुकी है.