नागरिकता संशोधन बिल के पास होने के बाद से देश में काफी प्रदर्शन हो रहे हैं. बिल को लेकर सरकार पर आरोप है कि वो मुसलमानों के साथ भेदभाव कर रही है. मुस्लिमों में यह डर भी फैलाया जा रहा है कि उन्हें जल्द ही अपनी नागरिकता से जुड़े दस्तावेज पेश करने का आदेश भी दिया जा सकता है. इसी बीच मुस्लिमों का कहना कि तमाम जरूरी मुद्दें हैं जिनका हल होना जरूरी है और सरकार इनसे ध्यान हटाने के लिए ऐसे कदम उठा रही है. 2019 के मोदी युग का मुसलमान 2014 के पहले मुसलमान से कितना अलग है, इस पर एक नजर डालते हैं.

आज हम मुस्लिमों की सियासत की बात करने जा रहे हैं. मुस्लिमों की सियासत इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इस समुदाय के लोगों की अपनी एक अलग ही सियासत है. जो राजनीतिक दल इनकी सियासत करते हैं वो अलग हैं लेकिन ये अपने आप में एक पार्टी हैं. इनके बारे में कहा जाता है कि ये एकतरफा वोट करते हैं. ये अल्पसंख्यक कहे जाते हैं लेकिन इनकी एकता की वजह से ये राजनीतिक रूप से बड़े मजबूत हैं औऱ यही वजह है कि राजनीतिक दलों में इनके वोट खींचने के लिए होड़ मची रहती है. आज 2019 के वक्त में एक मुस्लिम की तमाम शिकायतें हैं. वो बेरोजगारी पर सवाल उठा रहा है. वो महंगाई पर सवाल उठा रहा है. वो लोकतंत्र पर सवाल उठा रहा है. आज के युग में मुसलमान गंगा जमुनी तहजीब की भी दुहाई दे रहा है. बेशक मुसलमान या किसी भी कौम का ये सवाल उठाना बिल्कुल सही है और हक भी है लेकिन मुसलमानों के लिए ये मुद्दे 2014 के बाद से ही सामने आए हैं.

आप को थोड़ा थोड़ा पीछे ले जाएंगे और एक कौम की पूरी सियासत आपके सामने पेश करेंगे. 2014 चुनाव के ठीक पहले संसद में कांग्रेस सांप्रदायिकता विरोधी बिल लाती है. इस बिल में तमाम ऐसे प्रावधान थे जिनके जरिए दंगा होने पर उस क्षेत्र के बहुसंख्यकों को दंगों का जिम्मेदार बनाया जा सकता. कांग्रेस जानती थी कि ये बिल पास नहीं होने वाला. फिर भी वो चुनाव में मुसलमानों को रिझाने के लिए यह बिल लेकर आई. आज गंगा-जमुनी तहजीब की दुहाई देने वाली कौम ने उस वक्त इस बिल का विरोध नहीं किया. उन्होंने बिल्कुल नहीं कहा कि हमारे हिंदू भाईयों के साथ भेदभाव वाला बिल नहीं आना चाहिए. कांग्रेस की इसी तरह की हरकतों ने उसकी हिंदूविरोधी छवि बनाई, जिससे निकलने के लिए वो आज भी छटपटा रही है. खास बात देखिए भ्रष्टाचार और अर्थव्यवस्था पर कांग्रेस सरकार घिरी थी लेकिन मुस्लिमों ने उस वक्त सरकार का कोई विरोध नहीं किया.

2009 के चुनाव में यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम मौलाना बुखारी से मिलीं. बुखारी साहब ने पूरे देश के मुस्लिमों से कांग्रेस को धर्म के नाम पर वोट डालने की अपील कर डाली. चुनाव हुआ और कांग्रेस जीती भी लेकिन देश के मुस्लिमों ने इस सांप्रदायिक राजनीति का विरोध नहीं किया. उस वक्त वो राजनीति के शिखर पर सवार होकर मस्त सफर कर रहे थे. कहना बुरा लगता है लेकिन मुसलमानों को पंचर जोड़ने वाले कहकर उनका मजाक उड़ाया जाता है. कहा जाता है कि इनकी कौम में पढ़े लिखे लोग कम हैं. मुस्लिम महिलाएं आज भी बुर्के में रहती हैं, उनकी पढ़ाई और नौकरियां कभी प्राथमिकता नहीं रहीं. तीन तलाक का तो मुद्दा ही अलग है. जनसंख्या पर इन्होंने कोई नियंत्रण नहीं रखा और शायद अभी जनसंख्या नियंत्रण पर कोई कानून आए तो उसे ये मुस्लिम विरोधी भी बता दें.

जिस कौम की राजनीतिक ताकत इतनी रही हो और उसका मजाक पंचर जोड़ने वालों कहकर उड़ाया जाए तो कितना दुर्भाग्यपूर्ण है. भारत के मुसलमानों ने जो सवाल बेरोजगारी, युवाओं और महंगाई पर 2014 के बाद सवाल पूछना शुरू किया है, अगर ये पहले किया होता तो आज मुस्लिमों की सामाजिक और आर्थिक हालत में फर्क होता. इन्हें डरा धमकाकर वोट लिए जाते रहे और ये खुश रहे. 2012 से 2017 के बीच यूपी में अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा की सरकार रही. इस दौरान कब्रिस्तान की जमीनों से जुड़े हुए बहुत विवाद हुए. अखबारों में रोज खबरें आती थीं. रोज मारपीट होती थीं लेकिन मुस्लिम कौम के लोग सत्ता के नशे में चूर थे. उन्होंने अखिलेश से नहीं पूछा कि नौकरियां कहां हैं, क्योंकि तब वो कब्रिस्तानों की जमीनें बढ़ाने में व्यस्त थे.

भारत के हिंदुओं को मुसलमानों से सीख लेनी चाहिए. उन्हें हर सरकार से अर्थव्यवस्था, नौकरियों और मंहगाई पर सवाल पूछने चाहिए. मोदी जी भले ही 370 हटा दें , नागरिकता बिल ले आएं, पाकिस्तान को जवाब दें लेकिन नौकरियां, महंगाई ये भी हमारे मुद्दे हैं. हमें इन पर भी सवाल पूछने होंगे वर्ना हम मुस्लिमों की तरह महज वोट बैंक बनकर रह जाएंगे. बाकी उन्हें वाकई मुस्लिमों के साथ प्रेम से रहना चाहिए. मोदी जी के इस युग में आखिर मुस्लिम जब गंगा-जमुनी तहजीब की बात कर रहे हैं तो उन्हें निराश नहीं करना चाहिए. क्या पता कल को सरकार बदल जाए और गंगा-जमुनी तहजीब की बातें अतीत का हिस्सा बनकर रह जाएं.