जाति व्यवस्था के कारण होते भेदभाव से त्रस्त होकर हिंदू परंपरा को त्याग ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी दलित ईसाइयो के समाजिक जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया है । बल्कि उनके हिंदू रहने के दौरान प्राय: जिस तरह की सामाजिक स्थिति देखने को मिलती थी ईसाई बन जाने के बाद उनकी स्थिति बद से बदतर होती चली गई ।

जातिगत भेदभाव और शोषण से राहत देने के नाम पर ईसाई मिशनरियो द्वारा पैसों और अच्छे रहन-सहन का लालच दिखा लाखो दलितों का बड़े पैमाने पर धर्मांतरण करवाया । लेकिन यही धर्मांतरण अब उनके लिए परेशानी का सबब बन गया

देश की ईसाई आबादी में 70% से अधिक आबादी उन दलितों की है जो धर्मांतरण करने के बाद ईसाई बन चुके हैं लेकिन यह भी एक सत्य है कि आबादी के अनुसार भारतीय चर्चो में उनका प्रतिनिधित्व आज भी नाम मात्र का है

एक आंकड़े के मुताबिक भारत में लगभग 500 से अधिक चर्च हैं जिनको किसी भी तरह का धार्मिक सामाजिक निर्देश शीर्ष चर्चो से ही आता है ।

आपको जानकर शायद हैरानी होगी कि दलित समुदाय से आने वाले पादरियो की संख्या मात्र 4-5% तक ही सिमटकर रह गई है । वही भारत सरकार के बाद देश मे सर्वाधिक भूमि चर्चो के पास है कैथोलिक ईसाइयो के 6 कार्डिनलो मे कोई दलित नही है 175 विशपो मे से केवल 9 विशप ही दलित समुदाय से आते है 25 हजार पादरियो मे 1100 के लगभग पादरी दलित है ।

ईसाइयो धर्म मे भी भेदभाव होता है ।

भारतीय कैथोलिक चर्च दलित ईसाइयों को तुच्छ नजर से देखते हैं एवं हर जगह कैथोलिक ईसाइयों के लिए प्रवेश द्वार खुले रहते हैं जो उनकी नजर में उच्च वर्ग प्रतीत होते हैं कुछ दशकों पूर्व हजारों की संख्या में जिन दलितों ने धर्मांतरण कर ईसाई धर्म अपना लिया था अब वह अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं ।
दलित ईसाइयों को कैथोलिक चर्चो मे प्रवेश नही करने दिया जाता है उनके साथ शादी जैसे महत्वपूर्ण सम्बंध भी नही किये जाते है और तौ ओर ग्रामींण अंचल मे मौजूद चर्चो मे कोई ईसाई पादरी किसी तरह की प्रार्थना मे हिस्सा लेना तो दूर की बात प्रवेश भी नहीं करते हैं ।

दलितो के लिये अलग चर्च और कब्रिस्तान ।

ऐसा भी नही है की सिर्फ छोटे स्तर पर ही दलितो के साथ निम्न दर्जे का घटिया व्यवहार किया जाता है बल्कि यह बड़े पैमाने पर फैला हुआ जाल है देश की अनेक दलित बस्ती जहाँ कैथोलिक ईसाइयो का भी निवास होता है उस जगह दलित ईसाइयो के लिये अलग चर्च और कब्रिस्तान मुख्यतः दिखाई देते है । इसके इतर हिन्दूओ मे सभी के लिये एक ही विश्रामघाट होता है ।

विगत वर्ष पहले दलित ईसाइयो के एक प्रतिनिधिमंडल ने UN स्थित वान की मून को अपने साथ हो रहे जातीय अत्याचार को लेकर एक ज्ञापन भी दिया था और कहा गया था की कैथोलिक चर्च और वेटिकन उनका शोषण कर रहे है एवं चर्च के धार्मिक कार्यक्रमो मे भी उनके साथ बहुत घटिया व्यवहार किया जाता है जबकी हाल ही मे दलित इसाईयो के साथ हो रहे व्यवहार पर भारत के प्रभावशाली कैथोलिक चर्च ने आपराधिक तौर पर स्वीकार किया की दलित ईसाइयो को भी भेदभाव और छुआ-छूत का सामना करना पड़ता है ।

लेकिन समस्या अभी तक जस की तस बनी हुई है दलित ईसाइयो की उदासीनता को समझने के बाद वेटिकन ईसाइयो और मिशनरियो क हौंसला बुलंद हो गया है उन्हे इन दलितो की कोई फिक्र नही है सिर्फ धर्म परिवर्तन कराना ही उनका मुख्य काम रह गया है ।

Facebook:- ( राकेश पाल ) @hindivoice