बीते दिनों गृहमंत्री अमित शाह ने नागरिकता संशोधन बिल पेश करते वक्त संसद में एक बयान दिया. उन्होंने कहा, "भारत का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था और अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो आज ये बिल लाने की जरूरत नहीं पड़ती." अमित शाह के इस बयान के बाद काफी चर्चा शुरु हुई. अमित शाह ने कांग्रेस पर ही धर्म के आधार पर बंटवारे का आरोप लगाया. उनके इस बयान के भी फैक्ट चेक होना चालू हो गए. तमाम तरह के तथ्य और तर्क सामने लाए गए. कांग्रेस और तमाम वामपंथियों ने वीर सावरकर को भी लपेट दिया.

अमित शाह के बयान और उसमें सावरकर को खींचना कितना जायज है.आज हम इसी घटनाक्रम के बारे में बात करेंगे.

देश की आजादी के वक्त हम सभी जानते हैं कि हिंदू-मुस्लिम के दंगे हुए. जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने एक अलग देश की मांग की. आखिरकार इस देश के बंटवारे पर सहमति बनी. भारत के इस बंटवारे के पीछे इतिहास में जिन्ना-नेहरु की व्यक्तिगत महात्वकांक्षाओं का भी जिक्र है. माना जाता है कि दोनों आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बनना चाहते थे औऱ दोनों की अपनी अपनी नीतियां आजाद भारत को लेकर थीं. जिन्ना के पास मुस्लिमों का भड़काने का हथियार था और उन्होंने वो किया भी. इसके नतीजे में ही गांधीजी को विभाजन के लिए मंजूरी देनी पड़ी. भारत के विभाजन के इस पूरे खेल में हमें कांग्रेस नजर आती है, जिन्ना और मुस्लिम लीग नजर आते हैं और महात्मा गांधी नजर आते हैं. बेशक सावरकर को अगर आप बीच में खींचना चाहते हैं तो उन्हें लाया जा सकता है लेकिन वो निर्णायक भूमिका में कहीं से भी नजर नहीं आते. विभाजन से पहले और उस वक्त में तमाम लोगों की अपनी एक राय होगी लेकिन उनमें से हर कोई विभाजन के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता. सावरकर की भी एक राय हो सकती है लेकिन वो विभाजन के वक्त ऐसी स्थिति में ही नहीं थे जो भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार हो सकते.

विडंबना देखिए जिस सावरकर को भारत के बंटवारे के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है , उस शख्स को इतिहास में अंग्रेजों का दलाल कहा गया है. उसके बारे में लिखा गया है कि उसने अंग्रेजों से माफी मांग ली. अगर वाकई सावरकर जिम्मेदार थे तो क्या उनके लिए इतिहास में ये बातें लिखी जा सकती थीं क्योंकि भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार व्यक्ति कमजोर शख्सियत तो नहीं होगी. वो शख्स अपने खिलाफ इस तरह की बातों का प्रसार ही नहीं होने देता. ऐसे में गृहमंत्री अमित शाह के बयान पर बेवजह हंगामा करना और सावरकर को भारत के विभाजन के लिए जिम्मेदार बताना इतिहास से खिलवाड़ का अलग ही मामला है. कांग्रेस तो राजनीतिक पार्टी है लेकिन कथित बुद्धिजीवी समाज का ऐसा करना शोभा नहीं देता.