लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद विपक्षी दलों में तनाव है. कांग्रेस में हार पर बड़ा मंथन हो रहा है. हार की जिम्मेदारी लेने की बात कही जा रही है. एसपी में भी बैठक में तनाव के हालात दिखे. इसी तरह बिहार में RJD के भीतर भी बगावत के सुर उठ रहे हैं ये देखना अलग बात होगी कि ये किस मुकाम तक पहुंच पाते हैं. हालांकि बीसएपी में ऐसे कोई हालात नजर नहीं आते लेकिन जाहिर सी बात है चिंता तो होगी ही. आखिर क्या वजह रहीं जो यूपी में इतना बड़ा गठबंधन बनाने के बाद भी एसपी बीएसपी चुनाव हार गए. जातिगत समीकरणों के आधार पर देखें तो यादव, दलित और मुस्लिम औैर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोटरों का गणित भी महागठबंधन में शामिल था. इस समीकरणों के बावजूद महागठबंधन क्यों हारा ये कारण आज हम आपको बताने जा रहे हैं.

महागठबंधन ने जातिगत और धार्मिक समीकरण तो साधे लेकिन बीएसपी और एसपी के संगठन कमजोर थे. अगर बीएसपी की बात करें तो लगातार चुनावों में बड़ी हार से इनके तमाम नेता और कार्यकर्ता दूसरी पार्टियों में जा चुके हैं. एसपी से गठबंधन होने के बाद टिक़ट की आस लगाए तमाम नेता कांग्रेस में शामिल हो गए कुछ बीजेपी में भी चले गए. फिलहाल बीएसपी यूपी की सत्ता में कहीं नहीं दिखती और कार्यकर्ता केंद्र से ज्यादा राज्य सरकार की फिक्र करता है. दूसरी तरफ मायावती की बात करें तो खुद उनका कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद नहीं है. बीते समय में कई बड़े नेताओं ने भी पार्टी छोड़ दी जो जमीन पर मजबूत पकड़ रखते थे. ऐसे में बीएसपी के पास उन लोगों की कमी थी जो पार्टी का संदेश जनता तक पहुंचा सकें या जो पार्टी के वोटर को बूथ तक ला सकें. ऐसे में पार्टी के वोटर के ऊपर खुद था कि वो जाकर बीएसपी या महागठबंधन के लिए वोट करे.

दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी की बात करें तो शिवपाल यादव का संगठन में मजबूती में हाथ था. ये अलग बात है कि शिवपाल के साथ तमाम ऐसे लोग जुड़े हुए थे जो आपराधिक प्रवृति के थे लेकिन इन लोगों से ही शिवपाल ने पार्टी बनाई थी. मुलायम चेहरा थे तो शिवपाल एसपी के दिमाग थे. अखिलेश ने एक तरह से जबरदस्ती मुलायम की विदाई कर दी. मुलामय की भूमिका एसपी में बस एक लोकसभा सीट बचाने की दिखती है. स्टार प्रचारकों की सूची तक में पहले उनका नाम शामिल नहीं किया गया. शिवपाल के निकलने के साथ साथ तमाम लोगों ने पार्टी छोड़ दी. ये लोग या तो शिवपाल की अपनी पार्टी में शामिल हुए या बीजेपी में चले गए. इस बीच अखिलेश ने संगठन को बनाने को लेकर कोई काम नहीं किया. कई जिलों में औपचारिकता के लिए पार्टी अध्यक्ष बनाए गए. ऐसे में एसपी की हालत भी संगठन के तौर पर कमजोर थी.

जब आप गठबंधन कर के चुनाव लड़ रहे हैं और आपका गणित वोटों के ट्रांसफर पर निर्भर करता है तो ये जरूरी है कि आपके संगठन मजबूत हों. खासकर जब दोनों पार्टियों के वोटरों के बीच ही पार्टी आधारित खाई रही हो. संगठन की कमजोरी की वजह से दोनों पार्टियों के वोटरों में बिखराव हुआ. उनके बीच कोई ऐसा संदेश नहीं पहुंचा जो सत्ता बदलने वाला हो. महागठबंधन की हार में संगठन का कमजोर होना एक बड़ी वजह है.

यूपी में विजन की कमी होना भी महागठबंधन की नाकामी का एक कारण है. बस एक ये मुद्दा कि मोदी को हटाना है लोगों के दिल में नहीं उतर सका. ऐसा तब हो सकता था जब सत्ता के खिलाफ लहर हो. ऐसे में आप निगेटिव कैंपेन के जरिए भी जीत सकते थे. एसपी बीएसपी ने अपना कोई विजन पेश नहीं किया. एक जो हल्का विजन पेश किया वो ये था कि मायावती को पीएम बनाना है लेकिन जनता के लिए क्या करेंगे ये महागठबंधन ने किसी को बताया ही नहीं. 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में ये बात साफ हो गई थी कि एसपी बीएसपी का वोटर बिखर चुका है. ऐसे में जब आपका अपना ही वोटर बिखरा हो तो आप जीतने के लिए दोहरी कोशिश करते हैं लेकिन ऐसा लगा कि गठबंधन करके जातिगत समीकरणों के नाम पर गठबंधन सुस्त हो गया और अपने समीकरणों पर जीतने का भरोसा छोड़ दिया. नतीजा ये हुआ कि मुलायम परिवार के ही कई सदस्य चुनाव हार गए.

अखिलेश यादव और मायावती के पास अभी यूपी में चुनाव के लिए 3 साल हैं. अगर गठबंधन चुनाव तक चलने भी वाला है तो भी दोनों को अपनी पार्टियों को ही मजबूत करना होगा. यूपी में यादवों की आबादी 9 फीसदी है. विधानसभा चुनाव में शिवपाल की पार्टी भी अब के मुकाबले मजबूत होगी. उन्हें वो उम्मीदवार आसानी से मिल जाएंगे जो दोनों पार्टियों के गठबंधन को नुकसान पहुंचा दें. जो भूमिका लोकसभा में कांग्रेस ने अदा की वो विधानसभा में शिवपाल कर सकते हैं. ऐसे में बीएसपी और एसपी को अपनी कमजोरियों पर ध्यान देने की जरूरत है.