दूसरे चरण में यूपी की जिन सीटों पर मतदान होना उनमें ताजनगर आगरा भी एक है.आगरा यूपी की सुरक्षित 17 लोकसभा सीटों में से एक है. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के प्रमुख रामशंकर कठेरिया यहां से सांसद हैं.हालांकि बीजेपी ने उनका ट्रांसफर कर दिया है.उन्हें इटावा लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया गया है.आगरा में पार्टी के उम्मीदवार अब यूपी सरकार में मंत्री एसपी बघेल हैं.बघेल पिछली बार फिरोजाबाद लोकसभा सीट से चुनाव लड़े थे और यादव परिवार का गढ़ होने के बावजूद अच्छे वोट हासिल किए थे.

आगरा लोकसभा सीट के इतिहास के बारे में बात करें तो 1952 से लेकर 1984 तक के चुनावों में यहां कांग्रेस महज एक बार हारी.दो बार इस सीट पर जनता दल का कब्जा रहा है.5 बार बीजेपी ने इस सीट पर कब्जा किया है.दो बार समाजवादी पार्टी ने भी इस सीट पर चुनाव जीता है.1999 और 2004 में यहां सपा के राजबब्बर ने चुनाव जीता था.बीते दो चुनावों यानि 2009 और 2014 में यहां बीजेपी के रामशंकर कठेरिया ने जीत हासिल की थी.कहा जाता है कि रामशंकर कठेरिया ने आगरा में स्टेडियम और एयरपोर्ट जैसे वादे किए थे जो पूरे नहीं हुए.ऐसे में जनता की नाराजगी भांपकर बीजेपी ने उनका क्षेत्र बदल दिया है.2017 में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां विधानसभा की 5 सीटें जीती थीं.

ताजनगरी को जीतने की इस जंग में बीजेपी के अलावा बीएसपी और कांग्रेस ने जोर लगा रखा है.बीएसपी ने यहां से मनोज सोनी को मैदान में उतारा है.मनोज सोनी बीते चुनाव में हाथरस लोकसभा सी़ट से उतरे थे.हाथरस में वो मोदी लहर में भी अच्छे वोट हासिल करने में कामयाब रहे थे.कांग्रेस ने पूर्व आईएस प्रीता हरित पर ताजनगरी जीतने के लिए भरोसा जताया है.कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उनके लिए आगरा में एक रोड शो भी किया था.खास बात ये है कि अब तक हुए चुनावों में एक बार भी आगरा से महिला सांसद संसद नहीं पहुंच पाई है.अगर प्रीता हरित जीततीं हैं तो क्षेत्र से संसद जाने वाली वो पहली महिला सांसद होंगी.

आगरा लोकसभा सीट पर 37 फीसदी आबादी मुस्लिम और दलित है.बीते चुनाव में यहां रामशंकर कठेरिया को 54 फीसदी वोट मिले थे.दूसरे नंबर पर बीएसपी प्रत्याशी नारायण सिंह सुमन के 26 फीसदी वोट हासिल हुए थे,जबकि एसपी उम्मीदवार महाराज सिंह ढांगर को 12.6 फीसदी वोट मिले थे.एससी-एसटी एक्ट में बदलाव को लेकर यहां बीजेपी का खासा विरोध हुआ था.इसके अलावा आगरा में आलू किसानों की नाराजगी भी बीजेपी को यहां भारी पड़ सकती है.दूसरी तरफ महागठबंधन के प्रत्याशी को ये उम्मीद होगी कि दलित-मुस्लिम गठजोड़ से वो चुनाव जीतने में कामयाब रहेंगे लेकिन कांग्रेस ने उनकी राह मुश्किल की है.जिस तरह से कांग्रेस ने यहां एग्रेसिव चुनाव प्रचार किया है उससे महागठबंधन की उम्मीदें यहां कमजोर पड़ेंगी.

जहां जहां दलित-मुस्लिम बहुल क्षेत्र है बीजेपी का चुनाव दो रणनीतियों पर टिका होता है.पहली उम्मीद कि दलित-मुस्लिम वोट बंट जाए.सुरक्षित सीट और सभी दलों से दलित प्रत्याशी होने के चलते ऐसा हो भी सकता है.दूसरी उम्मीद रणनीति ये होती है कि इन दोनों के अलावा जो वोट हैं उन्हें अपने पक्ष में एक किया जाए.आगरा में अगर बीजेपी अपने पक्ष के वोटर को बूथ तक ला सकी तो वो ताजनगरी पर दोबारा राज कर पाएगी.अगर ऐसा नहीं हुआ तो बीजेपी को निश्चित ही यहां से निकलना पड़ेगा.