जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म होने पर अलग अलग चर्चाएं हो रही हैं. बहुत से लोग और नेताओं ने पार्टी और विचारधारा से ऊपर उठकर 370 को खत्म करने का समर्थन किया है वहीं कई लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं. अनुच्छेद 370 बीजेपी के एजेंडे में हमेशा से ही ऊपर रहा है. बीजेपी ने जिन मुद्दों को हमेशा चुनाव में वरीयता पर रखा उनमें अनुच्छेद 370 एक था. जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का सपना था कि अनुच्छेद 370 को हटाया जाए और इसके लिए उन्होंने अपनी जान भी दी.

जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन से जुड़ा बिल भी संसद से संसद से पास हो गया. अब जम्मू कश्मीर और लद्दाख दो केंद्र शासित प्रदेश हैं. जम्मू कश्मीर में बस अपनी विधानसभा होगी जबकि लद्दाख पूरी तरह से केंद्र शासित प्रदेश होगा. जम्मू कश्मीर में इस समय बड़ी संख्या में सुरक्षाबल तैनात हैं. हर तरह का नेटवर्क बंद है. कई नेता हिरासत में हैं या नजरबंद हैं. इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. लोग सरकार से जम्मू कश्मीर को लेकर कई सवाल पूछ रहे हैं. हालांकि बहुत से लोग सीधे तरीके से ये नहीं कह पा रहे कि 370 हटाना गलत है लेकिन वो इसके लिए घुमाकर अलग अलग सवाल खड़े कर रहे हैं. इन लोगों के सवालों का जवाब हम देने की कोशिश कर रहे हैं. आप लोग पढ़िए और तर्क की कसौटी पर देखिए कौन सही है और कौन गलत है ?

1. कश्मीर के लोगों को विश्नास में नहीं लिया- कश्मीर भारत का हिस्सा है. यहां चुनाव होते हैं. लोग अपने प्रतिनिधि चुनते रहे. सरकारें बनती रहीं. पंचायत से लेकर हर स्तर पर चुनाव हुए. भ्रष्टाचार पूरे देश की समस्या है लेकिन सरकार ने कभी जम्मू कश्मीर के साथ भेदभाव नहीं किया. वहां केंद्र सरकार ने हमेशा आर्थिक मदद की चाहें वो किसी भी दल की हो. यहां तक कि मोदी सरकार में भी आर्थिक मदद दी गई. पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी का कश्मीरियत का नारा खूब ही चर्चा में रहा. आज जब 370 हटाया गया तो लोगों को उनकी याद भी खूब आई. सवाल ये उठता है कि अटल बिहारी वाजपेयी को कश्मीरियत के नारे के बदले क्या हासिल हुआ. ऐसा तो नहीं हुआ कि कश्मीर में शांति हो गई. बीजेपी ने पीडीपी के साथ अपनी विचारधारा से समझौता करके सरकार भी चलाई. यही सोचकर कि जम्मू कश्मीर में शांति होगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कश्मीर घाटी में लोग आतंक की तरफ जाते रहे और पिछले कुछ सालों में अंधाधुंध पत्थरबाजी भी हुई.

दिल्ली की जेएनयू यूनिवर्सिटी में कश्मीर की आजादी के नाम पर अफजल गुरू और मकबूल बट के समर्थन में नारे लगे. भारत तेरे टुकड़े होंगे के लिए भी नारेबाजी हुई. कश्मीर में तो ये नारे आम बात थी. अब सवाल ये उठता है कि विशेष दर्जे से लेकर पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बावजूद जब कश्मीर नहीं सुधरा तो कैसे सुधरेगा ? क्या कदम उठाए जाते. तमाम लोग कहते हैं कि जनमत संग्रह होना चाहिए. ये लोग कश्मीर की सामरिक अहमियत को नकारते हैं. ये कश्मीर की वजह से पूरे देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का जोखिम लेना चाहते हैं. ऐसे में जरूरी था कि कुछ अलग कदम उठाया जाए. कब तक एक ढर्रे पर चला जाएगा जिससे कोई हल नहीं निकलना है. रही बात कश्मीर के लोगों को विश्नास में लेने की तो इतने दिनों से मोहब्बत के बाद जो लोग विश्नास में नहीं आए वो यूहीं कहने से नहीं मानते. जरूरी है कि उनके लिए कुछ कदम उठाए जाएं और उन्हें नए सिस्टम में रहने को कहा जाए. हो सकता है कि ये नए नियम उन्हें भी पसंद आएं और कश्मीर में शांति हो जाए.

2. अभी सुरक्षाबल हैं जब वो हटेंगे तब अशांति होगी - ऐसे सवाल करने वाले लोगों की मानसिकता दरअसल बेहद खराब है. दरअसल वो अंदर ही अंदर दुआ भी कर रहे हैं कि कश्मीर में ऐसा ही हो. हो सकता है कि उनकी बात सही निकले लेकिन फिर वही बात आ जाती है. कश्मीर में अशांति तो तब भी होती थी जब 370 था. अब सुरक्षाबल हटने के बाद हो जाएगी तो कौन सी नई बात है. दरअसल यहां पर कश्मीर के लोगों को ही अपना भविष्य तय करना है. वो शांति से रहना चाहते हैं या फिर वही पत्थरबाजी की राह से. उन्हें एक नई व्यवस्था दी गई है. लोगों को इस व्यवस्था को समझना चाहिए वो हित में है या नहीं उस पर विचार करना चाहिए लेकिन हिंसा और आतंकवादी घटनाओं में भाग लेना हल नहीं है. जो लोग कश्मीर में शांति नहीं चाहते उनके लिए ये बेहद अच्छा होगा लेकिन ये खुद कश्मीरियों के लिए बेहद घातक है. एक सरकार आपको अधिकार दे रही है. आपको सुविधाएं दे रही है और आप बेवजह आजादी की मांग कर रहे हैं वो भी एक ऐसे देश के भड़काने पर जो खुद बर्बाद है. भारत के हर हिस्से की अपनी समस्याएं हैं. हम सभी को अपनी सरकारों से शिकायतें हैं लेकिन हर कोई आजादी की मांग तो नहीं करता. हम जानते हैं कि समस्याएं हैं लेकिन इनका हल भी इसी देश में होना है और कोई न कोई सरकार समस्याओं का हल भी करेगी. ऐसे में कश्मीरियों को भी इस्लामिक कट्टरता से अलग होकर सोचने की जरूरत है. उन्हें भारत जैसे सेकुलर देश में रहने का मौका मिल रहा है और उन्हें इसे गंवाना नहीं चाहिए.

3. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि प्रभावित होगी- भारत ने बीते कुछ समय में भी अपनी विदेश नीति को मजबूत किया है. तमाम देशों से संबंध सुधारे हैं. यही वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की स्वीकार्यता बढ़ी है. इसी का नतीजा है कि अनुच्छेद 370 हटाने पर अमेरिका ने भी कोई विपरीत प्रतिक्रिया नहीं दी. संयुक्त राष्ट्र ने तो टिप्पणी करने से ही इंकार कर दिया. जब पाकिस्तान ने भारत से राजनयिक संबंध तोड़ने की बात कही तब भी अमेरिका से पाकिस्तान को फटकार भी मिली. इसलिए ऐसा कुछ नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि खराब होगी. कहीं न कहीं अतंर्राष्ट्रीय मंच पर आपकी अहमियत इस बात से तय होती है कि आप खुद को कितना मजबूत दिखाते हो और भारत ने बीते वक्त में खुद की छवि में सुधार किया है. भारत बार बार ये कह भी चुका है कि कश्मीर का मसला आंतरिक है और इस मुद्दे पर बाहरी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होगा. ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि प्रभावित होने जैसे सवाल महज सवाल पूछने के लिए हैं. इनकी कोई अहमियत नहीं है.