देश के पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली का कल निधन हो गया. वो कैंसर से पीड़ित थे. बीते एक साल से वो सक्रिय राजनीति से दूर थे. इस साल जब बीजेपी ने चुनाव में जीत हासिल की तब भी जेटली ने कैबिनेट में शामिल होने से इंकार कर दिया. बीते कुछ दिनों के अंदर बीजेपी के लिए ये दूसरा बड़ा झटका है. हाल ही में पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का भी निधन हो गया था. अरुण जेटली को बीजेपी का संकटमोचक कहा जाता है. कारण साफ है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में जिस तरह कामकाज संभाला वो शानदार था. अरुण जेटली राजनीति के इस पड़ाव पर आकर ही संकटमोचक नहीं थे बल्कि अपने राजनैतिक जीवन के शुरुआती दिनों में ही उनमें वो गुण था. ऐसा ही एक किस्सा हम आपको बताने जा रहे हैं.

देश में नौंवे आम चुनाव होने थे.बोफोर्स तोप घोटाले को लेकर राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार बुरी तरह घिरी थी.विश्ननाथ प्रताप सिंह के अभियान की वजह से कांग्रेस के खिलाफ एक लहर खड़ी हो गयी थी.दूसरी तरफ मंडल और कमंडल की राजनीति भी जोर पकड़ रही थी.ऐसे में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने देश की राजधानी दिल्ली की नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया.1984 में बीजेपी महज 2 सीटों पर सिमट चुकी थी.ऐसे में इन चुनाव बेहतर करने का मौका उनके पास था.

लालकृष्ण आडवाणी के सामने इस चुनाव में चुनौती कम नहीं थी. उनके सामने पूर्व राष्ट्रपति वाई वी गिरी के परिवार की सदस्य मोहिनी गिरी थीं.आडवाणी जहां बीजेपी जैसी नई पार्टी से चुनाव लड़ रहे थे वहीं मोहिनी गिरी कांग्रेस से मैदान में थीं.चुनाव लड़ने के लिए महंगे संसाधनों को जुटाना बीजेपी के लिए कड़ी चुनौती थी.

पूर्व बीजेपी नेता गोविंदाचार्य बताते हैं की चुनाव के वक्त मोहिनी गिरी के पोस्टर और होर्डिंग खूब लगे थे.वोटिंग में महज 10-12 दिन बचे थे और बीजेपी के पोस्टर,बैनर कहीं भी नजर नहीं आ रहे थे.ऐसे में बीजेपी का चुनाव प्रचार कमजोर नजर आ रहा था.जब बीजेपी नेता गोविंदाचार्य ने इस बारे में आडवाणी से पूछा तो उन्होंने पैसों की कमी होने का हवाला दिया.आडवाणी ने कहा कि जो पैसे आए हैं उन्हें पूरे भारत में बांटा जाना है.भला उसे वो अपने प्रचार के लिए कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं.गोविंदाचार्य ने ऐसे में अरुण जेटलीसे बात की और उन्हें समस्या के बारे में बताया.अरुण जेटली ने एक रात के वक्त में पैसों का इंतजाम किया और अगले दिन से आडवाणी के लिए चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ा.

आडवाणी ने इस चुनाव में मोहिनी गिरी को शिकस्त दी.आडवाणी को जहां 129256 वोट मिले वहीं तमाम समर्थन और प्रचार के बावजूद मोहिनी गिरी को 97415 वोट हासिल हुए.इस चुनाव में दिल्ली में बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहा. बोफोर्स के उन दिनों के जेटली से लेकर राफेल पर लोकसभा में सरकार का पक्ष रखते जेटली एक जैसे थे. दोनों में एक ही छवि थी वो संकटमोचक की. तमाम विरोध के बावजूद उन्होंने जिस तरह से जीएसटी पर विपक्ष को साधा वो उनकी काबिलियत को बताता है. अक्सर बीजेपी में चर्चा अटल और मोदी युग के बारे में होती है, अरुण जेटली वो नेता थे जिन्होंने दोनों युगों में अपनी पहचान बरकरार रखते हुए एक अलग दर्जा हासिल किया. अरुण जेटली की कमी भारतीय राजनीति, बीजेपी और समाज सभी को खलने वाली है.