भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आज के ही के दिन पिछले वर्ष 2018 में निधन हो गया था. अटल बिहारी वाजपेयी को एक कुशल वक्ता के तौर पर जाना जाता है लेकिन कुशल वक्ता के साथ उनमें दलगत भावना से ऊपर उठकर सच बोलने की क्षमता थी.वो जिस राजनीति में थे उसे अच्छी तरह से जानते थे और उसके भविष्य के बारे में साफगोई से बात करने की क्षमता भी सिर्फ उनमें थी.

एक इंटरव्यू के दौरान जब तवलीन सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी जी से पूछा कि कई राज्यों में जहां बीजेपी की सरकार है वहां भी सत्ता का उपभोग करना और सही से सरकार न चलाना जैसे काम चल रहे हैं इस बारे में आपका क्या कहना है ? वाजपेयी जी ने इसके जवाब में कहा " देखिए सरकारों के काम करने का एक बंधा बंधाया ढर्रा है।" राजस्थान सरकार के कुछ अच्छे काम बताते हुए उन्होंने आगे कहा " मेरा मानना है कि जब तक व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होगा तब तक सरकारों का रूप बदल जाएगा, रंग बदल जाएगा, लोगों के जीवन पर उसका थोड़ा असर भी पड़ेगा लेकिन बहुत ज्यादा अंतर नहीं पड़ सकता।

इस बात का जिक्र कई बार किया जाता है कि गुजरात दंगों के बाद वो चाहते थे की नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम पद से इस्तीफा दे दें लेकिन आडवाणी के कारण ऐसा संभव नहीं हुआ लेकिन उन नरेंद्र मोदी को उन्होंने मीडिया के बीच ही राजधर्म की सीख दी थी.

अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंनो भारत 8 फीसदी की विकास दर पहुंचाया.भारत में गांवों तक विकास को पहुंचाने को लिए प्रधानमंत्री स्वर्णिम चतुर्भुज योजना उन्होंने ही शुरू की जिससे सड़कों का जाल देश में फैला.अटल जी कुशल वक्ता ,प्रशासक होने के साथ साथ फिल्मों के एक बड़े प्रशंसक थे.स्त्री विमर्श पर बनी फिल्में उन्हें खासी पसंद आती थीं और 1972 में आई हेमी मालिनी की फिल्म सीता और गीता उन्होंने करीब 25 बार देखी थी.

बीजेपी पर हिंदूवादी पार्टी होने का आरोप लगता है और पार्टी कई मौकों पर इस बात को प्रदर्शित भी करती है लेकिन अटल जी ने इसी पार्टी में रहते हुए लखनऊ की एक समस्या का अंत किया. दरअसल लखनऊ में मोहर्रम के जुलूस के दौरान हर साल शिया-सुन्नी समुदायों में दंगा होता.हालात खराब हो जाते थे लेकिन अटल जी ने सांसद बनने के बाद दोनों पक्षों को साथ बिठाकर इस मुद्दे पर सुलह करवाई.उनकी उस पहल का नतीजा ये है कि आज भी लखनऊ में मोहर्रम का जुलूस बगैर किसी झगड़े के शांति से निकाला जाता है.

जैसी उन्होंने कविता लिखी की हार नहीं मानूंगा वो उसी तरह वाकई हार न मानने वाले व्यक्तित्व थे.परेशानियों में भी मुस्कुराना उनकी थी मानो जैसी आदत थी.2004 में चुनाव में हार के बाद जब RAW प्रमुख आरएस दुल्लत ने उनसे कहा कि ये क्या हो गया तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि ये तो उन्हें(कांग्रेस) भी मालूम नहीं होगा की ये क्या हो गया.

2004 में चुनावों में हार के बाद उन्होंने राजनीति से सन्यास का एलान कर दिया. स्वास्थ्य पहले से ही ठीक नहीं रहता था. घुटना प्रत्यारोपण के कारण उन्हें चलने में तकलीफ थी और यही वजह की राजनीति से सन्यास के बाद वो बहुत ही कम मीडिया के सामने दिखाई देते थे.अधिकतर उनके जन्मदिन के मौके पर जब बीजेपी नेता उनके घर जाते थे तब कुछ तस्वीरें सामने आती थीं.

अटल जी ने अपने जीवनकाल में भारतीय राजनीति और देश के सामने काल के कपाल पर रेखाएं खींची हैं उन्हें शायद ही कोई मिटा सके.