तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई इन दिनों जल संकट से जूझ रही है. लोगों को पीने के पानी के लिए मोहताज होना पड़ रहा है. राज्य में विपक्षी दल डीएमके ने अपने प्रमुख एमके स्टालिन नेतृत्व में प्रदर्शन किया. इस जल संकट को 30 साल का सबसे गंभीर जल संकट बताया जा रहा है. राज्य सरकार एक और जिले वेल्लूर और केरल से ट्रेन के जरिए पानी चेन्नई लाने पर विचार कर रही है. आज हम आपको चेन्नई के इसी जल संकट के बारे में बताने जा रहे हैं-

कैसे हैं अभी हालात-

तमिलनाडु में बच्चे अपने स्कूल बैग में पीने का पानी भरकर ले जा रहे हैं. आईटी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को घर से काम करने के लिए कहा है. तमाम मॉल में उन कामों पर रोक लगाने को कहा गया है जहां पानी की खपत बहुत ज्यादा है. घरों में पानी की सप्लाई पहले की 10 फीसदी भी नहीं है और पानी के टैंकर के लिए 3-4 हफ्ते का इंतजार करना पड़ता है. तमिलनाडु में पानी की सप्लाई 4 जलाशयों से होती है. ये इस समय जीरो लेवल पर पहुंच चुके हैं और इनमें अपनी क्षमता का 1 फीसदी भी पानी नहीं है. इन हालात में चेन्नई में पानी की सप्लाई तीन बड़े मेगा डिस्टिलेशन प्लांट पर निर्भर है जो कुल क्षमता 180 MLD तक है. पूरे चेन्नई शहर में पानी की कुल जरूरत 1300 MLD है लेकिन अभी 830 MLD पानी ही टैंकरों के जरिए भेजा जा रहा है. चेन्नई के लोगों का कहना है कि चेन्नई में पानी की सप्लाई में 80 फीसदी तक की गिरावट आई है. चेन्नई में जल संकट की हालत ये है कि 7000 हेक्टेयर में फैला पानी का एक स्रोत सूख चूका है और अब ये महज 684 हेक्टेयर में फैला रह गया है.

कैसे सूखे झीलों वाले जिले-

चेन्नई आज पानी के स्त्रोतों का सम्मान न करने की कीमत चुका रहा है.चेन्नई और इसके दो पड़ोसी जिले कांचीपुरम और त्रिवल्लूर को मिलाकर येरी यानि झीलों वाले शहर कहा जाता था. इन तीनों जिलों में 6 हजार ऐसी झीलें और तालाब और पोखर थे जिनमें बारिश का पानी जमा होता था या सुरक्षित रहता था. आज इन जिलों में ऐसी झीलों और तालाबों की संख्या लगभग 3900 ही बची है. चेन्नई में खुद 150 ऐसी झीलें और तालाब गायब हो चुके हैं. जो बचे हैं उनकी हालत खराब है. बढ़ती जनसंख्या पूरे देश की समस्या है और चेन्नई के जल संकट में इसकी भी भूमिका है. 1991 की जनगणना के मुताबिक चेन्नई की आबादी 39 लाख थी. जो अब बढ़कर 70 लाख हो चुकी है. तमाम तालाबों और झीलों की जगह पर लोगों के लिए घर बना दिए गए हैं. येरी स्कीम के तहत बनाए गए तमाम अपार्टमेंट और प्लाटों ने तालाबों और पोखरों की जगह ले ली है है. बारिश में कमी भी चेन्नई की इस समस्या के लिए जिम्मेदार है. 2011-16 के बीच जयललिता सरकार ने हर बिल्डिंग में बारिश के पानी के संरक्षण के लिए जगह बनाना जरूरी कर दिया था. चेन्नई को आज वही नीति राहत दे रही है और महानगर में बने तीन डिस्टिलेशन प्लांट से लोगों को आज पानी पहुंचाया जा रहा है.

सही नीति न बनाने का भी हुआ है नुकसान-

चेन्नई आज गलत नीतियों का भी शिकार है. सरकार ने IT कंपनियों को बुलाया तो लेकिन पानी जैसी दैनिक जरूरत के लिए कोई नीति नहीं बनाई. आज चेन्नई के आईटी सेक्टर में साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग काम कर रहे हैं. इनके परिवारों को मिलाकर कुल साढ़े 12 लाख लोग आईटी सेक्टर की वजह से चेन्नई में आए लेकिन इन लोगों के लिए पानी की सप्लाई के लिए प्राइवेट टैंकर से की जाती है और ये लोग बेतहाशा पानी खर्च करते हैं. इन परिवारों का दैनिक पानी का खर्च 3 करोड़ लीटर है जो पानी के 700 प्राइवेट टैंकरों के जरिए पूरा किया जाता है. इसके 14 बड़े ट्रकों के जरिए भी सप्लाई होती है. कुछ दिनों पहले जब मद्रास हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाने की कोशिश की तो टैंकर लॉबी ने हड़ताल कर दी. इस तरह आईटी सेक्टर की पानी की अनदेखी ने चेन्नई को आज इस मोड़ पर ला खड़ा है. खास बात ये है कि तमिलनाडु सरकारें पानी की इस लूट के लिए जिम्मेदार हैं.