वैसे तो हाल ही में हुए कई विधानसभा चुनाव चर्चा में रहे। जैसे की गुजरात चुनाव, जंहा पर कांग्रेस ने बीजेपी और मोदी विरोधी लहर बनाने की कोशिश की और उसके कुछ नतीजे बीजेपी की सीटों में कमी के रूप में आये भी।

उसके बाद त्रिपुरा में हुआ चुनाव, जंहा पर बीजेपी ने लेफ्ट पार्टियों का एक मजबूत किला गिराते हुए अपनी सरकार बनाने में सफलता हासिल की।
उससे पूर्व भी पूर्वोत्तर और गोवा में हुए चुनाव में बीजेपी ने अपने चुस्त चालक राजनैतिक मैनेजमेंट के जरिये कांग्रेस को पटखनी दी।

इन सभी चुनावो के नतीजों से बीजेपी की जो इमेज बन कर आयी वो एक ऐसे पार्टी के रूप में जो न सिर्फ अपने मेहनत से चुनाव जीतने में एक्सपर्ट है बल्कि उसे चुनाव के बाद जोड़ तोड़ में भी महारत हासिल है।

कर्नाटक में क्या हासिल हुआ!

कर्नाटक चुनाव के नतीजे के ठीक पहले वो लोग जो ब्रांड मोदी या मोदी लहर में कमी या सुस्ती की बात कर रहे थे, वो गलत साबित हुए और मोदी ने अपने दम पर सुस्त पड़ी बीजेपी को बहुमत के पास तक पहुंचाया। तो ब्रांड मोदी और मजबूत हुआ इन चुनाव के बाद में। पर सोचने वाली बात है क्या ब्रांड बीजेपी वाकई में मजबूत हुआ और वो भी खासतौर पर जिस तरह की घमासान चुनाव के नतीजे के बाद चल रही है।

मेरी व्यग्तिगत सोच के हिसाब से इस घमासान ने ब्रांड बीजेपी को न सिर्फ कमजोर किया है बल्कि उसे भी लगभग कांग्रेस के समानांतर खड़ा कर दिया है। पूर्व में जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता में काबिज रहती थी तब इसी तरह गवर्नर्स के जरिये राज्यों में सत्ता परिवर्तन करना, जोड़ तोड़ की राजनीती करना उसके बाएं हाथ का खेल हुआ करता था। ये अलग बात है वही कांग्रेस आज डेमोक्रेसी का रोना रोते हुए बार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रही है।

बीजेपी १०४ सीट जीत कर नैतिक रूप से एक विजेता बन चुकी थी और अगर बिना जोड़ तोड़ के सरकार नहीं बना पाती तो जनता में अवश्य ही एक उसके प्रति सहानुभूति की सोच पैदा होती और जिस तरह से सिर्फ सत्ता प्राप्ति के लिए कांग्रेस ने जेडीएस के साथ गठबंधन किया था उसे लम्बे समय तक चलाये रख पाना शायद ही संभव होता। बीजेपी के पास एक साफ़ सुथरी छवि के साथ सत्ता में आना बहुत मुश्किल नहीं होता।

और मौजूदा नतीजों को वो आसानी से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और आने वाले लोक सभा चुनाव में इस्तेमाल कर सकती थी। आज होने वाले बहुमत परीक्षण में येद्दिउरप्पा भले ही जीत जाये और सरकार चलाने में सफल रहे पर मौजूदा घटनाक्रम से बीजेपी समर्थक भी शायद ही बीजेपी को कांग्रेस से कम से कम जोड़ तोड़ के मामले में अलग देख पाए।