कल यानि 26 जनवरी के दिन देश का गणतंत्र शर्मसार हो गया. आंदोलन की आड़ में कथित किसान लाल किले पर चढ़ गए और एक धार्मिक झंडा लाल किले पर फहरा दिया गया. बीते दिनों से देश की राजधानी के आस-पास कई बॉर्डरों पर कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन हो रहा है. आंदोलन में महिलाएं भी हैं, बच्चे भी हैं सभी शामिल हैं. अब तक कम से कम 14 दौर की बातचीत किसानों और सरकार के बीच हो चुकी है और हर बार वार्ता विफल है. शाहीन बाग के बाद, अब किसान आंदोलन और लोकतंत्र बचाने की लड़ाई के लिए तराने गाए जाते रहे हैं. वही चुनिंदा कलाकार, पत्रकार पिछले साढे़ 6 सालों से लोकतंत्र बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. कभी बिचारे किसानों के सहारे लड़ते हैं, कभी मुसलमानों के सहारे और कई बार तो राहुल गांधी के सहारे भी मैदान में उतरने को विवश हो जाते हैं.

दिल्ली में कल जो हुआ उसकी पटकथा काफी पहले ही लिखी जा चुकी थी. सरकार बिल में संशोधन की बात कर रही है. कथित किसान बिल वापसी की मांग पर अड़े हैं. ऐसे अड़े हैं कि टस से मस नहीं हो रहे हैं. कसम खाकर बैठे हैं कि बिल्कुल भी हटना नहीं है. सरकार भी अड़ी है. सरकार डंडा चलाना भी नहीं चाहती क्योंकि फासीवादी और किसान विरोधी होने के आरोप लगेंगे और पीछे हटना भी नहीं चाहती. ऐसे में तरीका क्या था, एक बार खुला मैदान दिया जाए और देखा जाए कि होता क्या है? खुले मैदान में आते ही वो हो गया जिसकी पर्दे के पीछे चर्चा होती रही है, खालिस्तानी आंदोलन खुलकर सामने आ गया, किसान बिल पीछे चले गए. एक शख्स की मौत भी हुई.

किसान बिल आने के साथ ही, सरकार में बीजेपी की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. उसी वक्त ये चर्चा हुई थी कि हरियाणा और पंजाब में आढ़तिए प्रभावशाली हैं, चूंकि किसान बिल से इनका नुकसान हुआ है, इसीलिए ये भारी विरोध इन्ही राज्यों में हो रहा है. बाकी राज्यों में विरोध काफी हल्का है, कह सकते हैं राजनीतिक पार्टियां ही हल्का फुल्का विरोध कर रही हैं. दिल्ली में लंबे समय से अड़े ये किसान कौन हैं जो अपना खेत छोड़कर इतने दिनों से दिल्ली में डेरा डाले हैं.

हमने बचपन से सुना है कि कैसे ट्रैक्टर खरीदने के चक्कर में तमाम लोग बर्बाद हो गए, क्योंकि ट्रैक्टर के लिए लोन की किस्तें नहीं भर पाती थीं और लोग कंगाल हो जाते थे. यहां ट्रैक्टर मार्च निकाला जा रहा था. ट्रैक्टरों की लाइन लगी थी. ये कहां के किसान हैं भाई जो ऐसे ट्रैक्टरों की लाइन खड़े कर रहे थे. जब कोई आंदोलन धन बल से चलेगा तो उसकी परिणिती ऐसी ही होगी. पिछले सालों में हुए आंदोलनों की बात करें तो अन्ना आंदोलन और निर्भया कांड के बाद सबसे बड़े आंदोलन रहे हैं. दोनों ही आंदोलन शांतिपूर्ण रहें और तात्कालिक रूप से अपने मकसद में कामयाब भी हुए क्योंकि उनके साथ एक जनभावना जुड़ी थी.

ऐसा नहीं है की कृषि कानूनों में सब कुछ सही ही है. इसमें जमाखोरी को मिलने वाली छूट समेत कई ऐसे कई प्रावधान हैं जिनसे लोगों को आपत्ति हो सकती है और उन्हें आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार भी है लेकिन जिस तरह से यह आंदोलन शुरुआत से ही आगे बढ़ा है वो हमेशा से संदेहास्पद रहा है. जितना प्रेशर किसानों ने सरकार पर बनाया था उसमें आराम से आपत्तिजनक प्रावधान हटाए जा सकते थे. सरकार संशोधनों के लिए तैयार होने की बात भी करती रही है. किसान आंदोलन के नाम पर उमर खालिद और कई लोगों की रिहाई की बात की गई, कसम खाकर कहा गया कि कानून वापस नहीं होंगे, तो माफ कीजिएगा देश ऐसे भी नहीं चलता.

ये लेख लिखे जाने तक पीएम मोदी, अमित शाह जी सभी के ट्विटर मौन हैं. पल भर में प्रतिक्रिया देने वाले ये लोग, इतनी बड़ी घटना के बाद शांत हैं. शायद वो भी इसी 'तमाशे' का इंतजार कर रहे थे. जो लोग अभी भी, अराजकता को आंदोलन का नाम दे रहे हैं, उन्हें समझ जाना चाहिए कि सब कुछ विशुद्ध दोतरफा राजनीति है. ऐसे वक्त में किसी के भी झांसे में न आएं. न किसी जुलूस का हिस्सा बनें और न सोशल मीडिया की किसी भीड़ का. जीवन छोटा है और अमूल्य है, शांति से जिएं.